Bihar Politics: नीतीश और चिराग को एक साथ कैसे रख पाएंगे मोदी?

नीतीश कुमार ने विपक्षी एकता के प्रयास मल्लिकार्जुन खरगे को इंडी एलायंस का चेयरमैन बनवाने के लिए नहीं किए थे। सोनिया, राहुल और मल्लिकार्जुन खरगे घर बैठे रहे थे। नीतीश कुमार ने देश भर में कई दौरे करके क्षेत्रीय दलों का तीसरा मोर्चा बनने से रोका था।

नीतीश कुमार ने ममता बनर्जी, केजरीवाल और अखिलेश यादव को कांग्रेस के साथ मिलकर मोर्चा बनाने के लिए राजी किया था। ये तीनों ही नेता तीसरा मोर्चा बनाने की कवायद शुरू कर चुके थे। लेकिन सवाल यह खड़ा होता है कि अगस्त 2022 में नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी के साथ चल रहा अच्छा भला गठबंधन क्यों तोड़ा था।

Bihar Politics: How will Modi be able to keep Nitish and Chirag together

वह 2015 में लालू यादव के साथ गठबंधन करके देख चुके थे, 2015 से 2017 तक उनका लालू यादव के साथ गठबंधन था। इन दो सालों में उनके मुख्यमंत्री रहते हुए ही बिहार की हालत फिर वैसी ही हो चली थी, जैसी 2005 में उनके मुख्यमंत्री बनने से पहले थी। अपराध बढ़ रहे थे, आरजेडी के यादव नेताओं की गुंडागर्दी भी बढ़नी शुरू हो गई थी।

2014 में एनडीए छोड़कर जाने वाले नीतीश कुमार 2017 में लौटकर भाजपा के साथ आए और अपनी राजनीतिक स्थिति को फिर से मजबूत किया। यह क्या कम था कि भाजपा ने 2014 में अकेले चुनाव लड़कर 22 लोकसभा सीटें जीतने के बावजूद 2019 में खुद सिर्फ 17 लोकसभा सीटें लड़ी और नीतीश कुमार की जेडीयू को अपने बराबर 17 सीटें लड़ने को दे दी थीं।

Bihar Politics: How will Modi be able to keep Nitish and Chirag together

2020 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने खुद 110 सीटों पर ही चुनाव लड़ा, लेकिन नीतीश कुमार की जेडीयू के लिए 115 सीटें छोड़ी, 11 सीटों पर मुकेश सहनी की विकासशील इंसाफ पार्टी और 7 सीटों पर जीतन राम मांझी के हिन्दुस्तान आवाम मोर्चा ने चुनाव लड़ा। भारतीय जनता पार्टी की सीटें 2015 के मुकाबले 53 से बढ़कर 74 हो गई, तो जेडीयू की सीटें 71 से घटकर 43 रह गई। नीतीश कुमार की सीटें घटने का कारण चिराग पासवान थे, जिन्होंने आख़िरी समय पर एनडीए गठबंधन से बाहर निकल कर 134 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें से ज्यादातर सीटें वे थीं, जहां जनता दल यू के उम्मीदवार थे।

हालांकि भाजपा ने खुद से करीब करीब आधी सीटें जीतने वाले नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बना दिया था, लेकिन नीतीश कुमार के मन में यह गाँठ बैठी हुई थी कि भाजपा ने उन्हें कमजोर करने के लिए चिराग पासवान को जेडीयू के खिलाफ उम्मीदवार खड़ा करने के लिए उकसाया था। जेडीयू के भीतर ललन सिंह और विजेंद्र यादव जैसे नेता नीतीश कुमार को लगातार उकसा रहे थे कि मोदी-अमित शाह जेडीयू को खत्म कर देंगे।

नीतीश कुमार को सुलझा हुआ और गंभीर राजनीतिज्ञ माना जाता है, लेकिन 2015 से 2017 के कड़वे अनुभव के बावजूद नीतीश कुमार कान के कच्चे साबित हुए, जब उन्होंने ललन सिंह और विजेंद्र यादव की बातों में आ कर अगस्त 2022 में मोदी का साथ छोड़कर लालू यादव का दामन थामने का फैसला किया। नीतीश कुमार के एनडीए छोड़ने की जड़ में एक ही कारण था कि 2020 के चुनावों में उनके साथ धोखा हुआ। लालू यादव ने नीतीश कुमार के वफादारों के माध्यम से ही उन्हें पीएम का उम्मीदवार बनवाने का सपना दिखाया और मोदी से बदला लेने के लिए उकसाया।

