प्रतिस्पर्धा और तनाव से घिरे जीवन में आत्म अवलोकन और संतोष का महत्व
Dr. Chandraprakash Dwivedi: भारतीय परंपरा में स्वास्थ्य केवल रोग-मुक्त शरीर तक सीमित नहीं है। यह एक व्यापक अवधारणा है, जिसमें मन, आत्मा और इंद्रियों की प्रसन्नता भी शामिल है। वेदों और उपनिषदों से लेकर आयुर्वेद और योग तक, हर जगह स्वास्थ्य को जीवन का आधार माना गया है। आधुनिक समय में जब जीवन तनाव, प्रतिस्पर्धा और अवसाद से घिरा हुआ है, तब इस सनातन दृष्टि को नए सिरे से समझना और अपनाना और भी आवश्यक हो जाता है।
भोपाल में आरोग्य भारती की व्याख्यानमाला के 11वें वार्षिकोत्सव पर प्रख्यात चिंतक, साहित्यकार और फिल्म निर्देशक डॉ. चन्द्रप्रकाश द्विवेदी (जिन्होंने ऐतिहासिक धारावाहिक "चाणक्य" में अपनी विलक्षण भूमिका से देश में पहचान बनाई) ने अपने उद्बोधन में इन्हीं आयामों पर प्रकाश डाला। उनका वक्तव्य केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जीवन-दर्शन, समाज निर्माण और आत्मिक आनंद की खोज तक फैला।

डॉ. द्विवेदी ने कहा-"विज्ञान यानी विशेष ज्ञान। लेकिन जब इसमें संवेदना जुड़ जाती है, तभी समाज का निर्माण होता है।
यह वाक्य केवल चिकित्सा क्षेत्र के लिए ही नहीं, बल्कि हर क्षेत्र में लागू होता है। आज विज्ञान और तकनीक हमारे जीवन का अनिवार्य हिस्सा हैं। परंतु यदि इसमें संवेदना का स्पर्श न हो तो यह निष्ठुर हो जाता है। चिकित्सा का पेशा इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। डॉक्टर के पास स्किल होती है, ज्ञान होता है, लेकिन जब तक वह करुणा और सेवा की भावना से नहीं जुड़ता, तब तक उसका कार्य अधूरा है। यही भारतीय संस्कृति का विशेष योगदान है-ज्ञान और संवेदना का समन्वय।
आज का जीवन तेज रफ्तार प्रतिस्पर्धा से भरा हुआ है। हर कोई दूसरों से आगे निकलने की होड़ में है। डॉ. द्विवेदी ने कहा कि "आज तनाव और अशांति का सबसे बड़ा कारण दूसरों से प्रतिस्पर्धा करना है। हम हमेशा दूसरों को देखकर वैसा बनने की कोशिश करते हैं। यही हमें अंदर से खोखला कर देता है।
भगवान बुद्ध ने कहा था"मनुष्य की प्रवृत्ति होती है कि सुख देने वाली स्थिति कभी न बदले। परंतु सुख को स्थायी बनाने का प्रयास ही दुख का कारण है।
यह कथन आज के समय में पूरी तरह प्रासंगिक है। आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि हम क्षणिक सुख को स्थायी बनाना चाहते हैं। जब यह संभव नहीं होता तो निराशा और अवसाद हमें घेर लेता है।
डॉ. द्विवेदी का कहना है कि जीवन को आनंदित बनाने का एक ही मंत्र है-आत्म अवलोकन हमें दूसरों से तुलना करने की बजाय स्वयं को जैसा हैं वैसा स्वीकार करना चाहिए।
उन्होंने कहा-"हर बार जीवन में सफल होना जरूरी नहीं। असफलता भी जीवन का हिस्सा है। अनचाहा होता रहता है और मनचाहा होता नहीं, यही दुख का बड़ा कारण है। लेकिन यदि हम आत्म स्वीकृति की भावना विकसित करें तो जीवन सहज और आनंदित हो जाएगा।
यही आत्म अवलोकन हमें आत्म-संतोष देता है। भारतीय दर्शन का यह मूलमंत्र है कि सुख और शांति बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि भीतर से प्राप्त होते हैं। डॉ. द्विवेदी ने महात्मा गांधी के विचारों का उल्लेख किया "मुझे उतना ही मिले जितनी मुझे आवश्यकता है"।
आज उपभोक्तावाद के युग में यह विचार और भी प्रासंगिक हो जाता है। समाज हमें अधिक से अधिक पाने के लिए उकसाता है। विज्ञापन हमें यह समझाने की कोशिश करते हैं कि जब तक हमारे पास नवीनतम वस्तुएं नहीं हैं, तब तक जीवन अधूरा है। लेकिन गांधीजी की यह सीख हमें सिखाती है कि आवश्यकता से अधिक पाने की इच्छा ही असंतोष और दुख का कारण है।
अपने उद्बोधन में डॉ. द्विवेदी ने एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया-"I am not ok, You are not ok, but We are ok." इसका अर्थ है कि व्यक्तिगत रूप से हर किसी में कमियाँ हो सकती हैं, लेकिन सामूहिक रूप से जब हम एक-दूसरे को स्वीकार करते हैं और सहयोग करते हैं तो समाज संतुलित और आनंदित बन जाता है।
भारतीय सनातन संस्कृति का विचार है कि आत्मा और मन को आनंदित रखना ही सच्चा स्वास्थ्य है। केवल शरीर की तंदुरुस्ती ही पर्याप्त नहीं है। यदि मन तनावग्रस्त है, आत्मा दुखी है तो शरीर के स्वस्थ रहने का कोई महत्व नहीं। इसी दृष्टि से योग, ध्यान और प्राणायाम को जीवन का अंग बनाया गया है।
डॉ. द्विवेदी ने कहा कि आनंदित रहने का सबसे सरल उपाय आत्म अवलोकन और आत्म स्वीकृति है। जब हम अपनी सीमाओं को स्वीकार कर लेते हैं, तब हमारे भीतर संतुलन और शांति आती है। यही शांति समाज और राष्ट्र की प्रगति का आधार बनती है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पूज्य श्रीमद् जगद्गुरु सुखानंद द्वाराचार्य स्वामी राघव देवाचार्य जी महाराज ने भी कहा कि "अच्छे राष्ट्र की रचना तभी संभव है जब हम राष्ट्र को आरोग्य बनाएंगे।
यह कथन गहरी सच्चाई को व्यक्त करता है। एक अस्वस्थ समाज कभी महान राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकता। आहार, विहार और व्यवहार की शुद्धता से ही व्यक्ति स्वस्थ बनेगा और स्वस्थ व्यक्ति ही राष्ट्र की शक्ति बनता है।
डॉ. चन्द्रप्रकाश द्विवेदी का उद्बोधन हमें यह सोचने पर विवश करता है कि आधुनिक जीवन की जटिलताओं से मुक्ति का मार्ग बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है। आत्म अवलोकन, आत्म स्वीकृति, संतुलित आहार और सकारात्मक सोच ही आनंदमय जीवन का मंत्र है।
आज जब जीवन भाग-दौड़ और प्रतिस्पर्धा से भरा हुआ है, तब भारतीय संस्कृति का यह संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि सुख का स्रोत बाहर नहीं, भीतर है। आवश्यकता से अधिक पाने की इच्छा दुख का कारण है। और आत्म अवलोकन ही हमें आनंद और शांति प्रदान करता है। यही सनातन दृष्टि है, यही गांधीजी का मंत्र है और यही आज के युग का सबसे बड़ा स्वास्थ्य-दर्शन भी।
(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)












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