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ताइवान पर ‘ओपिनियन वार’ में चीन बार बार क्यों हार जाता है?

ताइवान की स्थिति लगभग और थोड़े से भिन्न संदर्भ में वैसी ही है जैसे सन् 1961 से पूर्व हमारे यहाँ गोआ की थी। फर्क ये था कि गोआ विदेशी आधिपत्य में था, ताइवान में ऐसी बात नहीं है। आप चाहें तो इसकी तुलना भारत और पाकिस्तान से कर सकते हैं जो 14 अगस्त 1947 तक एक ही देश थे। अब हमारे नेताओं ने तो विभाजन को स्वीकार कर लिया, हालाँकि हमारे राष्ट्रपिता ऐसी बात स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। लेकिन चीन की मुख्यभूमि और वहाँ के सर्वोच्च नेताओं ने न तो तब ताइवान को अलग स्वीकार किया था, न अब मानने को राजी हैं।

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    China lose in the opinion war on Taiwan

    ताइवान चीनी अस्मिता का प्रश्न है। ताइवान की स्वतंत्रता चीन की एक राष्ट्र नीति को सीधी चुनौती है, जिसे दुनिया के अधिकांश देशों ने मान्यता दे रखी है। अमेरिका ने भी और भारत ने भी, जो उसके विरोधी माने जाते हैं। दोनों देशों की भाषाएं और नस्ल एक हैं और ताइवान के प्रथम राष्ट्रपति च्यांग काई शेक पहले चीन के ही राष्ट्रपति थे।

    आप इसे ऐसे समझिए कि अंग्रेजों के जाने के बाद भारत के दो टुकड़े हुए और भारत ने पाकिस्तान के अलग अस्तित्व को मानने से इनकार कर दिया। चलिए, वैसा नहीं मानते हैं। ये मान लीजिए कि आजादी के बाद पटेल और नेहरू में झगड़ा हो गया और पटेल ने देश के एक हिस्से में जाकर स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर ली और नेहरू दूसरे हिस्से में बने रहे। जो बड़ा हिस्सा था, वो दूसरे हिस्से के अस्तित्व को मान नहीं रहा है।

    ऐसे में पेंच कहाँ हैं? आखिर जो दुनिया चीन की 'वन नेशन थ्योरी' को मानने के लिए राजी है, वह ताइवान के पक्ष में क्यों है? ये 'ओपिनियन वार' चीन हार क्यों जाता है? खुद ताइवान भी मानता है कि वो चीन ही है, लेकिन वो कहता है कि 'एकीकरण' तभी होगा जब चीन में लोकतंत्र आ जाएगा।

    सन् 1949 में जब माओत्से तुंग के नेतृत्व में कम्यूनिस्ट पार्टी ने चीन की मुख्य भूमि पर आधिपत्य कर लिया तो वहाँ की पुरानी शासक पार्टी कुओमिंगतांग दल और उसके नेता च्यांग काई शेक, जो चीन के राष्ट्रपति थे,पलायन कर फारमोसा द्वीप यानी ताइवान चले गए और वहाँ उन्होंने स्वतंत्र राष्ट्र की स्थापना की। उसे रिपब्लिक ऑफ चाइना कहा गया, अभी भी कहा जाता है। इधर चीन को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना कहा जाता है।

    बहुत बाद तक सन् साठ के दशक के आखिर तक संयुक्त राष्ट्र में ताइवान को ही चीन का दर्जा हासिल था और वही सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्यों में था। ऐसा बाद में जाकर हुआ कि मुख्य चीन को इसका दर्जा मिला। संयुक्त राष्ट्र में चीन को प्रवेश दिलाने में भारत का भी बड़ा हाथ था। भारत ने उसका समर्थन किया था।

    इसकी जड़ें उपनिवेशवाद में भी हैं। दुनिया में जहाँ औपनिवेशिक ताकतें उस देश को छोड़कर गईं, खासकर बड़े देशों को या इलाकों को, वहाँ उन्होंने बँटवारा कर दिया। ये 'फूट डालो और राज करो' की पुरानी नीति थी जिसने दो महायुद्ध के बाद भी यूरोप को और बाद में उसके सुपर उत्पाद अमेरिका को वर्चस्व का एक रास्ता मुहैया करा दिया जहाँ उपनिवेश के बाकी हिस्से आपस में लड़ते रहे और औपनिवेशिक ताकतें उसका फायदा उठाती रही।

