Bihar Women: बिहार में महिला वोटर नीतीश के साथ रहेंगी या छिटकेंगी?
Bihar Women: जैसे जैसे लोक सभा का चुनाव पास आता जा रहा है, वैसे वैसे राजनीतिक समीकरणों और एजंडों पर मंथन भी भी तेजी पकड़ रहा है। बिहार में नीतीश के एनडीए में आने के बाद बीजेपी के लिए नफे और नुकसान की भी चर्चा हो रही है।
कई लोगों का मानना है कि अब नीतीश बाबू की वह वोट अपील नहीं रही जो पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान थी। पर बहुत लोगों का यह भी आकलन है कि नीतीश के पास अपनी जाति के 5 प्रतिशत वोट और महिलाओं के 50 प्रतिशत से अधिक वोट आज भी हैं और किसी भी चुनाव के परिणाम में इतने वोट काफी असर डाल सकते हैं।

क्या नीतीश के साथ महिला वोटर सचमुच पहले की तरह बरकरार हैं, या जातिगत सर्वेक्षण और शिक्षक भर्ती का श्रेय तेजस्वी यादव लेकर नीतीश कुमार का पुराना समीकरण बिगाड़ सकते हैं?
2019 के लोक सभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि महिला मतदाताओं ने एनडीए का भरपूर साथ दिया था। बिहार की 40 लोक सभा सीटों में से 39 पर एनडीए के उम्मीदवार जीत गए थे, हालांकि उस जीत में प्रधानमंत्री मोदी की भी लोकप्रियता का हाथ था पर बिहार जैसे राज्य में जहां चुनाव मुख्य रूप से जातिगत आधार पर लड़े और जीते जाते हैं, वहाँ सामाजिक बदलाव का चुनाव पर बड़ा असर पड़े, यह बड़ी बात है। इस नए बदलाव की वाहक बिहार की महिलाएं थी, जिन्होंने नीतीश कुमार की शराबबंदी और लड़कियों की शिक्षा पर रीझ कर एनडीए के पक्ष में जमकर वोट किया था।
2020 के विधानसभा चुनाव के आंकड़ों को भी देखें तो 59.7 प्रतिशत महिला मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। यानि महिलाओं में चुनाव को लेकर उत्साह ज्यादा था। कभी बिहार में महिला मतदान का प्रतिशत 40 और पुरुष मतदान का हिस्सा 60 प्रतिशत होता था। नीतीश को इसके लिए श्रेय दिया जाना चाहिए।
2005 से नीतीश कुमार लगातार सरकारों का नेतृत्व कर रहे हैं। उनकी छवि सुशासन बाबू की बनी, तो उसमें उनकी विकासात्मक नीतियों के साथ साथ महिलाओं के लिए शुरू किए गए विशेष कार्यक्रम के भी परिणाम कारण बने। नीतीश ने गांव और पंचायत स्तर पर महिलाओं की भागीदारी और निर्णय में उनकी भूमिका सुनिश्चित की।
लगभग दो दशकों के उनके शासन काल में बिहार में महिलाओं को आजीविका से जोडने वाली कई परियोजनाएं चलाई गईं। महिला जीविका कार्यक्रम, साइकिल योजना और महिलाओं के लिए पंचायत में 50 प्रतिशत आरक्षण ने नीतीश को एक सुधारवादी नेता के रूप में स्थापित किया। बिहार के लगभग 45,000 गांवों में आजीविका को बढ़ावा देने के लिए महिला-आधारित सामुदायिक संगठनों का एक जाल बन गया है।
मुख्यमंत्री साइकल योजना से लड़कियों के स्कूल नामांकन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और कुछ सालों में ही माध्यमिक विद्यालयों में लिंग अनुपात का अंतर कम हो गया। छात्राओं ने सरकार से प्राप्त साइकिल का उपयोग माध्यमिक विद्यालय तक पढ़ाई जारी रखने में किया। लड़कियां चारदीवारी से निकल कर अपने लिए एक मुकाम हासिल करने में सक्षम होने लगीं। उनका आर्थिक सशक्तिकरण हुआ। वे सामाजिक जीवन के लगभग हर क्षेत्र में भाग लेने लगीं।
इसलिए चुनावी प्रक्रिया में महिलाओं की लगातार बढ़ती भागीदारी नीतीश कुमार की राजनीतिक और विकासात्मक पहल का ही परिणाम माना जाता है। बिहार में महिलाओं के बीच राजनीतिक आकांक्षा भी बढ़ी है और लगभग सभी राजनीतिक दलों ने संसदीय और विधान सभा चुनावों में महिलाओं को सम्मानजनक प्रतिनिधित्व भी दिया है। हालांकि जीत कर आने वाली महिला प्रतिनिधियों की संख्या अब भी बहुत कम है। 40 सांसदों में केवल 3 महिला सांसद हैं और उसी तरह 243 विधायकों मे से केवल 28 महिला विधायक हैं।
इंडिया टुडे टीवी ने 2019 में एक जनमत सर्वेक्षण कराया था, जिसमें यह दर्शाया गया कि महिलाएं ही थीं जो बिहार में एनडीए को बचाए रखना चाहती थीं, इसलिए नीतीश के नेतृत्व वाले गठबंधन एनडीए को 41 प्रतिशत महिला वोट पड़े जबकि राजद के नेतृत्व वाले ग्रैंड अलायंस को 31 प्रतिशत महिलाओं के वोट मिले। महिलाओं ने एनडीए को बेहतर कानून और व्यवस्था के साथ साथ शराब बंदी के प्रति नीतीश कुमार की प्रतिबद्धता के लिए भी वोट किया।
इस बीच बिहार में जाति-आधारित सर्वेक्षण और सरकारी नौकरियों का श्रेय लेने की लड़ाई जनता दल यूनाइटेड यानि जेडी यू और राजद के बीच चल रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भले ही फिर से एनडीए के साथ आ गए हैं, लेकिन उनका परंपरागत वोटर भी साथ आ गया है, इस पर अलग अलग आकलन है।
लोकसभा चुनाव से पहले नौकरी बांटने का मुद्दा इस लोक सभा चुनाव में जरूर उठेगा। तेजस्वी ने ही उप मुख्यमंत्री बनने के बाद 10 लाख नौकरियां देने का नारा उछाला था और अपनी प्रतिबद्धता दिखाते हुए 1.22 लाख शिक्षकों में से 25,000 को 2 नवंबर को ऐतिहासिक गांधी मैदान में बुलाकर नियुक्ति पत्र भी प्रदान किया था और शेष 97,000 शिक्षकों को उसी दिन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से नियुक्ति पत्र दिया गया था। अब इन दोनों मुद्दों के आधार पर राजद नीतीश के महिला वोट बैंक में सेंध लगाने का दावा कर रहा है। अब यह देखना है कि नीतीश की समर्थक महिलाएं अपना समर्थन बनाए रखती हैं अथवा नहीं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)









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