क्या इंदिरा गांधी की तर्ज पर नरेन्द्र मोदी भी विपक्ष को करना चाहते हैं नेस्तनाबूद?

नई दिल्ली। नरेन्द्र मोदी क्या इंदिरा गांधी तरह विपक्ष को नेस्तनाबूद कर देना चाहते हैं? इंदिरा गांधी के बाद मोदी दूसरे ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने पूर्ण बहुमत से दोबारा सत्ता पायी है। रोजगार, आर्थिक विकास जैसे मुद्दों पर पिछड़ने के बाद भी नरेन्द्र मोदी एक शक्तिशाली नेता के रूप में स्थापित हुए हैं। उन्होंने विपक्ष को इतना शक्तिहीन बना दिया है कि वह चुनौती देने के काबिल भी नहीं। बिखरे हुए विपक्ष को धाराशायी करना मोदी के लिए और आसान हो गया है। संसद के मौजूदा बजट सत्र में नरेन्द्र मोदी ने विपक्ष के सारे सवालों का आत्मविश्वास से जवाब देकर एक बार फिर अपनी क्षमता साबित की है। वे विपक्ष की परवाह किये बिना उसी तरह सख्त फैसले ले रहे हैं जैसे कि इंदिरा गांधी लेती थीं।

मोदी के सामने नहीं टिके राहुल
नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक कुशलता के सामने राहुल गांधी टिक नहीं पाये। उनकी इस नाकामी से विपक्षी मोर्चांबंदी और कमजोर हो गयी। प्रसिद्ध इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक रामचंद्र गुहा नरेन्द्र मोदी के कट्टर आलोचक हैं। लेकिन उन्हें भी कहने पर मजबूर होना पड़ा कि राहुल गांधी में मोदी को टक्कर देने की काबिलियत नहीं है। उन्होंने राहुल गांधी को यूरोप में छुट्टियां मनाने वाला नेता बताया तो मोदी को बेहद मेहनती इंसान कहा। गुहा ने कहा था, मोदी के फैसलों को गलत ठहराया जा सकता है लेकिन उन्होंने शासन के लिए जो मेहनत और अनुशासन दिखाया है वह काबिले तारीफ है। अगर राहुल गांधी जैसे नेता को मोदी का विकल्प बताया जाएगा तो यह एक तरह से भाजपा को मजबूत करना होगा। राहुल गांधी वैसे सलाहकारों पर निर्भर हैं जिन्हें व्यवहारिक राजनीति का कोई अनुभव नहीं है। 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी पर व्यक्तिगत हमले की रणनीति बुरी तरह नाकाम रही। ‘चौकीदार चोर है' और राफेल के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे राहुल गांधी औंधे मुंह गिर पड़े। संसद के मौजूदा बजट सत्र में भी राहुल गांधी अपनी छाप नहीं छोड़ पाये। जब नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर जवाब दिया तो कांग्रेस के राहुल गांधी और अधीर रंजन चौधरी जैसे नेता निरुत्तर हो गये।

ममता, मायावती जैसे क्षत्रप भी कमजोर
नरेन्द्र मोदी ने ममता बनर्जी और मायावती जैसी मजबूत क्षेत्रीय नेताओं के पांवों तले जमीन खिसका दी है। पश्चिम बंगाल में भाजपा अब दूसरी सबसे बड़ी शक्ति बन गयी है। नरेन्द्र मोदी से आरपार की लड़ाई लड़ने वाली ममता के कमजोर होने से भाजपा के विस्तार की संभवाना बढ़ गयी है। पूर्वोत्तर में असम और त्रिपुरा में वह पहले से ही सत्ता में आ चुकी है। अगर पश्चिम बंगाल में भी भाजपा को सत्ता मिल गयी तो मोदी की ताकत और बढ़ जाएगी। उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश मिल कर भी मोदी को जवाब नहीं दे पाये। अब ये अलग-अलग लड़ कर कौन सा करिश्मा कर लेंगे ? पूर्वी भारत में नवीन पटनायक ही कुछ हद तक भाजपा को रोक पाये हैं लेकिन वे मोदी के प्रति मध्यमार्ग अपनाते रहे हैं। कांग्रेस के साथ दिक्कत ये है कि जिन राज्यों में उसकी सरकारें हैं वहां भी वे भी वे मोदी को रोक नहीं पा रहे हैं। लोकसभा चुनावों में सिर्फ दक्षिण के राज्य ही मोदी के लिए अवरोध हैं।

क्या मोदी भी इंदिरा की तरह होंगे निरंकुश?
बढ़ती लोकप्रियता और सत्ता की ताकत शासक को निरंकुश बना देती है। इंदिरा गांधी भी 1971 में प्रचंड बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बनी थीं। उन्होंने अपने तमाम विरोधियों के कस-बल ढीले कर दिये थे। नतीजा ये हुआ कि देश की जनता को आपातकाल में जुल्म सहने पड़े। नरेन्द्र मोदी एक के बाद एक सख्त फैसले ले रहे हैं। उनको भी चुनौती देने वाला कोई नहीं। क्या सत्ता की परम शक्ति से एक दिन नरेन्द्र मोदी भी डिक्टेटर बन जाएंगे ? एक मजबूत विपक्ष ही किसी सरकार को निरंकुश होने से रोक सकता है। लेकिन मौजूदा राजनीति में विपक्ष की वही स्थिति है जो नेहरू काल में थी। आजादी के बाद कांग्रेस लोगों के दिलो-दिमाग में रची बसी थी। इसकी वजह विपक्षी दलों को बहुत कम सीटें मिलती थीं। चार चुनावों तक हालत ये थी कि कोई नेता प्रतिपक्ष भी नहीं बन पाया। आजादी के 22 साल बाद भारत में किसी लीडर को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा मिला था। बिहार के सांसद रामसुभग सिंह 1969 में पहली बार नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर बैठे थे। 2014 और 2019 में भी विपक्ष खस्ताहाल है। कांग्रेस इतनी भी सीटें नहीं जीत पायी कि वह नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी हासिल कर सके। कमजोर विपक्ष लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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