BJP Strategy: विधानसभा चुनावों में भी भाजपा के क्षत्रप हाशिए पर
भाजपा के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि जिस प्रदेश में चुनाव होने जा रहा है उस प्रदेश के दिग्गज नेताओं को भी जानकारी नहीं है कि केन्द्रीय नेतृत्व किसे टिकट देने जा रहा है।
बुधवार को भाजपा मुख्यालय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में हुई केन्द्रीय चुनाव समिति की बैठक में जब मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ और राजस्थान के लिए संभावित उम्मीदवारों के नाम फाइनल हो रहे थे तो इनमें से किसी राज्य के नेता को भनक तक नहीं थी कि टिकट किसे दिया जा रहा है।

17 अगस्त को मध्य प्रदेश की 39 और छत्तीसगढ की 21 सीटों के लिए पहली सूची जारी हो चुकी है। यह भी भाजपा के इतिहास में संभवत: पहली बार ही हुआ है कि संभावित चुनाव की घोषणा से लगभग 3 महीने पहले ही टिकट बांट दिये गये। ऐसी परिस्थिति में तीनों राज्यों की राजनीति में पहली बार हो रहा है कि इन राज्यों में दशकों से स्थापित नेता नरेंद्र मोदी और अमित शाह के सामने अपने को असहाय मान रहे हैं, वहीं केन्द्रीय नेतृत्व उन्हें हाशिए पर करने की पूरी तैयारी कर चुका है।
ज्योतिरादित्य सिंधिया की कांग्रेस से बगावत के बाद चौथी बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह चौहान, छत्तीसगढ़ में तीन बार मुख्यमंत्री रहे रमन सिंह और राजस्थान में पार्टी की एकछत्र नेता रहीं पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जैसे दिग्गज नेता 2023 के विधानसभा चुनावों की भाजपा की रणनीति के केन्द्र में नहीं है। मध्य प्रदेश में भाजपा की सत्ता में वापसी करने और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से सत्ता छीनने की जिम्मेदारी अमित शाह ने संभाल ली है तो वहीं राजस्थान में भाजपा सरकार बनाने की कमान प्रधानमंत्री मोदी ने अपने हाथ में ले रखी है।
20 अगस्त को भोपाल में मध्य प्रदेश सरकार का पिछले बीस साल का रिपोर्ट कार्ड जारी करते समय एक प्रश्न के जवाब में केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कहा था कि 'मुख्यमंत्री कौन होगा इसका फैसला चुनाव बाद पार्टी करेगी।' शाह का बिना लाग लपेट के दिया गया बयान यह बताने के लिए पर्याप्त था कि मध्य प्रदेश में भावी मुख्यमंत्री कौन होगा, इसका फैसला मोदी और शाह ही करेंगे।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में दिये गये शाह के इस बयान का अर्थ राजस्थान और छत्तीसगढ़ के लिए भी इसी रूप में लिया गया कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बहुमत मिलने पर मुख्यमंत्री कौन होगा, इसका फैसला भी चुनाव के बाद मोदी ही करेंगे। शाह के इस बयान ने साफ कर दिया था कि मोदी अब इन तीनों राज्यों में नए नेतृत्व को आगे करेंगे। इन तीनों राज्यों में भाजपा के पास तकरीबन दो दशक से एक स्थापित नेतृत्व रहा है। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले इन राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव भाजपा सिर्फ और सिर्फ मोदी के चेहरे पर लड़ने की रणनीति बना चुकी है।
असल में इसके पीछे की रणनीति यह है कि हिन्दी भाषी राज्यों में मोदी का नाम और चेहरा पार्टी से भी बड़ा एक ब्रांड बन चुका है। इसलिए पार्टी स्थानीय नेतृत्व की परंपरा त्याग कर विधानसभा चुनाव में भी मोदी ब्रांड के सहारे मैदान में उतरना चाहती है। इसलिए न केवल विधानसभा चुनावों के टिकटों का फैसला खुद मोदी कर रहे हैं बल्कि तीनों राज्यों के लिए केन्द्रीय योजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण भी मोदी ही कर रहे हैं ताकि ऐन चुनाव से पहले ये संदेश जाए कि राज्यों में भी सिर्फ मोदी के नाम पर ही वोट मांगने हैं।
भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व यह मानता है कि मोदी की अपार लोकप्रियता के बाद भी 2018 के चुनाव में मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हार के लिए भाजपा का स्थानीय नेतृत्व ही जिम्मेदार था। तीनों प्रदेशों के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी की लोकप्रियता को भुनाने में असफल रहे, इसी कारण पार्टी हारी थी। उसके बाद से ही मोदी इन प्रदेशों में नए नेतृत्व को उभारने की दिशा में काम करने लग गए। तीनों प्रदेशों के स्थापित क्षत्रप अपने भरोसेमंद नेताओं को भी यह भरोसा देने में नाकाम साबित हो रहे हैं कि वह उनके लिए टिकट की पैरवी करेंगे। मोदी और शाह के विधानसभा चुनावों की कमान संभालने से प्रदेश के नेताओं का दबदबा लगभग खत्म हो गया है और वे शीर्ष नेतृत्व पर निर्भर रहने के लिए विवश हो गए हैं।
2019 के लोकसभा चुनावों में शानदार जीत के बाद से ही राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में नया और वैकल्पिक नेतृत्व विकसित करने की रणनीति पर मोदी और शाह ने काम शुरू कर दिया था। हालांकि, राजस्थान में मोदी ने इस दिशा में कोशिश राजे के मुख्यमंत्री रहते हुए ही शुरू कर थी। मोदी ने गजेन्द्र सिंह शेखावत और अर्जुन मेघवाल को केंद्रीय मंत्री और ओम बिड़ला को लोकसभा स्पीकर बनाकर वसुंधरा राजे के विकल्प के रूप में आगे किया था। उसके बाद ओडिशा से राज्यसभा सांसद लेकिन राजस्थान के मूल निवासी अश्विनी वैष्णव को अति महत्वपूर्ण मंत्रालय देकर और प्रदेश के अन्य नेताओं को वसुंधरा राजे से अधिक महत्व देकर मोदी ने भविष्य की रणनीति स्पष्ट कर दी थी।
प्रधानमंत्री मोदी के मानसून सत्र के दौरान राजस्थान के 24 लोकसभा और 4 राज्यसभा सांसदों के साथ दिल्ली में बैठक कर जमीनी हकीकत और राजस्थान पर चर्चा करना यह बताने के लिए पर्याप्त था कि राजस्थान में मोदी ही चेहरा होगे और पार्टी की रणनीति भी मोदी की देखरेख में बनेगी। राजस्थान में भाजपा हाईकमान ने चुनाव प्रचार अभियान समिति को छोड़कर सभी संगठनात्मक नियुक्तियां कर दी है और वसुंधरा को कही जगह नहीं दी गयी है। अपने आक्रामक तेवर के लिए पहचाने जाने वाली वसुंधरा फिलहाल धैर्य का परिचय दे रही हैं और पार्टी हाईकमान के निर्णयों पर प्रतिक्रिया देने से बच रही हैं।
छत्तीसगढ़ की राजनीति की बात करें तो इस छोटे राज्य में भी भाजपा हाईकमान 15 साल मुख्यमंत्री रहे रमन सिंह को आगे करने की बजाय मोदी के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ने का निर्णय कर चुका है। छत्तीसगढ़ में लगातार 15 साल मुख्यमंत्री रहे रमन सिंह के नेतृत्व में पार्टी को 2018 में सिर्फ 15 सीटों मिली थी। पार्टी ने जनवरी, 2019 में रमन सिंह को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया और प्रदेश की राजनीति में महत्व कम कर दिया। छत्तीसगढ़ में संगठन और चुनाव प्रभारी बनाए गए ओम माथुर साफ कह चुके हैं कि विधानसभा चुनाव में भी चेहरा मोदी ही होंगे। मुख्यमंत्री का फैसला बाद में किया जाएगा। राजस्थान और मध्य प्रदेश की तुलना में छत्तीसगढ़ में मोदी को कांग्रेस को हराने में ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी।
पार्टी में उम्मीद जगाने और कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए मोदी ने छत्तीसगढ़ की कमान अमित शाह के हाथ में दे रखी है और वे लगातार छत्तीसगढ़ का दौरा कर रहे हैं। लेकिन कांग्रेस के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल चुनावी दौड़ में आगे दिख रहे हैं। छत्तीसगढ़ में मोदी की कोशिश 2018 की तरह अपमानजनक हार से बचने की है। मोदी और शाह इसमें कितना सफल होते हैं, यह तो परिणाम ही बताएगा।
फिलहाल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा का चेहरा रहे शिवराज सिंह, वसुंधरा राजे और रमन सिंह मोदी और शाह के सामने बेबस हैं। भाजपा हाईकमान के साथ कदमताल करने की उनकी राजनीतिक मजबूरी है। इन तीनों राज्यों के दिग्गज नेताओे को निर्णय प्रक्रिया से अलग थलग करके मोदी और शाह ने एक बड़ा रिस्क लिया है। मोदी की लोकप्रियता की असली परीक्षा इन तीनों राज्यों के विधानसभा चुनावों में होने वाली है। स्थानीय नेताओं पर लगाम कसकर अपनी शर्तो पर भाजपा की सरकार बनाना मोदी के लिए बहुत बड़ी सफलता होगी और 2024 के लिए उनका मार्ग प्रशस्त कर देगी।
वैसे कर्नाटक में प्रदेश नेतृत्व को बौना करके सभी निर्णय दिल्ली से थोपने का खामियाजा मोदी और शाह भुगत चुके हैं। अब मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव भी मोदी और शाह की प्रतिष्ठा के चुनाव बन चुके हैं। भाजपा तीनों चुनाव जीतती है तो मोदी और शाह की जोरदार वाह वाह होगी और अगर हार जाती है तो मोदी की अपार लोकप्रियता और शाह के भागीरथ प्रयासों के बावजूद पार्टी की हार का दोष स्थानीय नेतृत्व की अलोकप्रियता और नाकामी पर डाल दिया जाएगा, इतना तय है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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