आप याद करिए कि जब अगस्त 2022 में नीतीश कुमार ने मोदी का साथ छोड़ा था, तो वह मोदी के खिलाफ कैसे जहरीले तीर चलाते थे, उन्हें सौ से कम सीटों पर लाकर सत्ता से उखाड़ देने की बड़ी बड़ी बातें करते थे। कैसे मोदी को उखाड़ फैंकने के लिए बंगाल, तेलंगाना, महाराष्ट्र, यूपी के दौरे करके भानुमती का कुनबा इकट्ठा किया था। लेकिन जैसे ही कुनबा बना, कांग्रेस ने मल्लिकार्जुन खरगे को कुनबे का चेयरमेन बनवा लिया।

नीतीश कुमार की मोदी से नाराजगी चिराग पासवान के कारण शुरू हुई थी, क्योंकि चिराग पासवान ने जेडीयू के उम्मीदवारों के सामने अपने उम्मीदवार खड़े करके लालू यादव की आरजेडी की मदद की। नतीजतन 75 सीटों के साथ आरजेडी पहले नंबर की पार्टी बन कर आ गई। लेकिन पासवान परिवार और नीतीश कुमार का झगड़ा 2020 में तो शुरू हुआ नहीं था। यह झगड़ा तो 2005 में शुरू हो चुका था, जब जेडीयू और भाजपा मिलकर चुनाव लड़ रही थी।

तब भाजपा ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया था। 2004 के लोकसभा चुनाव तक राम विलास पासवान जेडीयू का हिस्सा थे, लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले राम विलास पासवान ने वाजपेयी सरकार से इस्तीफा देकर खुद की लोक जनशक्ति पार्टी बना ली थी। विधानसभा चुनावों में लोकपा को 23 सीटें मिलीं थी, सत्ता की चाबी उनके पास थी, लेकिन उन्होंने शर्त रख दी कि जो मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाएगा वह उसी को समर्थन देंगे। नतीजतन न लालू यादव मुख्यमंत्री बन पाए, न नीतीश कुमार।

छह महीने बाद फिर से चुनाव हुए, जिसमें राम विलास पासवान की लोजपा 23 से घटकर 10 सीटों पर आ गई, और भाजपा जेडीयू गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिल गया। मुख्यमंत्री बनते ही नीतीश कुमार ने पासवान जाति को अलग करके बाकी दलितों की महादलित कैटेगिरी बना दी। महादलितों के लिए विकास की योजनाएं बनाकर उन्हें अपने साथ जोड़ लिया। तब से राम विलास पासवान और नीतीश कुमार का छत्तीस का आंकडा चला आ रहा था, जो चिराग पासवान को विरासत में मिला था।

2017 में जब नीतीश कुमार एनडीए में लौटकर आए थे, तब राम विलास पासवान पहले से एनडीए में थे। 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने समझौते में नीतीश कुमार की जेडीयू को 17 सीटें दी थीं, तो राम विलास पासवान की लोक जन शक्ति पार्टी को 6 सीटें दी थीं। हालांकि लोकजनशक्ति पार्टी सभी छह सीटें जीत गईं, लेकिन पासवान का आरोप था कि नीतीश कुमार ने एनडीए में रहते हुए लोक जनशक्ति पार्टी को सभी छह सीटों पर हराने की कोशिश की थी।

2019 में राम विलास पासवान खुद लोकसभा का चुनाव नहीं लड़े थे लेकिन मोदी उन्हें मंत्रीमडल में बनाए रखना चाहते थे। इसलिए मोदी ने नीतीश कुमार से उन्हें राज्यसभा में भेजने को कहा, लेकिन नीतीश कुमार ने काफी आनाकानी के बाद पासवान को राज्यसभा में भेजने पर सहमति दी थी। इस बात का खुलासा खुद नरेंद्र मोदी ने नवंबर 2023 में तेलंगाना में एक जनसभा को संबोधित करते हुए किया था।

