Contraceptives: अनचाहे गर्भ से बचने का सारा भार स्त्रियों पर ही क्यों?
Contraceptives: बात अनचाहे गर्भ की हो, गर्भ धारण ना करने की हो, संतति के रूप में बेटा या बेटी की इच्छा की बात हो या गर्भनिरोधक उपायों के उपयोग की, हमारी सोच एक निश्चित मानकों पर ही चलती है। कोई भी इन मानकों के इतर जाने का प्रयास करता है तो वह स्वीकार्य नहीं होता है। यह हाल तो तब है जब हम जागरूक हुए हैं। जागरूकता के इस 'छद्म आवरण' को अगर हम हटा कर देखे तो हमें अभी भी सच्चाई कुछ और नज़र आएगी। गर्भ धारण को रोकने के तरीके, स्त्री या पुरुष दोनों में से किसके द्वारा उन उपायों को अपनाया जाएगा, अपनाया जाएगा भी या नहीं, ये सब स्त्री- विषय होते हुए भी पुरुष निर्धारित कर रहे हैं।
हमारे समाज में स्त्री पुरुष के बीच के अंतर को समझने का यह एक बढ़िया उदाहरण है। पुरुष प्रधान सोच को इससे बेहतर तरीके से नहीं समझा जा सकता है जहाँ वो अपने कम्फर्ट ज़ोन से बिल्कुल नहीं निकलना चाहता। जहाँ उसकी पसंद और सहूलियत ही मायने रखती है। सुरक्षित उपाय ना करने से स्त्री बार- बार गर्भ धारण कर लेती है जिसकी परिणीति गर्भपात के रूप में होती है। भारत में 67% गर्भपात सुरक्षित नहीं हैं जिसके कारण प्रति दिन 8 स्त्रियों की मृत्यु होती है। पते की बात यह भी है कि हमें यह समझने की भी जरूरत महसूस नहीं होती कि एक स्त्री शरीर और मन से कितने गर्भपात झेल सकती है।

बात एहतियात के बावजूद अनचाहे गर्भ से मुक्ति की होती तो शायद थोड़ी सहानुभूति होती। मगर जानबूझकर आमन्त्रित की गई ऐसी अमानवीय परिस्थितियों के लिये आखिर कौन जिम्मेदार है? आंकड़ें बताते हैं हमारे देश में लगभग 6% पुरुष कंडोम का उपयोग करते हैं। 4% महिलाएं कंट्रासेप्टिव पिल्स का उपयोग करती हैं। वहीं गर्भाशय का ऑपरेशन करवा कर आजीवन अनचाहे गर्भ से छुटकारा पाने वाली 34% महिलायें हैं। पुरूष में नसबंदी का प्रतिशत मात्र 1% ही है। जबकि स्त्री और पुरुष में नसबंदी के ऑपरेशन की जटिलता देखी जाए तो स्त्रियों में यह ज्यादा वृहद और जटिल है।
स्त्री नसबंदी की तुलना में पुरुष नसबंदी एक सरल और सुरक्षित प्रक्रिया है। वास्तव में, पुरुष नसबंदी में कोई टांके नहीं होते हैं। साथ ही, अगर किसी परिस्थिति में ऑपरेशन द्वारा की गई नसबंदी की प्रक्रिया को रिवर्स करना हो अर्थात वापस माता/पिता बनने की क्षमता लानी हो तो पुरुष नसबंदी को बेहतर, सरल और प्रभावी माना जाता है। आखिर हमारे देश में पुरुषों द्वारा कंडोम उपयोग ना करना, नसबंदी की प्रक्रिया से स्वयं ना गुजरना, स्त्री के मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक स्वास्थ्य की अनदेखी करके आपातकालीन कंट्रासेप्टिव पिल्स का बार-बार उपयोग और गर्भपात जैसी क्रियाओं की पुनरावृत्ति क्या दर्शाती है?
