Yamuna: यमुना हमारे घर में नहीं आईं, हम यमुना के मार्ग में बस गये हैं

Yamuna: दिल्ली में लाल किले के पास यमुना नदी के किनारे बसे छोटे से इलाके को यमुना बाजार कहते हैं। इस बसावट में ज्यादा कुछ नहीं है। कुछ मंदिर हैं। एक अस्पताल है और निगमबोध श्मशान घाट है। यहीं पर अंग्रेजों द्वारा बनाये गये 'लोहे के पुल' के पास एक सरकारी खंभा गड़ा हुआ है। इस खंभे पर ही खतरे का वह निशान बना हुआ है जिसे देखकर बताया जाता है कि यमुना नदी कब और कितना इस निशान को पार कर गयी। वैसे तो सालभर यमुना के इस हिस्से में गाद, गंदे नालों का काला मटमैला सड़ांध से भरा हुआ पानी ही नजर आता है लेकिन बारिश के दिनों में थोड़ा पानी ऊपर की ओर चढ़ता है और अक्सर खतरे के निशान को पार कर ही जाता है।

इस साल भी ऐसा ही हुआ है। बताया जा रहा है कि दिल्ली में यमुना नदी का जलस्तर लगभग 208 मीटर तक पहुंच गया है जो 45 साल का रिकार्ड तोड़ रहा है। खतरे के निशान बनाने का अपना सरकारी तरीका होता होगा लेकिन जिस जगह पर खतरे के निशान वाला यह पिलर लगा है ठीक उसी जगह के आगे पीछे यमुना नदी में इतनी गाद जमा है कि तरीका कोई भी अपनाया जाए नदी में जलस्तर का ठीक अनुमान लगा पाना कठिन ही होगा। इसकी गाद साफ करने के लिए पिछली बार कब कोशिश की गयी थी, किसी को पता नहीं।

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वजीराबाद बैराज से चंद मीटर आगे नजफगढ़ नाला आकर यमुना में मिलता है। किसी जमाने में यह नदी होती थी जिसको साहिबी नदी कहते थे। लेकिन अब यह एक कुख्यात गंदा नाला है जो वजीराबाद बैराज के पास यमुना नदी में इतना कचरा उड़ेल देता है कि दिल्ली में यमुना देश की सबसे अधिक प्रदूषित नदी बन जाती है। इस नजफगढ़ नाले से लेकर लोहेवाले पुल के बीच ही सबसे अधिस सिल्ट या गाद जमा होती है। यमुना के इसी हिस्से में मेट्रो ब्रिज, सिग्रेनचर ब्रिज, नया रेलवे ब्रिज सब बन गया लेकिन कभी इस हिस्से की गाद साफ करने की कोशिश नहीं की गयी। नदी के साथ लापरवाही का आलम यह है कि लोहेवाले पुल के पास जो नया रेलवे ब्रिज निर्माणाधीन है उसके दो भारी भरकम बेस यमुना नदी में धंस चुके हैं। विशाल कंक्रीट के ये दो बड़े ढांचे ठीक यमुना के मुख्य बहाव वाले रास्ते में ही थे लेकिन तकनीकी खामियों की वजह से वो यमुना में धंस गये। रेलवे अब नये सिरे से पिलर बनाकर अपना प्रोजेक्ट पूरा कर रहा है लेकिन जिस सिल्ट या गाद की वजह से यह समस्या आयी, उसे हटाने का प्रयास पिलर धंसने के बाद भी नहीं किया गया।

इसी साल मार्च में दिल्ली के उप राज्यपाल वीके सक्सेना ने एक मीटिंग करके जलबोर्ड के अधिकारियों को निर्देश दिया था कि जुलाई में मानसून आने से पहले 200 किलोमीटर लंबे मुख्य सीवर लाइन की 100 प्रतिशत सफाई कर दी जाए। उन्होंने खुद माना कि बीते कई सालों से चोक पड़े मुख्य सीवर लाइन की सफाई नहीं की गयी है जो यमुना की स्वच्छता में सबसे बड़ी बाधा है। लेकिन यमुना में आयी गाद को साफ करने की बात उन्होंने भी नहीं की। दिल्ली में यमुना की सफाई का सारा जोर एसटीपी बनाने या मुख्य सीवर लाइन की सफाई पर रहता है वह भी आज तक संभव नहीं हो पाया है। लेकिन जो गाद यमुना में जमा हो गयी है और जिसने नदी में पानी के बहाव को उथला कर दिया है, उसे हटाने पर कभी कोई बात नहीं होती।

लेकिन यह सिल्ट या गाद यमुना नदी में आयी 'कथित बाढ़' का पहला कारण है। दूसरा कारण उससे भी भयावह है। यह दूसरा कारण यमुना नदी के फ्लड प्लेन का अतिक्रमण है। लोहे वाले पुल के दूसरी ओर जो शास्त्री पार्क मेट्रो स्टेशन, डिपो, कर्मचारियों का आवास और मेट्रो साइबर सिटी बनी है, 25 साल पहले तक वह यमुना फ्लड प्लेन का हिस्सा होता था। बारिश के दिनों में वजीराबाद बैराज के सभी दरवाजे खोल दिये जाते थे तो करावल नगर, शास्त्री पार्क और लक्ष्मी नगर वाले फ्लड प्लेन में ही यह पानी फैला करता था। नदी का पानी जैसे जैसे कम होता था, यह अतिरिक्त पानी उतरकर दोबारा नदी के रास्ते आगे निकल जाता था।

