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Old vs New Tax Regime: अपनी टैक्स रेजिम सावधानी से चुनें

इस बार के बजट में सात लाख की आय पर छूट का ऐसा हंगामा मचा है कि आम करदाता कन्फ्यूज हो गया है। उसके सामने कई सवाल हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि उसके लिए पुराने और नये में से कौन सा टैक्स रेजीम सही होगा?

budget 2023 Income Tax Slab Old vs New Tax Regime choose your tax regime carefully

Old vs New Tax Regime: बजट में 7 लाख तक की छूट की घोषणा के वक़्त सबके चेहरे पर मुस्कान थी, यहां तक की वित्त मंत्री के चेहरे पर भी। इन लोगों की मुस्कान को देखकर आम शहरी करदाता भी खुश था जो बेसब्री से पर्सनल इन्कम टैक्स के बारे में ऐलान का इन्तजार कर रहा था। जैसे ही वित्त मंत्री ने 7 लाख तक जीरो टैक्स की घोषणा की, शेयर बाजार सहित सबने झूमकर स्वागत किया। लेकिन जब धीरे धीरे बजट का फाइनल प्रिंट आने लगा तो बाजार के साथ उच्च मध्य वर्ग का मुंह भी उतर गया। बजट में वैसे तो कोई कमी नहीं थी, लेकिन लोगों को समझने में थोड़ा वक़्त लगा।

लोगों को यह समझने में थोड़ा भ्रम हुआ कि यह 7 लाख आय मैक्सिमम छूट की लिमिट है, जबकि ऐसा नहीं है। मैक्सिमम छूट की लिमिट तो 3 लाख ही है जो नई टैक्स रिजीम का पहला रेंज है। यह जो 7 लाख की छूट है वह धारा 87A के माध्यम से विशेष छूट दी गई है। पिछली बार के 5 लाख तक के आय पर जीरो टैक्स की छूट भी आटोमेटिक नहीं था, बल्कि धारा 87A के तहत था। यह छूट अपने आप नहीं है, मतलब बाई डिफ़ॉल्ट नहीं है, इसे रिटर्न में आपको क्लेम करना पड़ेगा। अगर आपसे क्लेम करना छूट गया तब आपको 7 लाख पर भी टैक्स देना पड़ सकता है।

मोटा मोटी यह समझ लीजिए कि आप की आय 7 लाख के अंदर है तो ही आप धारा 87A का इस्तेमाल कर सकते हैं जो टैक्स की 25000 राशि तक की छूट प्रदान करता है। मतलब यदि आपकी आय 7 लाख है तो आपको 25000 टैक्स देने का प्रावधान बना रहेगा लेकिन धारा 87A के तहत छूट क्लेम करेंगे तो आपका टैक्स जीरो हो जाएगा। अगर आपकी आय 8 लाख है तो इस धारा का इस्तेमाल आप नहीं कर सकते ऐसे में जो टैक्स आपका बनेगा उस पर आपको छूट नहीं मिलेगी। वेतन वालों के लिए यह लिमिट 7 लाख की जगह 7.5 लाख समझिये क्यूंकि पहले जो पचास हजार का स्टैंडर्ड डिडक्शन नए रेजीम में नहीं मिलता था वह अब दे दिया गया है।

दरअसल सरकार इस नये रेजीम को आकर्षक बना करदाताओं को इधर शिफ्ट करना चाहती है, इसीलिए सरकार ने इसे बाई डिफ़ॉल्ट विकल्प बना दिया है। यदि आपको पुराना रेजीम चाहिये तो उसे इस बार आपको विकल्प के रूप में चुनना पड़ेगा अन्यथा नई रेजीम वाली गणना ही आपका टैक्स सॉफ्टवेयर करेगा।