विधानसभा चुनावों के दौरान राम विलास पासवान बीमार होकर अस्पताल में भर्ती थे, ठीक उसी समय नीतीश कुमार ने भाजपा पर दबाव बनाकर लोक जनशक्ति पार्टी को एनडीए से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। 2020 के विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान को नीतीश कुमार को सबक सिखाने का मौक़ा मिला था। नीतीश कुमार से बदला लेने के लिए ही चिराग पासवान ने 134 उम्मीदवार खड़े कर दिए, उनमें से जीता तो एक भी नहीं, लेकिन नीतीश कुमार की जेडीयू को 71 सीटों से 43 पर ला दिया था।

इसी से खफा होकर पहले नीतीश कुमार ने लोक जनशक्ति पार्टी में विभाजन करवा दिया। चिराग पासवान के चाचा पशुपति कुमार पासवान पांच सांसदों के साथ अलग हो गए, चिराग पासवान अकेले रह गए। लोजपा में विभाजन करवाने के बाद नीतीश कुमार खुद भी मोदी का साथ छोड़कर लालू यादव के साथ चले गए। इसलिए नीतीश कुमार को शातिर राजनीतिज्ञ माना जाता है।

नीतीश कुमार के एनडीए छोड़ने के बाद चिराग पासवान को भाजपा दुबारा एनडीए में लेकर आई थी। अब अगर नीतीश कुमार वापस एनडीए में आ रहे हैं, तो चिराग पासवान का क्या होगा। इसी तरह इंडी एलायंस बनने के बाद नीतीश कुमार का साथ छोड़कर एनडीए में आए उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी का क्या होगा।

भारतीय जनता पार्टी के सामने ठीक 2020 वाली स्थिति फिर पैदा होगी। वह नीतीश कुमार के साथ चिराग पासवान, पशुपति पासवान, जीतन राम मांझी और उपेन्द्र कुशवाहा को एक साथ कैसे रख पाएंगे। पशुपति कुमार पासवान को छोड़कर बाकी तीनों नेता नीतीश कुमार को फूटी आँख नहीं सुहाते। अगर चिराग पासवान और नीतीश कुमार को इकट्ठा रख भी पाए तो क्या गारंटी है कि वे एक दूसरे को हराने की कोशिश नहीं करेंगे, जैसे चिराग पासवान ने 2019 के चुनाव के बाद नीतीश कुमार पर आरोप लगाया था कि उन्होंने लोजपा के उम्मीदवारों को हराने की कोशिश की थी।

नीतीश कुमार के पाला बदलने से पहले 27 जनवरी को चिराग पासवान ने अमित शाह और जेपी नड्डा से मुलाक़ात कर सीधा सवाल किया कि भाजपा उन्हें लोकसभा चुनावों में कितनी सीटें देगी। मुलाक़ात के बाद चिराग पासवान ने कुछ भी साफ़ साफ़ नहीं बताया, लेकिन यह तय है कि वह पिछली बार की छह सीटों से कम पर नहीं मानने वाले, लेकिन भाजपा के सामने समस्या सिर्फ चिराग पासवान नहीं, पशुपति कुमार पासवान, उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी को सीटों का बंटवारा भी हैं।

पहले ऐसा माना जा रहा था कि चिराग और पशुपतिनाथ को तीन तीन सीटें, जीतन राम मांझी और उपेन्द्र कुशवाहा को दो दो सीटें दी जाएँगी और बाकी 30 पर भाजपा लड़ेगी। लेकिन अगर इन सभी को दस सीटें बरकरार रहती हैं, तो बाकी बची 30 सीटें भाजपा और जेडीयू को बांटनी होंगी। भाजपा पिछली बार लड़ी गई 17 सीटों से कम पर नहीं लड़ेगी, इसका मतलब यह है कि जेडीयू को पिछली बार लड़ी गई 17 सीटों के मुकाबले इस बार 13 पर संतोष करना पड़ेगा। क्या नीतीश कुमार इसके लिए राजी होंगे?

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+