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कैसे बंगाल जीतकर भी नंदीग्राम में सुवेंदु अधिकारी से हार गईं ममता बनर्जी ?

नंदीग्राम, 3 मई: पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी ने अपना प्रदर्शन पिछली बार से भी बेहतर किया है। 294 में से 292 सीटों पर ही वोटिंग हुई और तृणमूल के खाते में 213 सीटें आ चुकी हैं। जाहिर है कि भाजपा की जबर्दस्त घेराबंदी के बाद भी पार्टी को इतनी बड़ी सफलता दिलाने का पूरा श्रेय पार्टी सुप्रीमो को ही जाता है। फुरफुरा शरीफ के मौलाना की पार्टी के साथ गठबंधन करने के बावजूद लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस गठबंधन का जो हाल हुआ है, उससे यह भी साफ है कि राज्य में मुसलमानों का राजनीतिक मसीहा एकमात्र सीएम बनर्जी ही रह गई हैं, जिसने भाजपा को सत्ता से दूर करने के लिए पार्टी को बिना भटके एकमुश्त वोट दिया है। सवाल है कि फिर नंदीग्राम में बनर्जी के साथ क्यों 'खेला' हो गया ? हालांकि, ममता के पुराने सहयोगी सुवेंदु अधिकारी ने उन्हें अपने गढ़ में सिर्फ 1956 मतों से पराजित किया है, लेकिन हार तो फिर भी हार है।

नंदीग्राम के शेर बने सुवेंदु अधिकारी

नंदीग्राम के शेर बने सुवेंदु अधिकारी

नंदीग्राम में वोटों की गिनती में पहले ही राउंड से सुवेंदु अधिकारी ने अपनी पूर्व बॉस पर बढ़त लेनी शुरू कर दी थी। 13वें राउंड तक यही खेला चलता रहा। अचानक 14वें राउंड में ममता बनर्जी ने बाजी पलटने की कोशिश जरूर की। लेकिन, तृणमूल अध्यक्ष की यह खुशी ज्यादा देर तक नहीं रही और 16वें दौर में सुवेंदु ने फिर वापसी कर ली। आखिरकार 17वें या आखिरी राउंड में चुनाव आयोग ने उन्हें 1956 वोटों से विजेता घोषित किया। टीएमसी नेता हाई-प्रोफाइल चुनाव प्रचार के बावजूद अपनी सीट पर 1,08,808 (47.64%) वोट ही जुटा सकीं। लेकिन, 1,10,764 (48.49)वोट लेकर सुवेंदु ने साबित कर दिया कि भले ही 'दीदी' इस चुनाव में बंगाल की टाइगर साबित हुई हों, नंदीग्राम के शेर तो वही हैं। हालांकि, जीत का यह मार्जिन 50,000 से ज्यादा मतों से जीतने के दावे की तुलना में बहुत ही कम है।

नंदीग्राम का अबतक का चुनावी गणित

नंदीग्राम का अबतक का चुनावी गणित

इस बारे में बहुत कुछ कहा जा चुका है कि 2007 के जिस जमीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलन को भुनाकर ममता ने बंगाल से 34 साल की लेफ्ट की बादशाहत खत्म की थी, उसमें सुवेंदु अधिकारी और उनका पूरा कुनबा टीएमसी नेत्री का दाहिना हाथ बनकर खड़ा रहा। 2011 में जबसे तृणमूल बंगाल की सत्ता में आई उसने इसकी एवज में अधिकारी बंधुओं को तमाम तरह से पुरस्कृत करने की भी कोशिश की थी। इसके बदले अधिकारी बंधुओं ने भी कभी 'दीदी' को निराश नहीं किया। लेकिन, कहते हैं कि जब प्रशांत किशोर और अभिषेक बनर्जी की वजह से अधिकारी बंधू ममता से पूरी तरह से कट गए तो उन्होंने भाजपा का कमल थाम लेने में ही भलाई समझी और उसी दिन से नंदीग्राम में नया सियासी संग्राम छिड़ गया। 2009 के लोकसभा चुनाव से ही तामलुक इलाके में टीएमसी का दबदबा रहा है। नंदीग्राम विधानसभा इसी संसदीय क्षेत्र में आता है। तामलुक लोकसभा हो या नंदीग्राम विधानसभा यहां टीएमसी ने चाहे अधिकारी परिवार को टिकट दिया हो या किसी और को उसकी जीत सुनिश्चित रहती आई थी। यहां तक कि 2019 के मोदी लहर में भी दिब्येंदु अधिकारी ने यहां भाजपा के उम्मीदवार को करीब 2 लाख वोटों से हरा दिया था। यानी 2009 से लेकर 2019 तक टीएमसी का वोट शेयर कभी भी यहां 50 फीसदी से कम नहीं हुआ था।

सुवेंदु ने कैसे शुरू किया नंदीग्राम में 'खेला'

सुवेंदु ने कैसे शुरू किया नंदीग्राम में 'खेला'

बागी हुए सुवेंदु को सबक सिखाने के लिए अबकी बार जैसे ही ममता बनर्जी ने नंदीग्राम से अपनी उम्मीदवारी घोषित की, तभी से उन्होंने टीएमसी मुखिया के खिलाफ ताल ठोक दिया था। भाजपा की परंपरा से अलग हटकर उन्होंने खुद ही मान लिया था कि नंदीग्राम में उन्हें ही टिकट मिलेगा। सुवेंदु 50 हजार से भी ज्यादा वोटों से ममता को हराने के दावे कर रहे थे। चुनाव के दौरान एक रैली में उन्होंने क्षेत्र के 30 फीसदी मुस्लिम वोट को टीएमसी का 'फिक्स डिपोजिट' कहकर, उसके आधार पर 70 फीसदी गैर-मुस्लिम वोटों को सत्ताधारी दल के खिलाफ गोलबंद करने की कोशिश शुरू कर दी थी। कई लोगों का कहना है कि सुवेंदु ने शुरू से ही नंदीग्राम में धार्मिक कार्ड खेलना शुरू कर दिया था। शायद इसी की काट में ममता भी सार्वजनिक मंच से कभी चंडी पाठ तो कभी दुर्गा पाठ करने को मजबूर हो गई थीं। जबकि, यह उनकी अबतक की राजनीति के ठीक उलट बात थी।

नंदीग्राम में इस वजह से हारीं ममता बनर्जी !

नंदीग्राम में इस वजह से हारीं ममता बनर्जी !

लेकिन, सुवेंदु नहीं रुके। उन्होंने कभी सीएम बनर्जी को 'बेगम' कहकर संबोधित करना शुरू कर दिया तो कभी उनपर बंगाल को 'मिनी पाकिस्तान' बनाने का आरोप लगाने लगे। माना जा रहा है कि भाजपा कि यह रणनीति काम कर गई। क्षेत्र का ज्यादातर हिंदू वोट (करीब 53 फीसदी हिंदू आबादी) उसके पक्ष में एकजुट हुआ। एक बात और गौर करने वाली है कि 1 अप्रैल को नंदीग्राम में हुए चुनाव में मतदान प्रतिशत 88 फिसदी दर्ज किया गया, जो कि 2016 से भी 1 फीसदी ज्यादा है। कई विश्लेषकों का मानना है कि यहां भाजपा का कार्ड काम कर गया और ज्यादा वोटिंग प्रतिशत सुवेंदु अधिकारी के पक्ष में चला गया। कुल मिलाकर 'बेगम' और 70 बनाम 30 फीसदी (हिंदू बनाम मुस्लिम) वाला बयान नंदीग्राम में बीजेपी के हक में गया लग रहा है।

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