Media Boycott: न्यूज एंकरों के बॉयकॉट ने आपातकाल की याद दिलाई

इंडी एलायंस की को-ऑर्डिनेशन कमेटी की पहली बैठक शरद पवार की अध्यक्षता में हुई। को-ऑर्डिनेशन कमेटी में वही सबसे सीनियर नेता हैं। जब कमेटी बनी थी, तब हैरानी हुई थी कि सोनिया, राहुल, खड़गे, लालू, नीतीश, ममता बनर्जी के बिना को-आर्डिनेशन कमेटी का क्या मतलब। लेकिन अब मतलब समझ में आ रहा है कि कोई कन्वीनर नहीं बनेगा। नीतीश कुमार को कन्वीनर और प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की जदयू की मांग दबा दी गई है।

कोऑर्डिनेशन कमेटी में उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, हेमंत सोरेन सदस्य हैं, वे सब पहली मीटिंग में मौजूद भी थे। इस मीटिंग में चार बहुत ही महत्वपूर्ण फैसले हुए। इनमें से दो पर मुम्बई की मीटिंग में चर्चा हुई थी, लेकिन सहमति नहीं हुई थी। पहला फैसला यह हुआ है कि सीट शेयरिंग राष्ट्रीय स्तर पर नहीं होगी। अरविन्द केजरीवाल और ममता बनर्जी ने मुम्बई बैठक में राष्ट्रीय स्तर पर सीट शेयरिंग की मांग रखी थी, हालांकि मीटिंग में ही मल्लिकार्जुन खड़गे ने राज्य स्तर पर सीट शेयरिंग की बात कह दी थी, लेकिन आधिकारिक फैसला नहीं हुआ था।

Boycott of news anchors reminded of emergency

वैसे को-आर्डिनेशन कमेटी की मीटिंग से पहले ही कई राज्यों में सीट शेयरिंग पर आपसी चर्चा शुरू हो चुकी थी। जैसे हरियाणा में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस में शुरुआती चर्चा के बाद बातचीत टूट चुकी है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने आम आदमी पार्टी की दस में से चार सीटों की मांग ठुकरा कर कांग्रेस के सभी दस सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है। इसके जवाब में आम आदमी पार्टी ने भी विधानसभा की सभी 90 सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है, जबकि विधानसभा चुनाव अभी एक साल दूर हैं।

हरियाणा पहला उदाहरण है कि सीट शेयरिंग पर इंडी एलायंस का सच से सामना हुआ है। इसीलिए केजरीवाल ने राष्ट्रीय स्तर पर सीट शेयरिंग करने की मांग की थी। आम आदमी पार्टी का तर्क है कि वह राष्ट्रीय पार्टी है, उसे सभी हिन्दी भाषी राज्यों में सीट चाहिए। केजरीवाल ने सभी राज्यों में विधानसभाओं का दबाव बनाना शुरू कर दिया है। हरियाणा के चुनाव दूर होने के बावजूद उन्होंने विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने की धमकी दे दी, जबकि मध्यप्रदेश में तो दस उम्मीदवारों का एलान भी कर दिया। अब देखना यह होगा कि इंडी एलायंस की अक्टूबर के पहले हफ्ते में भोपाल में पहली रैली करने का जो दूसरा फैसला हुआ है, तब तक क्या होता है। क्या राहुल गांधी और केजरीवाल उस रैली में मध्यप्रदेश में मिलकर चुनाव लड़ने का एलान कर पाएंगे।

Boycott of news anchors reminded of emergency

को-आर्डिनेशन कमेटी में सीट शेयरिंग और रैली के बाद तीसरा फैसला जातीय जनगणना की मांग उठाने का हुआ है। मुम्बई बैठक में इस मुद्दे पर गहरे मतभेद थे। लालू यादव, नीतीश कुमार और अखिलेश यादव ने जातीय जनगणना को एलायंस के राष्ट्रीय एजेंडे में शामिल करने की मांग उठाई थी, जिसका ममता बनर्जी, केजरीवाल और उद्धव ठाकरे ने विरोध किया था। लालू यादव और नीतीश कुमार ने अपनी मांग छोड़ी नहीं थी, जिस पर ममता बनर्जी नाराज होकर प्रेस कांफ्रेंस से पहले ही चली गई थी। लालू यादव ने उनके प्रेस कांफ्रेंस में शामिल नहीं होने पर नाराजगी का इजहार भी किया था।

इस मीटिंग में जातीय जनगणना को राष्ट्रीय एजेंडे में शामिल करने से पहले पर्दे के पीछे मानमनोव्वल का लंबा सिलसिला चला। मुम्बई में जातीय जनगणना का विरोध करने वाले अरविन्द केजरीवाल ने राघव चड्ढा को और उद्धव ठाकरे ने संजय राउत को मीटिंग में भेजा था, लेकिन ममता बनर्जी ने किसी को भी मीटिंग में नहीं भेजा। मीडिया के सवालों से बचने के लिए के.सी. वेणुगोपाल ने अपने बयान में पहले ही कह दिया कि ईडी के सम्मन के कारण अभिषेक बनर्जी मीटिंग में नहीं आ सके। ईडी ने उन्हें टीचर भर्ती घोटाले की पूछताछ के लिए सम्मन किया था। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने अभिषेक बनर्जी को सम्मन भेजने के लिए ईडी और मोदी सरकार की आलोचना की।

