Freebies: मुफ्त की खैरात या कल्याणकारी योजनाएं हैं चुनावी घोषणाएं?

Freebies: बात 2006 की है। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में डीएमके चीफ करुणानिधि ने वादा किया कि अगर वो चुनाव जीतते हैं तो हर गरीब परिवार को एक रंगीन टेलीविजन देंगें। करुणानिधि चुनाव जीते और अपना वादा भी पूरा किया। गरीब परिवारों को टीवी देने का वादा था लेकिन बाद में हर ग्रामीण परिवार को टीवी सेट बांटे गये। पांच साल के कार्यकाल में उन्होंने टीवी बांटने पर 4,000 करोड़ खर्च किये। हालांकि 2011 में जयललिता की सरकार बनी तो उन्होंने इस मुफ्त टीवी वितरण कार्यक्रम को रद्द कर दिया। लेकिन खुद जयललिता ने 2011 में वोटरों को मुफ्त मोबाइल फोन देने का वादा किया था, इसलिए उन्होंने वह बांटना शुरु कर दिया।

तमिलनाडु को हम वह पहला राज्य कह सकते हैं जिसने जनता को मुफ्त में ऐसे सामान देने की शुरुआत की जिसका उस जमाने में क्रेज था। अगर आप तमिलनाडु की राजनीति को देखें तो पायेंगे कि वोटरों को जितना कुछ मुफ्त में देने का वादा वहां किया गया, अन्य किसी राज्य में नहीं। करुणानिधि और जयललिता में होड़ रहती थी कि वोटरों को कितना अधिक से अधिक देने का वादा करके वो उन्हें अपनी ओर आकर्षित कर सकते हैं। लेकिन यह चलन तमिलनाडु तक ही सीमित नहीं रहा।

distributing Freebies: Are Freebies announcement free doles or welfare schemes?

समय बदला तो नेताओं ने अपने वादों की लिस्ट भी बदली। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने छात्रों को मुफ्त लैपटॉप दिया जो आज भी योगी फ्री लैपटॉप योजना के नाम पर चल रहा है। वर्तमान वित्तवर्ष में इसके लिए 1800 करोड़ रूपये रखे गये हैं। इसके तहत राज्य का कोई भी छात्र या छात्रा मुफ्त लैपटॉप के लिए आवेदन कर सकता है बशर्ते उसने 12वीं की परीक्षा में 70 प्रतिशत से ऊपर अंक प्राप्त किये हों।

इसी के साथ योगी सरकार प्रदेश के 25 लाख नौजवानों को स्मार्टफोन बांटने जा रही है। इसके लिए कुल 949 करोड़ रूपये का बजट निर्धारित किया है जिसकी पहली किश्त के रूप में 3 लाख 71 हजार मोबाइल फोन इसी महीने से बांटना शुरु होगा। योगी सरकार ने 2017 में सरकार बनाते ही किसानों का एक लाख रुपए तक का कर्ज भी माफ कर दिया था।

आज जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं उनमें हर राज्य में पक्ष विपक्ष के द्वारा चुनाव जीतने के बाद मुफ्त का सामान या सुविधा देने का वादा किया जा रहा है। जैसे मध्य प्रदेश में लाडली बहना योजना के तहत भाजपा द्वारा महिलाओं को 1200 रूपये मासिक दिया जा रहा है लेकिन कांग्रेस का वादा है कि वो सरकार में आई तो इसे बढ़ाकर 1500 रूपये महीना कर दिया जायेगा। इसके साथ ही कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में वादा किया है कि सरकार बनाने के बाद घरेलू सिलेण्डर 500 रूपये में देंगे। 100 यूनिट तक बिजली बिल माफ, 200 यूनिट तक हाफ, विकलांग जनों की पेंशन बढाकर 2000 कर देंगे, सरकारी स्कूलों में पढ़नेवाले बच्चों को एक से आठ तक 500, नौ और दस में 1000 तथा 11वीं और बारहवीं के समय 1500 रूपये प्रतिमाह देंगे।

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, राजस्थान और तेलंगाना में भाजपा हो या कांग्रेस सबने अपनी ओर से मतदाता के लिए कुछ न कुछ आकर्षक वादा किया है। तेलंगाना में केसीआर की सरकार 2 लाख से कम आयवाले परिवारों में लड़कियों के विवाह के समय 1 लाख रुपये की मदद करती है। अब कांग्रेस ने इस पर 10 ग्राम सोना देने का भी वादा किया है। इसके अलावा बाकी दूसरे वादे तो हैं ही।

लेकिन सवाल यह उठता है कि इन मुफ्त की योजनाओं और घोषणाओं को क्या मुफ्तखोरी कहा जाए या फिर जनकल्याणकारी योजानाएं? देश में मध्य वर्ग से जुड़े बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकार आदि इन्हें फ्रीबीज कहकर इसकी आलोचना करते हैं जिसका भार अंतत: करदाता की जेब पर पड़ता है। ऐसे ढेरों आंकलन और रिपोर्ट मिल जाएंगे जो यह बताएंगे कि मुफ्त की इन योजनाओं से सरकारी खजाने पर कितना बोझ बढ़ेगा। लेकिन क्या सचमुच ये घोषणाएं सरकारी खजाने पर बोझ होती हैं या फिर इनसे उद्योग बाजार को गति मिलती है?

