OPINION: भारतीय जनता पार्टी कल आज और कल
BJP Foundation Day: भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की सरकार के उद्योग मंत्री डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जब नेहरू-लियाकत समझौते और सरकार की कश्मीर नीति के विरोध में 1950 में केंद्र सरकार से इस्तीफा देकर तत्काल ही नए राजनीतिक दल के गठन की तैयारियां प्रारंभ कर दीं तो उसे बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया,
लेकिन विलक्षण सूझबूझ इच्छा शक्ति और संगठन क्षमता के धनी अपनी योजना को मूर्त रूप देने के लिए अथक प्रयास जारी रखे। इसके लिए उन्होंने पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक गुरुजी से मशविरा किया और 21 अक्टूबर 1951 को महान देशभक्त डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने प्रोफेसर बलराज मधोक और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के साथ मिलकर भारतीय जनसंघ रूपी एक नन्हा पौधा रोपा, जो आज भारतीय जनता पार्टी के रूप में विश्व का सबसे बड़ा राजनीतिक दल होने का गौरव अर्जित कर चुका है।

विश्व की यह सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी 6 अप्रैल को अपना 46वां स्थापना दिवस मना रही है। 1951 में गठित भारतीय जनसंघ के रूप में अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत करने वाली भारतीय जनता पार्टी का लगभग 74 वर्षों का यह राजनीतिक सफर अपने शुरुआती दौर में आसान नहीं रहा, परंतु पार्टी के लाखों करोड़ों कार्यकर्ताओं के अथक परिश्रम, समर्पण और दूरदर्शी नेतृत्व के रणनीतिक कौशल ने आज पार्टी को उस गौरवशाली मुकाम पर पहुंचा दिया है, जहां उसके आगे सारे राजनीतिक दल बौने दिखाई दे रहे हैं।
देश का कोई भी राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी को चुनौती देने की स्थिति में नहीं है, ना ही किसी दल के नेता में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की करिश्माई लोकप्रियता को चुनौती देने का सामर्थ्य है। इन 74 वर्षों में दक्षिण के एक दो राज्यों को छोड़कर लगभग संपूर्ण देश में भाजपा का जनाधार इतना मजबूत हो चुका है कि देश के अधिकांश राज्यों में या तो भारतीय जनता पार्टी के पास मुख्यमंत्री पद की बागडोर है अथवा वह सहयोगी दल के साथ सत्ता में सहभागी है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीत कर विगत 11 वर्षों से सत्ताधारी गठबंधन का नेतृत्व कर रही है। अतीत में लोकप्रियता के शिखर पर आसीन अटल बिहारी वाजपेयी ने भाजपा नीत राजग सरकार का नेतृत्व कर भारतीय राजनीति को नयी दिशा प्रदान की थी।
अगर हम भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक सफर को दो कालखंडों में विभाजित कर उसके उत्थान का मूल्यांकन करें तो 1951 से 1977 तक की अवधि में पार्टी ने चाल चरित्र और चेहरे से अपनी एक अलग पहचान बनाकर भारतीय जनमानस को यह संदेश देने में सफलता अर्जित की कि देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस का बेहतर विकल्प बनने की सामर्थ्य उसके अंदर मौजूद है। इसीलिए 1951 के बाद संपन्न हर लोकसभा चुनाव में उसकी ताकत में लगातार इजाफा होता गया।
1952 के लोकसभा चुनावों में जनसंघ ने तीन सीटें जीत कर संसद में पहली बार अपनी उपस्थिति दर्ज कराई 1957 में अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने राजनीतिक जीवन का प्रथम लोकसभा चुनाव जीत कर सदन में अपने पहले भाषण से ही तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व प. जवाहरलाल नेहरू को मंत्रमुग्ध कर कर दिया था। 1971 तक हर लोकसभा चुनाव में जनसंघ की सीटों में इजाफा होता रहा। 1971 में उसने 22 सीटों पर विजय अर्जित की। अनेक राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों में भी उसके वोट प्रतिशत में उल्लेखनीय वृद्धि का सिलसिला जारी रहा।