लेकिन दिल्ली मेट्रो की जरूरतों ने इस फ्लड प्लेन का कानूनी रूप से अतिक्रमण करके इसको कंक्रीट से भर दिया है। दिल्ली मेट्रो के दो बड़े डिपो शास्त्री पार्क डिपो और यमुना डिपो नदी के इसी फ्लड प्लेन में बने हैं। कोई ज्यादा समय नहीं बीता 15-16 साल पहले लक्ष्मी नगर के पास एक बांध होता था। उस बांध की दूसरी ओर यमुना नदी की सीमा थी जिसमें कोई निर्माण नहीं था। लेकिन अब न केवल यमुना डिपो बना दिया गया बल्कि इसी फ्लड प्लेन में यमुना बैंक मेट्रो स्टेशन के साथ कर्मचारियों के लिए कुछ बिल्डिंग भी बनायी गयी है।

असल में आज से चालीस पचास साल पहले करावल नगर से मयूर विहार तक एक तटबंध लगभग एक सीधी रेखा में होता था। इस तटबंध के दूसरी ओर यमुना के फ्लड प्लेन में सादतपुर गुजरान, सभापुर, गढी मेंडू जैसे कुछ गांव ही थे। इसके अलावा कुछ झुग्गी बस्तियां जरूर बनीं लेकिन इस फ्लड प्लेन में कोई स्थाई निर्माण नहीं था। लेकिन आज सेनिया विहार, श्रीराम कोलॉनी जैसी दो बड़ी अवैध कॉलोनियां उभर आयी हैं जिसमें लाखों लोग रहते हैं। इसके अलावा दिल्ली मेट्रो के दो डिपो, दो स्टेशन, कर्मचारियों के आवास, अक्षरधाम मंदिर, कॉमनवेल्थ गेम्स विलेज, डीटीसी का एक हजार बसों वाला डिपो, मजनू टीला की बस्ती, कुदैशिया घाट के पास रिफ्यूजी मार्केट, यमुना बाजार, राजघाट, गांधी दर्शन एवं अनुसंधान समिति, इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम, दिल्ली सरकार का सचिवालय, राजघाट पॉवर हाउस और प्रगति पॉवर हाउस एक लंबे अंतराल में यमुना के इसी फ्लड प्लेन में बनाये गये हैं।

यमुना नदी से सटे जिस हिस्से में रिंगरोड है वह भी कभी फ्लड प्लेन का हिस्सा हुआ करता था। इसे प्रत्यक्ष रूप से देखने के लिए कोई लाल किले के पिछले हिस्से में जाकर देख सकता है। उसके पिछले हिस्से का जो निर्माण है वो इस बात का प्रत्यक्ष सबूत है कि जब लाल किला बना था तब यमुना का पानी वहां तक फैलता था। लेकिन समय के साथ जैसे जैसे जमीन की जरूरतें बढ़ती गयीं, सरकारी नोटिफिकेशन के जरिए लोग यमुना के मार्ग में बसते चले गये। कभी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि राजघाट बनाकर तो कभी दिल्ली मेट्रो का यमुना डिपो बनाकर।

निश्चय ही ऐसे निर्माण करने से पहले फाइलों में कानूनी फेरबदल भी किये गये होंगे लेकिन नदी फाइलों में लिखी नोटिफिकेशन को पढ़कर अपना रास्ता कहां बनाती है? वह अपने बहाव के रास्ते को कभी नहीं भूलती। जब उसके पास अतिरिक्त पानी जमा होता है तो वह पुराने फैलाव की खोज में दायें बायें बढ़ने की कोशिश करती है। उसकी इस कोशिश में जो निर्माण रुकावट बनता है वह उसे भी डुबा देने में संकोच नहीं करती। जैसे इस बार हो रहा है। वही इलाके डूब रहे हैं जो कभी यमुना नदी का फ्लड प्लेन हुआ करते थे।

लेकिन इस बार एक खतरा और है। अगर चोक पड़े नालों से गंदा नाला आगे बढ़ने की बजाय पीछे की ओर लौटेगा तो दिल्ली के वो इलाके भी डूबेंगे जो डूबक्षेत्र में नहीं आते। यह सब इसलिए होगा क्योंकि हमारी योजनाओं ने एक नदी की दुर्गति करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इसलिए अक्सर जब यमुना नदी में पानी बढ़ता है तो यमुना मैया अपना पुराना ठौर पाने के लिए नये तटबंधों को पार कर अपने पुराने ठिकानों की तलाश में निकल जाती हैं। शोर मचता है कि दिल्ली में बाढ़ आ गयी।

इस शोरगुल से नदी के स्वभाव को कोई फर्क नहीं पड़ता। हम यह शोर मचाकर अपने आप को तो भ्रमित कर सकते हैं कि नदी का पानी घरों में घुस गया है लेकिन नदी को भला कैसे भ्रमित करेंगे जो हमारे अस्तित्व में आने के पहले से मौजूद है? यमुना मैया तो हमारे होने के पहले से यहां मौजूद हैं और हमारे न होने के बाद भी मौजूद रहेगी लेकिन उनके मार्ग में घुस कर हम जो अपना घर बना रहे हैं, उसकी कीमत तो हमें पीढ़ी दर पीढ़ी बार-बार चुकानी ही पड़ेगी।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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