बुरे फंसे बंगाल के पूर्व चीफ सेक्रेटरी, अलपन बंदोपाध्याय पर हो सकती है ये कार्रवाई

कोलकाता, 1 जून: पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्य सचिव अलपन बंदोपाध्याय के खिलाफ डिजास्टर मैनेजमेंट ऐक्ट के तहत आपराधिक कार्रवाई शुरू हो सकती है। वे पिछले हफ्ते यास चक्रवात पर प्रधानमंत्री की रिव्यू मीटिंग में शामिल नहीं हुए थे और न ही उसकी वजह से पश्चिम बंगाल को हुए नुकसान की प्रेजेंटेशन ही दी थी। हालांकि, बंदोपाध्याय की टीएमसी सरकार अब राजनीतिक नियुक्ति कर चुकी है, इसलिए माना जा रहा है कि वह उन्हें कानूनी कार्रवाई से बचाने की हर मुमकिन कोशिश करेगी। बता दें कि सोमवार को पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव पद से इस्तीफा देकर रिटायरमेंट लेने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें अपना मुख्य सलाहकार नियुक्त कर लिया था।

अलपन बंदोपाध्याय के खिलाफ हो सकती है कार्रवाई

अलपन बंदोपाध्याय के खिलाफ हो सकती है कार्रवाई

अलपन बंदोपाध्याय को केंद्र सरकार ने नोटिस भेजकर तीन दिनों के भीतर जवाब देने को कहा है कि उनके खिलाफ डिजास्टर मैनेजमेंट ऐक्ट के तहत कार्रवाई क्यों नहीं शुरू की जानी चाहिए। अगर इस कानून के तहत वो दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें एक साल तक की जेल और जुर्माने की सजा भुगतनी पड़ सकती है। इस ऐक्ट की धारा 51 के मुताबिक, 'जो कोई भी बिना उचित कारण के केंद्र सरकार की ओर से जारी या राज्य सरकार या नेशनल एग्जिक्यूटिव कमिटी या स्टेट एग्जिक्यूटिव कमिटी के किसी निर्देशों के पालन करने से मना करता है, उसे एक साल तक जेल और जुर्माने ये दोनों की सजा सुनाई जा सकती है।' इसमें आगे कहा गया है कि अगर यह तय हो जाता है कि यदि उस व्यक्ति के काम में बाधा डालने या निर्देश को मानने से इनकार करने के 'परिणाम से जीवन हानि होती है या खतरे में पड़ती है' तो सजा को बढ़ाकर दो साल तक किया जा सकता है।

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    बंदोपाध्याय के पीछे खड़ी है ममता सरकार

    बंदोपाध्याय के पीछे खड़ी है ममता सरकार

    हालांकि, पश्चिम बंगाल सरकार के एक अधिकारी ने न्यूज18 से कहा है कि राज्य सरकार पूरी तरह से बंदोपाध्याय के पीछे खड़ी है। उन्होंने अलपन बंदोपाध्याय के कदम का बचाव करते हुए दावा किया कि 'चीफ सेक्रेटरी मुख्यमंत्री को रिपोर्ट करते हैं और वह पीएम की रिव्यू मीटिंग में मुख्यमंत्री के साथ गए थे और उन्हीं के साथ निकल गए थे। वह सीएम के निर्देशों के मुताबिक काम कर रहे थे, जो कि कई सारी रिव्यू मीटिंग कर रही थीं और उन्हें भी उनके साथ ही रहना था। इसलिए चीफ सेक्रेटरी के पास डिजास्टर मैनेजमेंट ऐक्ट के तहत बचाव के 'वाजिब कारण' मौजूद हैं। सीएम पहले ही कह चुकी हैं कि वह प्रधानमंत्री से अनुमति लेकर बैठक छोड़कर निकली थीं। यही नहीं, चीफ सेक्रेटरी चक्रवात राहत कार्यों में व्यस्त थे न कि उसके काम में रुकावट डाल रहे थे।' लेकिन, सवाल है कि ये दलीलें कानून की कसौटी पर कितनी खरी उतरती हैं।

    'सीएम को पीएम ने बैठक से जाने की अनुमति नहीं दी थी'

    'सीएम को पीएम ने बैठक से जाने की अनुमति नहीं दी थी'

    डिजास्टर मैनेजमेंट ऐक्ट की धारा 56 के तहत एक सरकारी अधिकारी को किसी वजह से ड्यूटी से हटने के लिए अपने वरिष्ठ से लिखित इजाजत की दरकार होती है या फिर उसके पास कानूनी तौर पर मान्य कारण होने चाहिए। इस बीच केंद्र सरकार के अधिकारियों ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के उन दावों को खारिज कर दिया है कि प्रधानमंत्री ने उन्हें बैठक से जाने की अनुमति दी थी, इसलिए मुख्य सचिव ने जो किया है, वह डिजास्टर मैनेजमेंट ऐक्ट का उल्लंघन है। केंद्र सरकार के अधिकारी ने कहा है, 'मुख्य सचिव एक अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी हैं और उन्होंने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को नजरअंदाज किया, इसका नतीजा ये हुआ कि पीएम को कोई प्रेजेंटेशन नहीं दी गई और पश्चिम बंगाल सरकार का कोई भी अधिकारी पीएम की रिव्यू मीटिंग में उपस्थित नहीं हुआ। यह चीफ सेक्रेटरी की जिम्मेदारी थी कि रिव्यू मीटिंग तय कार्यक्रम के मुताबिक हो। अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों से राजनीति का हिस्सा बनने की उम्मीद नहीं की जाती है।' जो भी है लगता है यह मामला एकबार फिर केंद्र की मोदी सरकार और बंगाल की ममता सरकार के बीच तकरार की वजह बनने वाला है।

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