भारतीय जनसंघ की दिनों-दिन बढ़ती लोकप्रियता तत्कालीन कांग्रेस पार्टी और उसकी केंद्र सरकार की चिंता का कारण बन गई। 1975 में जब देश में आपातकाल लागू किया गया तो भारतीय जनसंघ के हजारों कार्यकर्ताओं और नेताओं को जेल में डाल दिया गया, जिनमें अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेता भी शामिल थे। आपातकाल में हुई ज्यादतियों ने कांग्रेस विरोधी बड़े राजनीतिक दलों को आपस में विलीनीकरण करके नये दल के गठन के लिए प्रेरित किया।
जनता पार्टी नाम से गठित नये राजनीतिक दल में जनसंघ की विशेष अहमियत थी। इसीलिए जब 1977 के लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी ने भारी बहुमत हासिल कर सरकार बनाई तो प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने अटल बिहारी वाजपेयी को विदेश मंत्री और लालकृष्ण आडवाणी को सूचना प्रसारण मंत्री के रूप सरकार में शामिल किया परंतु यह सरकार शुरू से अंतर्विरोधों का शिकार बनी रही और 1980 के मध्यावधि लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पुनः सत्ता में लौट आई। तब पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ के नेतृत्व ने जनता पार्टी से रिश्ता तोड कर नए राजनीतिक दल के गठन का फैसला किया।
नई दिल्ली में 6 अप्रैल 1980 को संपन्न बैठक में इस नये राजनीतिक दल को भारतीय जनता पार्टी नाम दिया गया जिसका चुनाव चिन्ह कमल तय किया गया। नवगठित भारतीय जनता पार्टी के प्रथम अध्यक्ष बने। उनके नेतृत्व में पार्टी दुगने उत्साह से अपने जनाधार का विस्तार करने में जुट गई परंतु 1984 के लोकसभा चुनावों में उसे मात्र दो सीटों से संतोष करना पड़ा।
इसका मुख्य कारण यह था कि श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर ने कांग्रेस को भारी बहुमत से सत्ता हासिल करने में विशेष भूमिका निभाई। 1986 में लालकृष्ण आडवाणी भारतीय जनता पार्टी के द्वितीय अध्यक्ष बने। उनके कार्यकाल में रामजन्म भूमि आंदोलन में सक्रिय सहभागिता और सोमनाथ से प्रारंभ उनकी रथयात्रा ने देशभर में भाजपा की लोकप्रियता को नयी ऊंचाईयों तक पहुंचा दिया। 1989 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को 85 सीटों पर शानदार विजय मिली।
भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता ने उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश सत्ता की दहलीज तक पहुंचा दिया। उसके बाद हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा की शानदार जीत का सिलसिला जारी रहा और 1996 में पहली बार केंद्र में भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता पर काबिज होने में सफलता अर्जित की। अटल बिहारी वाजपेयी को भाजपा नीत राजग सरकार का प्रधानमंत्री चुना गया यद्यपि प्रधानमंत्री के रूप में उनका पहला कार्यकाल मात्र 13 दिन और दूसरा कार्यकाल मात्र 13 महीने का रहा। 1999 में प्रारंभ तीसरे कार्यकाल में वे लगभग साढ़े चार साल तक प्रधानमंत्री पद पर आसीन रहे।
अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी सेना को धूल चटाई। उनके कार्यकाल में भारत ने परमाणु विस्फोट किए। पाकिस्तान से संबंध सुधारने की दिशा में अटलजी ने सराहनीय पहल की। उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, मानव संसाधन मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी, वित्त मंत्री जसवंत सिंह और विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा की राय अटल सरकार के महत्वपूर्ण फैसलों में विशेष अहमियत रखती थी।
अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी अद्भुत सूझबूझ से राजग के सभी दलों के बीच तालमेल बनाकर अत्यन्त कुशलतापूर्वक इस सरकार का नेतृत्व किया, लेकिन 2004 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को पुनः विपक्ष में बैठने का जनादेश मिला। 2004 से 2014 तक भारतीय जनता पार्टी ने संसद में प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका का निर्वाह किया। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर संसद में उसके सशक्त विरोध ने मनमोहन सिंह की सरकार को बचाव की मुद्रा अपनाने के लिए विवश किया। भारतीय जनता पार्टी ने सरकार पर भ्रष्टाचार में संलिप्त होने के जो गंभीर आरोप लगाए उनका संतोष जनक जवाब देने में मनमोहन सरकार असफल रही। यही भ्रष्टाचार 2014 में सत्ता से उसके निर्वासन का प्रमुख कारण बना।
यूं तो भारतीय जनता पार्टी विगत 11 वर्षों में लगभग पूरे भारत में मजबूती के साथ अपने पैर जमा चुकी है परन्तु अभी भी वह अपनी प्रगति और उपलब्धियों से संतुष्ट होकर नहीं बैठ सकती। एक सौ चालीस करोड़ देशवासियों ने उससे बहुत उम्मीदें लगा रखी हैं, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी पर उसका अटूट भरोसा है। भारतवासी यह अच्छी तरह जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का जो सुनहरा स्वप्न संजोया है उसे पूरा करने की इच्छा शक्ति और सामर्थ्य भाजपा नीत केंद्र सरकार के अंदर मौजूद है, लेकिन उस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को अर्जित करने की दिशा में अभी मील के कई पत्थर पार करना है।
केंद्र सरकार ने तीन तलाक़ की कुप्रथा को समाप्त करने, अतीत में जम्मू-कश्मीर को दिए गए विशेष राज्य का दर्जा समाप्त करने संबंधी कानून बना कर अपना वचन निभाया है। विगत दिनों संसद में वक्फ संशोधन बिल पारित कराकर एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। भाजपा का देश में समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए भी हमेशा से आग्रह रहा है। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि संविधान में समान नागरिक संहिता और एक देश एक चुनाव का प्रावधान करने के लिए भी वह कृत संकल्प है और इस संकल्प की पूरा करना अब उसकी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर है।
महिलाओं के सम्मान की रक्षा और युवा वर्ग के लिए रोज़गार के नये अवसर उपलब्ध कराने के लिए वह निरंतर प्रयास शील है। गरीबों के लिए मुफ्त राशन योजना और बुजुर्गो के लिए आयुष्मान योजना का विस्तार भाजपा नीत केंद्र सरकार की संवेदनशीलता का परिचायक है। सरकार ने पिछले 11 सालों में जो जनकल्याणकारी योजनाएं प्रारंभ की हैं उनकी फेहरिस्त बहुत लंबी है। विभिन्न प्रदेशों में कार्यरत भाजपा नीत सरकारों द्वारा जो निवेशक सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं वे रोजगार के नये अवसर पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
राजनीतिक मोर्चे पर भाजपा को पश्चिम बंगाल के साथ ही दक्षिण के राज्यों कर्नाटक, तेलंगाना, केरल और तमिलनाडु में बहुमत हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी यद्यपि कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में उसका व्यापक जनाधार है। विदेशी मोर्चे पर भाजपा नीत केंद्र सरकार की उपलब्धियां हमेशा से ही सराहनीय रही हैं और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पिछले 11 वर्षों में भारत की राय महत्वपूर्ण साबित हो रही है। जिस प्रकार अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प हमेशा ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपना अच्छा मित्र बताते हैं उससे यह उम्मीद भी बंधती है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी विलक्षण सूझबूझ से यह मुद्दा भी इस तरह सुलझा लेंगे जिससे कि भारत के आर्थिक हित प्रभावित नहीं हों।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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