    सन् चालीस के दशक के उत्तरार्ध में ऐसा ही भारत में हुआ, ऐसा ही अरब में हुआ और ऐसा ही चीन में हुआ। आप इजरायल की स्थापना को लेकर महात्मा गांधी के वक्तव्यों को याद कीजिए जिसमें उन्होंने कहा था कि वे यहूदियों की पीड़ा से मर्माहत हैं, लेकिन वे अरब भूमि में एक अलग यहूदी राष्ट्र की बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। ऐसा ही भारत के बँटवारे और पाकिस्तान की स्थापना को लेकर भी उनका मत था। यही मत उनका ताइवान की स्वतंत्रता को लेकर होता, हालाँकि वो दिन देखने के लिए वे जीवित नहीं रहे।

    ताइवान, चीन, अमेरिका और विवेकानंद की भविष्यवाणी

    आज ताइवान की स्वतंत्रता का प्रश्न सिर्फ लोकतंत्र की स्थापना बनाम कम्यूनिस्ट तानाशाही का नहीं रह गया है। इसमें प्रशांत महासागर पर अमेरिका के वर्चस्व का भी मामला भी फँसा हुआ है जहाँ अमेरिका का लगभग वर्चस्व है। ताइवान, जापान, दक्षिण कोरिया, फिलीपींस से लेकर ऑस्ट्रेलिया जैसे देश तक अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था के अंग हैं और प्रशांत महासागर में स्थित सैकड़ो छोटे बड़े द्वीपों पर अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं। हाल ही में अमेरिका ने जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वॉड का भी गठन किया है जो प्रत्यक्षत: तो एक सेमी-मिलिटरी संगठन है, लेकिन उसके इरादे स्पष्ट हैं।

    याद कीजिए, ये प्रशांत महासागर स्थित पर्ल हार्बर ही था जिसने द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका को निर्णायक होकर उतरने को मजबूर किया था और दुनिया एटमी तबाही का गवाह बनी थी। उस समय निशाने पर जापान था। वो भूमिका आज चीन ने ले ली है। उस समय चीन करीब दो सौ सालों की अफीम की नींद से जाग रहा था और जापान ने उसे द्वितीय विश्वयुद्ध में बुरी तरह रौंद दिया था। वो कत्लेआम इतिहास के गिनेचुने कत्लेआमों में से एक है।

    विवेकानंद ने कहा था कि चीन जब सोता है तो एशिया सो जाता है, चीन जब जागता है तो पूरी दुनिया की नींद हराम हो जाती है। इक्कीसवीं सदी में चीन ऐसा जागा है कि उसने वाकई उस महान भारतीय की भविष्यवाणी सच कर दी है।

    ताइवान की तुलना यूक्रेन और अफगानिस्तान से

    कुछ लोग ताइवान की तुलना यूक्रेन से कर रहे हैं जहाँ रूस के हमले के बाद अमेरिका या यूरोपीय देश यूक्रेन को खुलकर सैन्य सहायता देने नहीं आए। हालाँकि वे अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा कर रहे हैं जिससे यूक्रेन तबाही के बाद भी मैदान में डटा हुआ है। कुछ लोग इसकी तुलना अफगानिस्तान या पाकिस्तान से अमेरिका के निकल जाने और उन देशों की बर्बादी से भी कर रहे हैं। यानी अमेरिका वक्त आने पर निकल जाता है और साथ नहीं देता।

