अपने ही दांतों से घायल जिह्वा है हिन्दी!
हिन्दी 14-15 अगस्त 1947 की उसी मध्यरात्रि को पिछड़ गई थी, जब आजाद हो रहे देश का प्रधानमंत्री बनने जा रहे पंडित जवाहर लाल नेहरू ने "ट्रिस्ट विद डेस्टिनी" नाम से चर्चित हुआ अपना पहला भाषण अंग्रेज़ी में दिया था। इसी से स्पष्ट हो गया था कि राजनीतिक बयानबाज़ियों के बावजूद हिन्दी के प्रति हमारे बड़े नेताओं में कितनी प्रतिबद्धता थी। इसके बाद जब देश का संविधान तैयार हुआ, तो उसमें सबसे बड़ा मज़ाक यह हुआ कि भारत को केवल "भारत" के नाम से स्वीकृत और प्रतिष्ठित नहीं करके "इंडिया दैट इज भारत" कहा गया।

इसी अंग्रेज़ीदां सोच के कारण संविधान ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं बनाया, बल्कि कथित राजभाषा का दर्जा देकर 15 वर्षों के लिए इसे अंग्रेज़ी का पिछलग्गू बना दिया। उच्चतम और उच्च न्यायालयों के लिए तो साफ कह दिया गया कि इन वर्षों में वहां अंग्रेज़ी में ही काम होता रहेगा। हालत यह है कि 15 वर्ष की कौन कहे, आजादी के 75 वर्ष बाद भी हम यह कहने की स्थिति में नहीं हैं कि हिन्दी किसी दिन इस देश की राष्ट्रभाषा बन सकती है और सारा सरकारी और न्यायालयी काम भी हिन्दी में ही हो सकता है।
भारत की अब तक की सरकारों ने हिन्दी को एक ऐसे अनुवाद की भाषा बनाकर रखा हुआ है, जिसका मखौल उड़ाकर हिन्दी को लगातार नीचा दिखाया जाता है और इसी आधार पर यह साबित करने की कोशिशें भी की जाती हैं कि अंग्रेज़ी अनिवार्य है और उसका कोई विकल्प नहीं है।
अनुवाद की भाषा से सरकारी काम काज की भाषा बने हिन्दी
आपको हालिया वर्षों के वे वाकये भी अवश्य याद होंगे, जब भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति स्वर्गीय प्रणब मुखर्जी संसद में अपना अभिभाषण अंग्रेज़ी में देते थे और इसके बाद तत्कालीन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी शुरू की दो लाइनें हिन्दी में पढ़कर कह देते थे कि शेष भाषण को हिन्दी में पढ़ा हुआ मान लिया जाए। जबकि प्रणब मुखर्जी को इतनी हिन्दी ज़रूर आती थी कि अगर वे अंग्रेजी में लिखा हुआ भाषण पढ़ सकते थे, तो हिन्दी में लिखा हुआ भाषण भी पढ़ सकते थे। ध्यान रहे कि राष्ट्रपति को लिखा हुआ भाषण ही पढ़ना होता है।
कहना नहीं होगा कि एक देश के रूप में भारत अपनी भाषाओं के मामले में अत्यधिक लचीला और अप्रतिबद्ध है, जिसके कारण विभिन्न सरकारों का रवैया हिन्दी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं के प्रति वैसा नहीं हो पाता, जैसा होना चाहिए। वैसे दिखावे में कोई कमी नहीं है। हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस और इस तारीख को केंद्र में रखकर हिन्दी सप्ताह, हिन्दी पखवाड़ा और हिन्दी मास मनाया जाना भी तब तक दिखावा ही है, जब तक इसे राष्ट्रभाषा घोषित करके सभी सरकारी कामकाज हिन्दी में कराने का फैसला नहीं ले लिया जाता। मूल कामकाज हिन्दी में हो और उसका अनुवाद अंग्रेज़ी अथवा अन्य भाषाओं में भी करा लिया जाए, इसमें समस्या क्या है? क्यों मूल कामकाज अंग्रेज़ी में ही करके हिन्दी में उसका अनुवाद कराया जाता है?
हिन्दी वाले ही हिन्दी के दुश्मन
विशाल आबादी की जिह्वा पर विराजमान हिन्दी अपने ही दांतों से किस तरह घायल है, इसका एक बड़ा प्रमाण यह भी है कि अब हिन्दीभाषी राज्यों में भी आर्थिक रूप से सक्षम अभिभावक अपने बच्चों को हिन्दी माध्यम से शिक्षित नहीं करते हैं। वे अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम वाले प्राइवेट स्कूलों का रास्ता पकड़ा रहे हैं। इस चलन को बढ़ावा दिया है सरकारी स्कूलों के गिरते स्तर ने, जिन पर भारत के मध्यवर्ग को अब बिल्कुल भी भरोसा नहीं रह गया है।
कुछ और भी कारण हैं, जैसे कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी और कई आधुनिक विषयों में हिन्दी में अच्छी किताबों का उपलब्ध न होना, हिन्दी माध्यम वाले छात्रों से संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं समेत अनेक प्रतियोगी परीक्षाओं में भेदभाव बरता जाना और जनता के बीच यह अवधारणा बन जाना कि हिन्दी में रोज़गार के अवसर अंग्रेज़ी की तुलना में कम हैं।
सवाल है कि कोई भी भाषा बच्चों की शिक्षा और नौजवानों के रोज़गार के माध्यम से बाहर होकर कब तक जीवित रह सकती है? ये बच्चे और नौजवान ही तो हमारी भाषा और संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे ले जाते हैं, लेकिन अपनी भाषा में शिक्षित नहीं करके जहां हम उन्हें जड़ों से काटते जा रहे हैं, वहीं रोज़गार के उचित अवसर मुहैया नहीं कराकर हम उन्हें अपनी भाषा से विमुख होने के लिए मजबूर कर रहे हैं। ध्यान रहे कि कोई भी भाषा जब शिक्षा और रोज़गार के माध्यम से बाहर होती है, तो धीरे-धीरे वह बोली बनकर विलुप्ति की ओर बढ़ जाती है।
साहित्यकारों की कमजोर भूमिका
किसी भी भाषा के निर्बाध रूप से बढ़ने और अगली पीढ़ियों में प्रवाहित होती रहने में उसके साहित्य की भी बड़ी भूमिका होती है। इस लिहाज से दुनिया की दूसरी भाषाओं के लोग भी हिन्दी को कौतूहल से देखते तो हैं, लेकिन हिन्दी लेखकों और साहित्यकारों की कमज़ोर भूमिका के कारण विश्व साहित्य में हिन्दी की स्थिति बेहद कमजोर बनी हुई है।
अगर इन बेचारों को राजनीतिक विचारों के आधार पर गिरोह बनाने, उनके आईटी सेल के एजेंडे पर चयनित लेखन करने, छोटे-मोटे पुरस्कारों के लिए जोड़-तोड़ करने और विभिन्न सरकारी अकादमियों के चक्कर काटने से फुरसत मिल पाती, तो वे भी थोड़ी एकता बना पाते, गुणवत्तापूर्ण लेखन पर ध्यान दे पाते और सोच पाते कि आखिर किस तरह से विश्व साहित्य में हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलाई जा सकती है।
लेखकों के साथ ही प्रकाशकों, शिक्षकों और अन्य बुद्धिजीवियों ने भी हिन्दी का सत्यानाश करने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी है। ये लोग अपने स्वार्थ एवं राजनीतिक व वैचारिक पूर्वाग्रहों के कारण गिरोह बनाकर प्रतिभाओं का कत्लेआम करते हैं और अयोग्य लोगों को बढ़ावा देते हैं।
हिन्दी भाषियों की हीन भावना
कुल मिलाकर, 750 करोड़ लोगों की दुनिया में लगभग 100 करोड़ लोगों द्वारा बोली-समझी जाने वाली भाषा इतनी कमज़ोर तो नहीं होनी चाहिए थी कि सरकारों को उसे अपने संपूर्ण कामकाज की भाषा बनाने में, बड़ी-बड़ी अदालतों को उसमें न्याय देने में, नवधनाढ्य अभिभावको को अपने बच्चों को उसमें पढ़ाने में हिचक होती, लेकिन हिन्दीभाषी लोगों की अपनी स्वार्थपरता, कायरता, कमज़ोरी और हीन भावना दुनिया में बेमिसाल है। हिन्दीभाषी लोगों के वोटों से बनी सरकारों का हिन्दी के साथ किया जा रहा धोखा भी अतुलनीय है।
ध्यान रहे कि जब हम हिन्दी के हक और सम्मान की बात करते हैं, तो किसी भी अन्य भारतीय भाषा से हमारा टकराव नहीं है, क्योंकि इनमें से ज्यादातर भाषाएं एक ही मां संस्कृत के गर्भ से निकली हैं। सच यह है कि हिन्दी का रास्ता रोके जाने के कारण आज दूसरी भारतीय भाषाएं भी अपेक्षित तरक्की नहीं कर पा रहीं, क्योंकि इसका सीधा-सीधा लाभ अंग्रेज़ी को चला जा रहा है। यानी हिन्दी और भारतीय भाषाओं के मामले में "घर फूटे, गंवार लूटे" वाली कहावत अक्षरशः चरितार्थ हो रही है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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