सीट शेयरिंग, भोपाल रैली, जातीय जनगणना के बाद चौथा फैसला सब को आश्चर्यचकित कर देने वाला है। वह फैसला यह है कि गठबंधन के सभी दल उन न्यूज चैनलों के एंकरों की डिबेट में हिस्सा नहीं लेंगे, जो इंडी एलायंस के दलों से टेढ़े सवाल पूछते हैं। या मोदी समर्थक राष्ट्रवादी विचारधारा को बढ़ावा देते हैं।

को-ऑर्डिनेशन कमेटी ने मीडिया सब कमेटी को ऐसे एंकरों की लिस्ट बनाने को कहा है। इनमें सबसे पहला नाम रिपब्लिक टीवी और अर्नब गोस्वामी का आता है, जिनका पहले भी कांग्रेस ने लंबे समय तक बायकाट किया था। अर्नब गोस्वामी कांग्रेस के बायकाट के कारण सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर अक्सर हमलावर रहते हैं। महाराष्ट्र में महाविकास आघाड़ी सरकार के समय पालघर में दो साधुओं की पीट पीट कर हत्या के बाद अर्नब गोस्वामी ने सवाल पूछा था कि अगर किसी पादरी की इसी तरह पीट पीट कर हत्या हो जाती, तो क्या सोनिया गांधी तब भी चुप रहती। अर्नब गोस्वामी के सीधे सवालों के चलते कांग्रेस नेताओं ने देश भर में कई जगह उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा दी थी। मुम्बई में उनकी कार पर हमला भी हुआ था, फिर टीआरपी का एक केस बना कर उनकी गिरफ्तारी भी की गई थी।

अर्नब गोस्वामी के बाद टाइम्स नाऊ नवभारत के एंकर सुशांत सिन्हा और आजतक के एंकर सुधीर चौधरी का नाम लेकर कहा गया कि ऐसे एंकरों की लिस्ट बनाई जाए, जिनके कार्यक्रमों का इंडी एलायंस के सभी दल बायकाट करेंगे। गुरूवार को लिस्ट जारी भी कर दी गई, जिसमें अदिति त्यागी (जी न्यूज), अमन चोपड़ा (न्यूज 18), अमिश देवगन (न्यूज 18), आनन्द नरसिम्हन (सीएनएन न्यूज 18), अशोक श्रीवास्तव (दूरदर्शन), चित्रा त्रिपाठी (आजतक), गौरव सांवत (इंडिया टुडे), नाविका कुमार (टाईम्स नाऊ), प्राची पराशर (इंडिया टीवी), रुबिका लियाकत (भारत 24), शिव अरूर (इंडिया टूडे) के नाम हैं।

इस तरह राजनीतिक नफरत की आंच अब मीडिया तक पहुंच गई है। गुजरात दंगों के बाद पूछे गए टेढ़े सवालों से झल्ला कर करण थापर के शो से तो नरेंद्र मोदी सिर्फ उठ कर गए थे। अर्नब गोस्वामी, सुशांत सिन्हा, सुधीर चौधरी के शो से तो समूचा विपक्ष उठकर चला गया।

अब तक तो सरकार को मीडिया से दिक्कत होती थी। वह मीडिया पर तरह तरह की पाबंदियां लगाती थी। मोदी सरकार को भी मीडिया से दिक्कत है। उसने भी संसद और सरकारी दफ्तरों में मीडिया के प्रवेश पर तरह तरह की पाबंदियां लगा दी हैं। इसके पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मीडिया के प्रति दुर्भावना है, क्योंकि दिल्ली के मीडिया ने भी गुजरात दंगों के समय एकतरफा और वह भी तथ्यहीन रिपोर्टिंग की थी। सालों तक दिल्ली के मीडिया ने उन पर आरोप लगाना जारी रखा था कि दंगे उनके इशारे पर ही हुए थे।

इसके बावजूद मोदी जब भी दिल्ली आते थे, किसी न किसी चैनल को इंटरव्यू देते थे। इंडिया टूडे कॉनक्लेव में तो दिग्विजय सिंह और फारूख अब्दुला को भी उनसे सवाल पूछने दिए गए थे। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की दुहाई देने वाले राजनीतिक दल इस तरह पत्रकारों और एंकरों के शो का बायकाट करेंगे, ऐसा किसी ने कभी नहीं सोचा था। अर्नब गोस्वामी का तो चलो खुद का टीवी चैनल है, लेकिन बाकी एंकरों का बायकाट क्या उन मीडिया घरानों पर उन्हें नौकरी से निकालने का दबाव नहीं है। यह एक चेतावनी भी है कि उनकी सरकार आ गई, तो उन्हें कहीं नौकरी नहीं करने दी जाएगी। पत्रकारों की आज़ादी पर इतना बड़ा प्रहार तो आपातकाल में भी नहीं हुआ था।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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