अब आप सोचेंगे कि इन दोनों रेजीम में हमारे लिए बेहतर कौन है? इसका उत्तर यह है कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी कुल सैलरी या आय कितनी है और उसके बाद आपका निवेश कितना है। यदि आपका निवेश ज्यादा है, आपका एचआरए और होम लोन की छूट ज्यादा है तो ज्यादा सम्भावना है कि आपके लिए पुराना रेजीम ही बेहतर हो। क्यूंकि जैसे ही आप नए रेजीम में आते हैं तो अनेक प्रकार की छूट से आप हाथ धो बैठते हैं। अगर आप पहले से निवेश और होम लोन या होम रेन्ट की छूट ले रहे हैं तो नया रेजीम आपके लिए घाटे का सौदा हो सकता है।

इसका कारण है कि नए रेजीम में सीधे सीधे कुल आय को ही कुल करयोग्य आय मान लिया जाता है जबकि पुराने रिजीम में कर योग्य आय कुल आय में से छूट घटाने के बाद आती है। उदाहरण के तौर पर दो व्यक्ति हैं। दोनों का वेतन 15.50 लाख है, दोनों की छूटें 5 लाख तक हैं जिसमें धारा 80C, 80D, होम लोन ब्याज और अन्य छूट हैं। ऐसे में इस 15.50 लाख की आय पर पुराने रेजीम वाले को 1,12,500 टैक्स देना पड़ेगा जबकि नए रिजीम वाले को 1.50 लाख देना पड़ेगा। दरअसल नई कर व्यवस्था लगभग छोटा बड़ा मिलकर 70 प्रकार की कटौती और छूट को नहीं देती है जिसमें मोटा मोटी धारा 80 के बहुतायत छूट, होम लोन का ब्याज, HRA, LTA आदि शामिल हैं।

बजट में दी गई नई कर व्यवस्था दरअसल लोअर मिडिल क्लास के लिए ठीक है जो देश की एक बड़ी आबादी को कवर करता है जिनकी मासिक आय या वेतन 50 से 60 हजार मासिक के आसपास है। ऐसे में इन्हें कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा। हालांकि जैसे जैसे इनकी आमदनी बढेगी इनका टैक्स भी बढेगा और भविष्य में इन्हें कोई छूट भी नहीं मिलेगी। हालांकि तात्कालिक रूप से देखें तो इस निम्न मध्य वर्ग के हाथ में पैसा बचेगा जो बाजार में पूंजी के प्रचलन को बनाकर रखेगा।

हालांकि इससे एक खतरा जो दिख रहा है वह यह कि दबाब के कारण बीमा या अन्य इंफ़्रा में जो आम आदमी निवेश करता था वह अब स्वैच्छिक हो जायेगा और इससे हो सकता है कि बीमा उद्योग या बांड उद्योग में लोगों के निवेश में कमी आये।

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    एक वेतनभोगी करदाता को यह ध्यान रखना पड़ेगा कि यह न्यू रेजीम चूंकि 2023-24 से बाई डिफाल्ट दे दिया गया है तो साल के शुरुआत में ही उसे अपने नियोक्ता को बताना पड़ेगा कि वह कौन सा टैक्स रेजीम चुन रहा है। हालांकि इन्कम टैक्स रिटर्न फाइल करते समय वे अपनी पसंद बदल सकते हैं। यदि वह ऐसा नहीं करता है तो कंपनी बाई डिफ़ॉल्ट रेजीम होने के कारण न्यू रेजीम के हिसाब से ही टीडीएस काटेगी।

    एक गैर-वेतनभोगी करदाता को टैक्स रिटर्न दाखिल करते समय रेजीम को चुनना होता है। उन्हें वेतन वालों की तरह वर्ष के दौरान अपनी पसंद की घोषणा करने या किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि खुद के मालिक वह खुद हैं। हालांकि अब अगर उन्होंने एक बार नयी टैक्स रेजीम चुन ली तो पुरानी टैक्स रेजीम में वापस नहीं जा सकेंगे।

    यह भी पढ़ें: EWS and Income Tax: जिन्हें सरकार खुद EWS कहती है, उनसे इनकम टैक्स क्यों लेती है?

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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