आंकड़ें बताते हैं पुरुष कंडोम का उपयोग कई कारणों से नहीं करना चाहते। इनमें प्रमुख कारण है उनकी मर्दानगी और यौन सुख में कमी आने की आशंका तथा कंडोम खरीदने में शर्म महसूस होना। जबकि वैज्ञानिक तथ्य यह है कि कंडोम के उपयोग से किसी भी प्रकार से पुरुष के यौन सुख में कमी नहीं आती है। बल्कि एस.आई.टी. अर्थात सेक्सुअली ट्रांसमिटेड इंफेकशन की रोकथाम में मदद मिलती है। शर्म की बात तो समझ के परे है और जब आपको अपनी पार्टनर के लिए पिल्स खरीदते समय, गर्भपात की दवाइयों को लेते समय शर्म महसूस नहीं होती तो स्वयं के लिए गर्भनिरोधक लेने में शर्म कैसी?
किसी भी गर्भनिरोधक का स्वयं उपयोग पुरुष के लिए पौरुष को चुनौती देने वाला मामला बन जाता है। मर्दानगी को परिभाषित करने का इसका तरीका इतना अनोखा और समझ के परे है कि उसके इस अहम पर चोट ने राजनैतिक सत्ता परिवर्तन तक कर दिया था। आपातकाल में पुरुषों की नसबंदी को 1977 में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनने की एक बड़ी वजह माना गया था। उस समय के आंकड़े के हिसाब से 60 लाख पुरुषों की नसबन्दी कराई गई थी। हालांकि इसमें कुछ मामले 16 साल के किशोर और 70 साल के बुजुर्ग के भी शामिल थे जो विषय को अलग आयाम देते हैं पर यह तो तय था कि पुरुष नसबंदी भी इंदिरा गांधी सरकार की सत्ता वापसी में रोड़ा बनी थी।
आखिर हमारे देश में पुरुषों द्वारा कंडोम उपयोग ना करना, नसबंदी की प्रक्रिया से स्वयं ना गुजरना, स्त्री के मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक स्वास्थ्य की अनदेखी करके आपात कालीन कंट्रासेप्टिव पिल्स का बार-बार उपयोग और अबोर्शन जैसी क्रियाओं की पुनरावृत्ति कौन सी मानसिकता को दर्शाती है?
स्त्री अगर दुर्गा है तो उसे कोमलांगी भी कहते हैं। बौद्धिक रूप से वह सशक्त है तो अति भावुक भी है। बार-बार गर्भपात के लिए ली गई गोलियां भी शरीर पर कितना दुष्प्रभाव डालती हैं यह इस बात से ही स्पष्ट हो जाता है कि तीन बार गर्भपात के लिए उपयोग में लाई गई गोलियां माँ बनने की क्षमता को कम कर देती है। बार-बार गर्भपात करवाने को सर्वाइकल अक्षमता से जोड़ा गया है। गर्भाशय ग्रीवा जो गर्भाशय का मुंह है, गर्भावस्था को रोकने के लिए ढीली हो जाती है जिससे भविष्य में सहज गर्भपात हो जाता है।
कई अध्ययनों से पता चला है कि बहुत अधिक गर्भपात के इतिहास वाली महिलाओं में जीवन के लिए खतरनाक और गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं जैसे उच्च रक्तचाप, हृदय रोग और टाइप 2 मधुमेह विकसित होने का अधिक खतरा होता है। इससे महिला में आयरन की कमी और एनीमिया हो सकता है। मासिक धर्म चक्र अनियमित हो जाता है और यदि कई बार सर्जिकल गर्भपात किया गया हो तो प्रवाह कम हो जाता है।
इतने शारीरिक खतरों के बाद भी अगर कोई पुरुष यह प्रयास करता है कि गर्भधारण करने वाली स्त्री पर ही गर्भ धारण न करने का सारा बोझ डाल दिया जाए तो यह कितना न्यायसंगत होगा? एक स्त्री की शारीरिक और मानसिक अवस्था वंश की उत्कृष्टता को सुनिश्चित करती है। पुरुष समाज को इस बारे में स्वयं निर्णय करना चाहिए कि उनके लिए जरूरी क्या है? गर्भ निरोध को लेकर अपने लिए अपनाये जाने वाला सुविधाजनक ढुलमुल रवैया या फिर स्त्री की सुरक्षा और आनेवाली नस्लों की गुणवत्ता?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications