जन्मदिन पर विशेष: प्रभाष जोशी का 'कागद कारे'
हिन्दी पत्रकारिता के दो ऐसे आधार स्तंभ हैं जिनके बारे में कह सकते हैं कि उन्होंने आज की हिन्दी पत्रकारिता की नींव रखी। इसमें एक नाम राजेन्द्र माथुर का है और दूसरा प्रभाष जोशी का। दोनों ही मध्य प्रदेश से संबंध रखते थे और अंग्रेजी से हिन्दी की ओर आये थे। लेकिन इन दोनों ने हिन्दी पत्रकारिता को जो कुछ दिया, कोई और नहीं दे पाया। राजेन्द्र माथुर जहां पत्रकारिता में दर्शन का समावेश करते थे वहीं प्रभाष जोशी ने इसे लोक जीवन से जोड़कर राजनीतिक चेतना जगाने का काम किया। आज संसार में दोनों नहीं हैं लेकिन दोनों का हिन्दी पत्रकारिता में दिया गया योगदान सदा सर्वदा बना रहेगा।

प्रभाष जोशी का जन्म 15 जुलाई 1936 को भोपाल के पास आष्टा में हुआ था। उनके पत्रकारिता जीवन की शुरुआत इंदौर से निकलनेवाले 'नई दुनिया' से हुई थी लेकिन वो पहचाने गये जनसत्ता अखबार से। 1983 में उनकी संपादकीय में शुरु हुए जनसत्ता ने हिन्दी पत्रकारिता में ऐसी धाक जमाई कि अंग्रेजी अखबारों के वर्चस्व वाले दिल्ली में उन्होंने हिंदी अखबार को घर घर पहुचा दिया। जनसत्ता को घर घर तक पहुंचाने में जितना उस अखबार के तेवर और कलेवर का योगदान था उतना योगदान स्वयं प्रभाष जोशी द्वारा लिखे जानेवाले कॉलम "कागद कारे" का भी रहा।
जनसत्ता में लिखे जानेवाले साप्ताहिक कॉलम 'कागद कारे' ने लोकप्रियता का वह मुकाम हासिल किया जो आज किसी संपादक के लिए संभव नहीं है। प्रभाष जोशी ने लिखा है कि वह जनसत्ता में कोई कॉलम लिखे इसका विचार उनके मन में कभी नहीं आया था। लेकिन उस समय जनसत्ता के संपादकीय पेज के प्रभारी जवाहर लाल कौल ने एक दिन बातचीत में कहा कि 'आप एक कॉलम क्यो नहीं लिखते? ऐसा कॉलम जिसमें जो मन में आए लिखें और कोई स्पष्ट निष्कर्ष निकालने की कोशिश ना करें। बेमतलब की बात में भी मतलब हो। बिल्कुल निजी हो लेकिन निजी उसमें कुछ भी न हो। जैसे कविता बिल्कुल निजी होती है लेकिन सबकी अनुभूति को प्रकट करती हैं।'
तब तक जनसत्ता के संपादकीय पेज पर किसी का कोई कॉलम नहीं छपता था। प्रभाष जोशी ने तय किया था कि संपादकीय पेज को तात्कालिकता और सामयिकता के लिए खाली रखेंगे। जब जैसा अखबार के नाते जरूरी हो, वैसा छापेंगे। रविवारी में भी एक ही कॉलम छपता था रघुवीर सहाय का। वे जब तक जिए लिखते रहे। कॉलमों से अखबार की जगह भर जाती है इसलिए मूल अखबार में जगह निकालने की गुजांइश नहीं थी। फिर खबरों और उनके विश्लेषणों के बीच वैसा निजी किस्म का कॉलम बहुत अटपटा लगता।
प्रभाष जोशी कॉलम शुरू करने के लिए हिचकिचा रहे थे। जवाहर लाल कौल के लगातार कॉलम लिखने के आग्रह के कारण प्रभाष जोशी ने मंगलेश डबराल को बुलाकर पूछा कि ऐसा कोई कॉलम लिखूं तो क्या आप छापेंगे? छापेगे भी तो किस पेज पर और कैसे? काफी सोच विचार के बाद मंगलेश डबराल ने रविवार को उस जगह छापने का निर्णय किया जहां किताबों और सांस्कृतिक मामलों पर सामग्री छपती थी।
कॉलम का नाम भी मंगलेश डबराल को ही सुझाना था। प्रभाष जोशी ने उनसे कहा कि जो भी नाम चुनिये उसमें ऐसा कहीं नहीं लगना चाहिए कि यह किसी गंभीर विवेचन का कॉलम है। इसमें भावनाएं, गप-शप या कहें सीधी सादी बतकही होगी। ऐसा हल्का फुल्का नाम रहे कि न लिखनेवाले पर बोझ रहे, न पढनेवाले पर कोई भार पड़े। मंगलेश डबराल ने 'कागद कारे' नाम सुझाया। प्रभाष जोशी को यूं ही लिखकर कागद काले करना था।
प्रभाष जोशी को यह नाम पंसद आया। जवाहर लाल कौल को भी यह नाम पंसद आया लेकिन जनसत्ता में गंभीर पत्रकारिता करने और औपचारिकता निभाने वालो लोग इससे सहमत नहीं थे। उनका मानना था कि संपादक कॉलम लिखे और उसमे वजन न हो तो अखबार और संपादक की छवि बिगड़ेगी। उनको 'कागद कारे' नाम और उसका सम्भावित कथ्य और रूप दोनों ही हल्के फुल्के साप्ताहिक के लायक लगता था। प्रभाष जोशी ने उन्हे समझाया कि गंभीर सामग्री तो अपन हर दिन छापते ही हैं। रविवार को कुछ ऐसा भी छाप सकते हैं जो पत्रकारिता के निर्धारित और अपेक्षित ढांचे से अलग हो। जब वे भी मान गए तब जनसत्ता में प्रभाष जोशी का कॉलम 'कागद कारे' शुरू हुआ।
इस तरह 5 अप्रैल 1992 के अंक मे पहला कागद कारे जनसत्ता में छपा। पहला कालॅम जो प्रभाष जोशी ने लिखा था वह क्रिकेट के कोकाकोलाकरण पर था। 1992 में कागद कारे का सफर शुरू हुआ वह निर्बाध रूप से 18 साल चलता रहा। प्रभाष जोशी हर रविवार को कागद कारे लिखते रहे। बहुत कम ऐसे रविवार रहे हैं जब सचमुच अपरिहार्य कारणों से प्रभाष जोशी लिख न सके। 1994 के मई महीने में प्रभाष जोशी की मुम्बई में बाइपास सर्जरी हुई। आपरेशन थिएटर से बाहर तीन दिन रिकवरी में रहे। इस समय एक रविवार को प्रभाष जी ने कागद कारे नहीं लिखा।
उनके 'कागद कारे' कॉलम की लोकप्रियता का आलम यह था कि अगर किसी रविवार को 'कागद कारे' न छपे तो जनसत्ता कार्यालय में वजह पूछने के लिए लोगों का तांता लग जाता। लोग चिट्ठी भेजकर कॉलम न छपने की शिकायत दर्ज कराते। इसलिए बाइपास सर्जरी के चौथे ही दिन अस्पताल के बिस्तर पर लेटे लेेटे प्रभाष जोशी ने जनसत्ता के ही एक पत्रकार साथी आलोक तोमर को फोन पर बोलकर कागद कारे कॉलम लिखवाया था जिसका शीर्षक था 'ध से धैवत और धन्यवाद'. कागद कारे के इतिहास में सिर्फ यही एक कॉलम था जो प्रभाष जोशी ने बैठकर नहीं लिखा, किसी को बोलकर लिखवाया।
आज प्रभाष जोशी होते तो अपना 86वां जन्मदिन मना रहे होते। लेकिन अपने सबसे करीबी लोगों रामनाथ गोयंका, शरद जोशी, राजेन्द्र माथुर और कुमार गंधर्व को नब्बे के दशक में ही खो चुके प्रभाष जोशी 2009 में इस संसार से विदा हो गये। 'कागद कारे' के सफर में जब उनके इतने करीबी लोग उन्हें छोड़कर चले गये तब उन्होंने लिखना छोड़ने का मन बना लिया था। लेकिन फिर से उन्होंने कागद कारे का सफर यह सोचकर जारी रखा कि अब वो अपने लेखन के जरिए इन चारों को जिन्दा रखेंगे। उनके लेखन में साहित्य, संगीत और पत्रकारिता के ये चार धुरंधर नाम सदा जिन्दा भी रहे।
प्रभाष जोशी की पत्रकारिता ने हिंदी को अंग्रेजी के सामने गर्व से खड़ा किया। हिंदी पत्रकारिता को सम्मान के साथ साथ उसको एक मुकाम तक पहुचाने में प्रभाष जोशी का योगदान अतुलनीय है। आज वो संसार में नहीं हैं लेकिन हिन्दी पत्रकारिता में किया गया उनका काम सदा सदा रहेगा और आनेवाली पीढी को रास्ता दिखाता रहेगा। आखिरकार उन्होंने यूं ही जो कागद कारे किये थे, वो यूं ही तो नहीं थे।
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(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)
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