चुनावों के बारे में कहा जाता है कि चुनाव अर्थव्यवस्था में गति पैदा करने का एक बड़ा जरिया बनते हैं। यही वह समय होता है जब राजनीतिक दल दिल खोलकर खर्च करते हैं जिससे बाजार में गति आती है। लेकिन बात सिर्फ चुनाव तक ही सीमित नहीं रहती। चुनावी वादों को पूरा करने के लिए जब व्यापक स्तर पर खरीदारी की जाती है तब उन्हीं टैक्सपेयर्स को व्यापार भी मिलता है जिनसे सामान खरीदकर जनता में बांटा जाता है। इसलिए जो लोग ऐसी योजनाओं की फ्रीबीज कहकर आलोचना करते हैं वो सिक्के का दूसरा पहलू कभी नहीं देख पाते।

भारत एक आर्थिक गैर बराबरी वाला देश है। ऑक्सफैम की रिपोर्ट बताती है कि भारत में शीर्ष के 10 प्रतिशत लोगों के पास कुल वेल्थ का 77 प्रतिशत है। इसमें भी जो 73 प्रतिशत वेल्थ निर्मित हुआ वह शीर्ष के 1 प्रतिशत लोगों तक सिमटकर रह गया। भारत में आर्थिक गैर बराबरी का अनुमान आप इसी बात से लगा सकते हैं कि भारत की किसी बड़ी कंपनी में एक शीर्ष का सीईओ एक साल में जितनी सैलेरी पाता है उतना पैसा कमाने में एक सामान्य मजदूर को 950 साल लग जाएंगे। यही कारण है कि शीर्ष के 10 प्रतिशत लोगों में और नीचे के पायदान पर खड़े 70 करोड़ लोगों की आमदनी में जमीन आसमान का अंतर दिखाई देता है।

एचसीएल टेक्नॉलाजी के एस विजयकुमार इस समय सालाना 124 करोड़ की सैलेरी ले रहे हैं जो सर्वाधिक वेतन पानेवाले कर्मचारी हैं। इस तरह उनकी औसत सैलेरी प्रतिदिन 3 करोड़ रूपये बैठती है जबकि इसी देश में आज भी मनरेगा में काम करनेवाले एक मजदूर की दैनिक मजदूरी 230 रूपया है। ऐसी भीषण गैर बराबरी वाली अर्थव्यवस्था में अगर जनता के एक बड़े वर्ग को सरकारी योजनाओं के नाम पर राहत पहुंचा दी जाती है तो क्या इन्हें फ्रीबीज या मुफ्तखोरी कहकर खारिज किया जाना चाहिए? वह भी तब जब इससे परोक्ष रूप से व्यापारी वर्ग और बाजार ही लाभार्थी होता है तब भी इसकी आलोचना क्यों होनी चाहिए?

बाजारवाद के सिद्धांत के अनुसार ही वह निरंतर अनटैप और अनआर्गेनाइज मार्केट को टैप करता है। इसका अर्थ यह हुआ कि वह निरंतर ऐसे सेक्टर की तलाश में रहता है जहां जनसामान्य असंगठित रूप से कारोबार करता है। कंपनियां उसे आर्गेनाइज्ड मार्केट के नाम पर टैप करती हैं और खुदरा प्लेयर को बाहर कर देती है। इससे एक ओर तो व्यापार का ग्राफ बढ़ता दिखाई देता है दूसरी ओर पूंजी का केन्द्रीकरण बढ़ता है और बेरोजगारी बढ़ती है। यह स्थिति मार्केट के उन प्लेयर्स के लिए एक चुनौती है जो पूंजी के इस केन्द्रीयकरण का कारण होती है।

अत्यधिक केन्द्रीकृत पूंजी अंतत: बाजार को ही मुर्दा बनाने लगती है जिससे बचने के लिए बाजार में पूंजी की उपलब्धता को बनाये रखना जरूरी होता है। यूरोप सहित सभी सफल पूंजीवादी देशों में अलग अलग कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर इसी तरह कैश ट्रांसफर किया जाता है ताकि बाजार की मांग बनी रहे। भारत में भी इसकी शुरुआत हो गयी है। वृद्ध पेंशन, नौजवान को रकम, महिलाओं को कैश, किसान सम्मान निधि जैसी योजनाएं बाजार की मांग हैं जो भविष्य में कम होने की बजाय और बढ़ेंगी। फिर आज जीएसटी युग में जब हर नागरिक उपभोक्ता और हर उपभोक्ता टैक्सपेयर है तो सरकारी खजाने पर भी एकतरफा बोझ कैसे पड़ेगा?

इसलिए राजनीतिक दलों की मुफ्त योजनाओं को कल्याणकारी योजनाएं ही कहना चाहिए। स्वास्थ्य बीमा हो या फिर मुफ्त अनाज योजना। ये सब समाज के उस वर्ग को राहत देते हैं जिनके पास उसे वहन करने की क्षमता नहीं है। लेकिन साथ ही साथ ऐसी योजनाएं व्यापारी समाज को भी लाभ पहुंचाती है जो प्रत्यक्ष रूप में डॉयरेक्ट टैक्स पैयर होता है। इसलिए राजनीतिक दलों द्वारा शुरु की जानेवाली ऐसी योजनाएं अंतत: सबके लिए लाभकारी होती हैं। जिन्हें कुछ मिलता है उनके लिए भी, और जो दल ये सब देकर सत्ता में आते हैं उनके लिए भी।

टैक्सपेयर व्यापारिक जगत भी इसका लाभार्थी होता है क्योंकि ऐसी योजनाओं से उनका माल एकमुश्त बिक जाता है। हां, ऐसी योजनाओं में सरकारी भ्रष्टाचार जरूर होता है और नागरिक से ज्यादा लाभ नौकरशाही उठा लेती है। ऐसी योजनाओं का विरोध और आलोचना करने की बजाय इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार को रोकने का कुछ उपाय जरुर किया जाना चाहिए।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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