    लेकिन ताइवान की स्थिति यूक्रेन या अफगानिस्तान जैसी नहीं है। यूक्रेन के पतन से अमेरिकी सुरक्षा हितों, उसके आर्थिक और सैन्य साम्राज्य को तत्काल चुनौती नहीं मिल रही थी जैसा ताइवान मामले में है। यूक्रेन या पूर्वी यूरोपीय देशों तक तो अमेरिकी नेतृत्व वाले नाटो ने एक प्रकार से पुराने आश्वासनों को तोड़ते हुए जबरन प्रवेश किया था जिसका रूस विरोध कर रहा था और जिसकी परिणीति यूक्रेन युद्ध में हुई। पर यहाँ मामला दूसरा है। ताइवान के पतन का अर्थ है, प्रशांत महासागर में अमेरिकी और सामरिक व्यापारिक हितों को सीधी चुनौती जहाँ से व्यापार के रास्ते निकलते हैं और जहाँ से हजारों व्यापारिक और युद्धपोत गुजरते हैं। ताइवान के पतन का अर्थ है दक्षिण चीन सागर में चीन का प्रवेश जहाँ से फिर चीन उस महासागर में व्यापार की शर्तों पर फतवा देने की स्थिति में आ जाएगा।

    फिलहाल, चीन समुद्र में कमजोर है और इसलिए उसने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव की शुरुआत की थी ताकि यूरोप, अफ्रीका और एशिया तक अपने बाजार और सामरिक शक्ति का विस्तार कर उन्हें अपने प्रभाव में ले सके। उसने अफ्रीकी देशों में अपनी गतिविधियाँ बढ़ाई, उन्हें आसान कर्ज दिया और हाल में श्रीलंका, मालदीप, नेपाल समेत कई देशों को प्रभाव में लाकर भारत को घेरने की कोशिश की और प्रकारांतर से अमेरिका को भी। कुछ अफ्रीकी देशों में महात्मा गांधी की मूर्ति ढहाने समेत कई गतिविधियों में चीन का कूटनीतिक हाथ माना गया, ताकि भारत के असर को कम किया जा सके।

    लेकिन इस बीच भारत ने जापान, ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम और दक्षिण कोरिया के साथ संबंध बढ़ाकर और एक प्रकार से चीन की घेरेबंदी कर उसका जवाब देने की कोशिश की है। भारत ने हाँगकाँग पर चीनी शिकंजा कसने के साथ ही अपनी कमर कसनी शुरू कर दी और पाक अधिकृत कश्मीर से चीन की सड़क परियोजना की प्रगति के साथ ही कश्मीर का आंतरिक प्रशासन और भू-राजनैतिक ढाँचा बदल दिया और क्वेड में सक्रियता शुरू कर दी। इतना ही नहीं, उसने दक्षिण चीन सागर में तेल और गैस निकालने के लिए वियतनाम से समझौता भी किया और सीमा पर चीनी घुसपैठ का जवाब भी देना शुरू कर दिया, जिससे पहले भरसक परहेज किया जाता था।

    ऐसे में ताइवान का महत्व कुछ और हो जाता है। ताइबान के पतन का अर्थ अमेरिका और पश्चिम के "स्वप्न" के टूटने की शुरुआत हो जाएगी, जिसकी नींव पुनर्जागरण और औद्यौगिक क्रांति के समय रखी गई थी। महान अमेरिकी सुरक्षा विशेषज्ञ और चिंतक सैमुअल हटिंगटन ने फिलीस्तीन, कश्मीर और दक्षिण चीन सागर को दुनिया के विस्फोटक बिंदु की संज्ञा दी थी जो तृतीय विश्वयुद्ध का कारण बन सकते हैं। उसमें उन्होंने दक्षिणी चीन सागर को सबसे खतरनाक माना था।

    जवाहरलाल नेहरू ने सन् 1962 में हुए भारत-चीन युद्ध को दो सोए हुए देशों की आपसी टकराहट माना था जो अपने लगभग पाँच हजार साल के ज्ञात और अज्ञात इतिहास में पहली बार सीमा पर भिड़े थे क्योंकि दोनों उपनिवेशवाद की लगभग दो सौ साल की निद्रा टूटने पर अपनी सीमा खोजने निकले थे। रामचंद्र गुहा अपनी पुस्तक में संकेत देते हैं कि घनघोर पश्चिम विरोधी चीनी नेतृत्व बनाम पश्चिम से अभिभूत भारतीय नेतृत्व की मनोदशा का आपसी टकराव भी था जिसकी परिणीति सन् बासठ की लड़ाई में हुई। देखा जाए तो पश्चिम और पूरब की मानसिकता में वह राजनीतिक संघर्ष अभी भी जारी है। ताइवान की समस्या को हमें इसी नजरिए से देखना चाहिए।

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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