Zealandia: आठवां महाद्वीप ही नहीं आठवां अजूबा है जीलैंडिया
Zealandia: पिछले दो सौ सालों से हम इतिहास और भूगोल की किताबों में यही पढ़ते आए हैं कि पृथ्वी पर सात महाद्वीप हैं। लेकिन, हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक नए महाद्वीप जीलैंडिया का मानचित्र जारी किया है। भू-वैज्ञानिक 1995 से इसकी खोज में लगे थे। उन्हीं दिनों कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले के भूगोलविद् ब्रूस ल्यूएंडिक ने इस क्षेत्र को जीलैंडिया नाम दिया था।
भू-वैज्ञानिकों की टीम को इसे आठवें महाद्वीप के रूप में स्वीकार करने और इसकी आधिकारिक घोषणा करने में 22 साल लग गए। 2017 में निक मोर्टिमर के नेतृत्व वाली टीम ने जीएसए टुडे जर्नल में एक पेपर प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने तर्क दिया कि जीलैंडिया एक महाद्वीप के लिए निर्धारित सभी मानदंडों को पूरा करता है। उन्होंने इस तथ्य की ओर इशारा किया कि जीलैंडिया का एक विशिष्ट भू-वैज्ञानिक इतिहास, एक अनूठा पारिस्थितिकी तंत्र और एक अच्छी तरह से परिभाषित सीमा है, जिसके आधार पर पूरे विश्वास के साथ इसे एक महाद्वीप कहा जा सकता है।

इसके बाद भू-वैज्ञानिकों ने इसका संभावित मानचित्र बनाना शुरू कर दिया। इसी का अद्यतन संस्करण बीते सप्ताह सार्वजनिक किया गया है। क्षेत्रफल में लगभग आस्ट्रेलिया के बराबर, जीलैंडिया की खोज संभव हुई सैटेलाइट इमेजरी और मैपिंग टेक्नोलॉजी में हुई प्रगति की बदौलत, जिसकी मदद से खोजकर्ताओं को न्यूजीलैंड से न्यू कैलेडोनिया के बीच फैले समुद्र की सतह से झांकते इस महाद्वीप के एक बड़े हिस्से को पहचानना संभव हो सका।
जीलैंडिया की खोज में मददगार बनी प्रमुख प्रौद्योगिकियों में पहली है, सैटेलाइट अल्टीमेट्री। यह तकनीक उपग्रहों का उपयोग कर समुद्र की सतह की ऊंचाई मापती है। यह ऊंचाई मापकर वैज्ञानिक उन क्षेत्रों की पहचान कर सकते हैं जहां समुद्रतल आसपास के क्षेत्र से ऊंचा या नीचा है। दूसरी तकनीक ओशन जिओफिजिक्स है। इसके अंतर्गत समुद्र तल के नीचे पृथ्वी की परत का अध्ययन किया जाता है और उन क्षेत्रों की पहचान कर सकते हैं जहां यह परत बेहद मोटी या पतली है।
इन तकनीकों के उपयोग से वैज्ञानिकों के लिए दक्षिण प्रशांत महासागर में समुद्र तल का एक विस्तृत नक्शा बनाना संभव हुआ। इस मानचित्र से महाद्वीपीय परत के एक बड़े क्षेत्र का पता चला जो पहले अज्ञात था।
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि ज़ीलैंडिया कभी सुपरकॉन्टिनेंट गोंडवाना का हिस्सा था, जिसमें भारत, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका, अंटार्कटिका और अफ्रीका शामिल थे। गोंडवाना लगभग 18 करोड़ साल पहले टूटना शुरू हुआ और अंततः जीलैंडिया ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका से अलग हो गया।
लगभग 10.5 करोड़ साल पहले जीलैंडिया प्रशांत महासागर में डूबने लग गया था और इसके बाद के करीब आठ करोड़ सालों में यह पूरी तरह समुद्र के गर्भ में समा गया। 380 साल पहले वर्ष 1642 में डच व्यापारी और नाविक एबेल तस्मान ने इस जगह का अंदाजा लगा लिया था और वह इस विशाल दक्षिणी महाद्वीप पर जाना भी चाहते थे। वह आज के न्यूजीलैंड तक पहुँचने में सफल रहे लेकिन वहां के द्वीपों पर बसे माओरी लोगों के हमले के कारण उन्हें द्वीप पर उतरने का अवसर नहीं मिला और लौटना पड़ा।
करोड़ों साल से जलमग्न इस द्वीप के अस्तित्व का विचार हमेशा हमें आंदोलित करता रहा, जो ढाई करोड़ साल से समुद्र की सतह से एक से दो किलोमीटर की गहराई पर आराम से सोया हुआ था। 1820 में रूसियों द्वारा अंटार्कटिका महाद्वीप की खोज के दो सदियों बाद, करीब 49 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले जीलैंडिया की खोज काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बेशक अभी भी इसका 94% हिस्सा समुद्र के भीतर ही छिपा हुआ है, लेकिन वैज्ञानिक इस इस खोज से बहुत रोमांचित और आशान्वित हैं। उन्हें लगता है कि यह खोज न सिर्फ हमें पृथ्वी के जिओलॉजिकल इतिहास और विकासक्रम को समझने में मददगार साबित होगी, बल्कि मानवजाति के लिए भी संभावनाओं के नए द्वार खोल सकती है। लेकिन, जैसा कि हर नई खोज के साथ होता है, जीलैंडिया के सामने आने से अगर बहुत सारी आशाएं जगी हैं तो कई तरह की आशंकाएं और चिंताएं भी सिर उठाने लगी हैं।
आज हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जब अधिकतर भूभाग में इंसानी आबादी तरह-तरह के जलवायु खतरों का सामना कर रही है, कहीं समुद्र के जलस्तर में वृद्धि तो कहीं तापमान में। विश्वबैंक के मुताबिक जलवायु परिवर्तन की समस्या के चलते क्लाइमेट रिफ्यूजियों की संख्या लगातार बढ़़ रही है, जो वर्ष 2050 तक बढ़कर 21.6 करोड़ हो जाएगी। इन विस्थापितों को बसाने के लिए जीलैंडिया एक आदर्श गंतव्य बन सकता है। इसके अलावा इस क्षेत्र में भारी मात्रा में प्राकृतिक संसाधनों, खनिजों और कीमती पदार्थों के होने की संभावना जताई जा रही है। इस लिहाज से भी यह मानव जाति की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने में काफी मददगार सिद्ध हो सकता है।
हालाँकि, ये सिर्फ संभावनाएं हैं। इन्हें लेकर मुदित होने की बजाए हमारे लिए उन चुनौतियों के बारे में यथार्थवादी होना ज्यादा जरूरी है, जो इस महाद्वीप पर स्थायी बस्तियाँ स्थापित करने की हमारी महत्वाकांक्षाओं के आड़े आ सकती हैं। जैसे कि पहली बाधा तो दूरी ही है। ज़ीलैंडिया दक्षिण प्रशांत महासागर के मध्य में स्थित है, और अन्य प्रमुख भू-भागों से बहुत दूर है। इससे इस महाद्वीप तक लोगों और सामानों का परिवहन कठिन और काफी खर्चीला विकल्प हो सकता है।
दूसरी समस्या है कि इसे रहने योग्य बनाने के लिए हमें यहॉं सड़कें, हवाई अड्डे और बिजली ग्रिड जैसे बुनियादी ढांचे विकसित करने की जरूरत होगी, जिसकी वजह से यहॉं की मौजूदा जैवविविधता और पारिस्थितिकी खतरे में पड़ सकती है। तीसरी समस्या यह है कि हमें यहॉं की वास्तविक परिस्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं के प्रति क्षेत्रीय संवेदनशीलता के बारे में कुछ भी पता नहीं है, हो सकता है कि यह ऐसा क्षेत्र हो, जहॉं भूकंप और सुनामी आदि का खतरा अपेक्षाकृत अधिक हो।
इस द्वीप को आबाद करने के प्रयासों को संरचनागत और प्राकृतिक चुनौतियों के अलावा कई प्रकार की भू-राजनीतिक चुनौतियों का सामना भी करना पड़ सकता है। जैसे सबसे पहला प्रश्न तो यही उठेगा कि इस विशाल द्वीप पर, इस पर मौजूद संसाधनों पर, इसकी संभावित संपदाओं पर किसका अधिकार होगा। जहॉं तक समुद्र पर स्वामित्व का प्रश्न है, तो समुद्रों और महासागरों को 'ग्लोबल कॉमन्स' माना जाता है, जिसका अर्थ है कि उनका कोई स्वामी नहीं है। अपनी समग्रता में वे सभी के हैं। फिर भी संभावित विवादों से बचने के लिए यूनाइटेड नेशन्स कन्वेंशन ऑन लॉ ऑफ द सी (अनक्लॉस) मौजूद है।
95% जीलैंडिया अभी समुद्र के भीतर गहराई में डूबा हुआ है। जब यह पूरा बाहर आ जाएगा तो इसके सबसे करीबी देश आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और फ्रांसीसी आधिपत्य वाले न्यू कैलेडोनिया होंगे, जो इससे क्रमश: 2500, 600 और 400 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। कानूनन इस पर भले ही किसी का दावा तर्कसंगत न हो, लेकिन इसके संसाधनों पर कब्जे के लिए अगर कोई प्रतिस्पर्द्धा होती है तो वह इन्हीं तीन देशों के बीच होगी। ऐतिहासिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टि से न्यूजीलैंड का दावा सबसे मजबूत है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस के भी वैध दावे हैं, जिनके आर्थिक और सामरिक हित इससे जुड़े हो सकते हैं।
दक्षिण प्रशांत महासागरीय क्षेत्र, जहॉं कि यह महाद्वीप मौजूद है, दशकों से चीन और अमेरिका जैसे कई महत्वाकांक्षी देशों की दिलचस्पी का विषय रहा है। ऐसे में जीलैंडिया को लेकर भविष्य में कई तरह के अंतरराष्ट्रीय विवाद उत्पन्न होने की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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