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Debate on Kantara film: मूलनिवासी की राजनीतिक बहस में ‘कांतारा’ ने दिखाई सही राह

Debate on Kantara film: इन दिनों आदिवासियों को लेकर फिल्में बनाने की एक मुहिम सी छिड़ गई है। जिस तरह विदेशों में ब्लैक या जंगलों में रहने वाले आधुनिक समाज से कटे समुदायों पर फिल्में बनना शुरू हुई, उसका असर अब भारतीय सिनेमा पर भी देखने को मिल रहा है।

Debate on kantara movie review

आइडियाज की तलाश में भटक रहा भारतीय सिनेमा देर से ही सही इस चलन को अब अपनाने लगा है, जिसकी शुरूआत दक्षिण भारत से हुई है। इसके मूल में काफी हद तक उन फिल्मकारों का गुट है, जो तथाकथित मूलनिवासी या दलित आदिवासी नैरेटिव से प्रभावित है।

हालांकि शुरूआत स्थापित सनातन परम्पराओं पर सांकेतिक तरीके से उंगली उठाने से ही हुई थी। 2010 में मणिरत्नम की 'रावण', जिसमें विक्रम के साथ अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय की जोड़ी थी। इसमें अभिषेक को सांकेतिक तौर पर राम, विक्रम को रावण और ऐश्वर्या को सीता दिखाया गया था। रावण रूपी विक्रम सीता रूपी ऐश्वर्या को किडनैप करता है, अभिषेक रूपी राम उसे ढूंढ लेता है, लेकिन ऐश्वर्या वापस जाने को तैयार नहीं दिखती। उसे रावण रूपी विक्रम से एक लगाव सा हो जाता है। यानी रावण को इसमें बुरा नहीं दिखाया गया था।

2018 में आई रजनीकांत की 'काला' में भी ये उलटबांसी देखने को मिली। एक गुंडे के हाथ में गदा पकड़ाकर रजनीकांत की लंका में आग लगाने वाले सीन में तो हदें ही पार हो गईं थीं। दक्षिण में 'आरक्षण' जैसी तमाम मूवीज ऊंची जाति के लड़के के घरवालों द्वारा नीची जाति की लड़की पर अत्याचार को लेकर बनी हैं।

लेकिन अब आदिवासी केन्द्र में आने लगे हैं। पिछले साल 'जय भीम' आई। कहानी आदिवासियों के रहन-सहन और आजीविका के लिए चूहे-सांप आदि पकड़ने के साधनों पर ही फोकस करती है। इससे पहले आई हिंदी की 'भोर' में भी निर्देशक कामाख्या नारायण सिंह ने बिहार की मुसहर जाति की लड़की के पढ़ाई जारी रखने के संघर्ष को दिखाया।

हाल ही में आई तेलुगु की 'पुष्पा' कर्नाटक के जंगली आदिवासी इलाकों में रहने वाले लोगों की लाल चंदन तस्करी के अवैध व्यवसाय पर है। एंटरटेनिंग ज्यादा है, आदिवासी समस्या से कोई मतलब नहीं।

तेलुगू फिल्म 'आकाशवाणी' एक ऐसे गांव की कहानी है, जिसके लोगों को सदियों से जमींदार ने गलत अफवाह फैलाकर गांव से बाहर निकलने से मना किया हुआ है। उसके गुंडे सारा सामान वहीं लाकर उन भोले भाले लोगों को देते रहते हैं, लेकिन एक दिन गलती से किसी लड़के को रेडियो मिल जाता है और वो जब बीच बीच में बोलता है तो गांव वाले उसे भगवान मान लेते हैं।

पिछले साल इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (IFFI), गोवा की ओपनिंग फिल्म 'शेमखोर' पर भी विवाद हो गया था। ये उत्तर पूर्व के आदिवासियों की एक ऐसी प्रथा को लेकर बनी थी, जिसमें अगर बच्चा जनते समय मां की मौत हो जाए तो बच्चे को भी उसके साथ जिंदा दफना देते थे। जब आदिवासियों के संगठनों ने विरोध किया कि ऐसी कोई प्रथा नहीं है तो इसकी निर्देशक और हीरोइन एमी बरुआ ने सफाई दी कि उन्होंने अखबारों आदि में पढ़ा था।

यूं हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में आदिवासी या वनवासी किरदार शुरू से ही फिल्म के हीरो के करीबी दोस्त की भूमिका में नजर आते रहे हैं। धर्मेन्द्र की फिल्म 'ललकार' में कुमकुम के आदिवासी लड़की के किरदार से लेकर हालिया फिल्म 'रामसेतु' तक में श्रीलंका के जंगलों में अक्षय कुमार के किरदार की सहायता एपी यानी अंजनि पुत्र को करते दिखाया गया है। इस दिशा में 'शमशेरा' ने इस चलन को बदलने की कोशिश की है।

रणवीर कपूर की 'शमशेरा' में थोड़ा थोड़ा दक्षिण की फिल्मों के चलन को आजमाने की कोशिश की गई, और एक ऐसी जाति या कबीले का संघर्ष दिखाया गया, जो अंग्रेजों को मुंह मांगी दौलत देकर अपने ऊपर लगा नीची जाति का टैग हटाना चाहता है। लेकिन कहानी इतनी फिल्मी और फॉर्मूलों से भरपूर थी कि लोग समझ नहीं पाए।

इसी तरह RRR में भी कहानी आदिवासियों के दो बड़े चेहरों जल, जंगल जमीन का नारा देने वाले कोमाराम भीम और अल्लूरी सीताराम राजू के किरदारों के सहारे रची गई है, लेकिन किरदार सच्चे और कहानी झूठी। ऐसे में इस मूवी का उद्देश्य केवल मनोरंजन ही था, आदिवासियों के महापुरुषों के किरदार रखने से बस इतना लाभ हुआ कि देश की युवा पीढ़ी उन्हें जान गई।

बहुत पहले 1983 में एक मलयालम मूवी आई थी, 'मलामुकलिले दैवम'। इस मूवी को उस साल बेस्ट रीजनल फिल्म का नेशनल अवॉर्ड मिला था। कहानी थी आदिवासियों के एक ऐसे कबीले की जो पहाड़ों के बीच घाटी में रहता है और मानता है कि यही है पूरी दुनिया। अगर इन पहाड़ों पर चढ़कर पार जाने की कोशिश की तो देवता नाराज हो जाएंगे और मौत निश्चित है। फिर गांव का एक लड़का उनका भरोसा जीतकर एक दिन उनके इस अंधविश्वास को तोड़कर उन्हें पहाड़ लांघकर बाहर की दुनिया दिखाने में कामयाब होता है।

आदिवासियों को लेकर बनने वाली मूवीज भारत की किसी भी भाषा में बनी हों, आमतौर पर उनमें अंधविश्वास को दूर करने जैसी बातें होती थीं। लेकिन 'कांतारा' ने इस चलन को पूरी तरह बदल के रख दिया है। 'कंतारा' कई मामलों में अलग किस्म की मूवी है।

विदेशी हॉरर फिल्मों की तरह यह किसी जमीन या खास इलाके से जुड़े देवता के क्रोधित होकर सब कुछ भस्म कर देने जैसी कहानी भर नहीं है, बल्कि एक तार्किक ढंग से आदिवासियों के रहन सहन, सोच और उनकी मान्यताओं को दर्शाती है।

कहानी एक राजा की है, जो शांति की तलाश में भटक रहा है और वो उसे मिलती है आदिवासियों के एक ग्राम देवता की मूर्ति के सामने। वो मूर्ति को इस शर्त पर ला पाता है कि जहां तक उनके मेले में उस देवता का रूप धरे व्यक्ति की आवाज जाएगी, उतनी जमीन आदिवासियों को देगा। चूंकि ये कहानी एक गांव वाला दूसरे को सुना रहा है, सो अतार्किक नहीं लगती।

मूवी में देवता कोई चमत्कार करता नहीं दिखता, लेकिन लोग उसके रूप रखने वाले के जरिए इस चमत्कार को महसूस करते हैं। मानसिक तौर पर देखा जाए तो ये आम घरों में महिलाओं पर आने वाली देवी की घटनाओं जैसा है। यानी किसी को प्रताड़ित जरुरत से ज्यादा करोगे, तो उसका गुस्सा किसी देवता से जुड़कर असीम ताकत और कड़े प्रतिरोध के रूप में अजीबगरीब प्रतिक्रिया के तौर पर सामने आ सकती है। वहीं जो मानने वाले हैं, वो इसे देवता का असर भी बता सकते हैं, दोनों पक्षों को रिषभ शेट्टी ने बेहतरीन ढंग से संतुलित किया है और यही एक वजह है कि 'कांतारा' की इतनी तारीफ हो रही है।

सो, लोगों को समझना होगा कि आदिवासियों का राजनीतिक तौर पर इस्तेमाल तो हमेशा से होता आया है। लेकिन उनके जीवन दर्शन में झांकने का प्रयास कम किया गया है। जबकि 'कांतारा' उनकी सोच और समस्याओं, दोनों पहलुओं को बेहतरीन तरीके से सामने रखती हैं।

यह भी पढ़ें: Films and Faith: धार्मिक विषयों पर बनने वाली फिल्मों से धर्म को फायदा या नुकसान ?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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