काशी में है त्रिजटा राक्षसी का प्राचीन मंदिर, माता सीता ने दिया था एक दिन की देवी बनने का वरदान
बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी दुनिया से निराली है। जैसा कहीं नहीं होता वैसा काशी में सुनने और देखने को मिलता है। आज हम आपको इस धार्मिक नगरी के ऐसे ही रहस्य से रूबरू कराएंगे जिसके बारे में आपने पहले शायद ही कभी सुना होगा। महादेव की नगरी काशी में 33 कोटि देवी देवता विराजमान है। काशी के अलग-अलग जगहों पर इन देवी देवताओं के प्राचीन और ऐतिहासिक मन्दिर भी है। इसी काशी में एक राक्षसी का भी मंदिर है जिनकी पूजा साल में सिर्फ एक बार ही होती है।

त्रिजटा राक्षसी का प्राचीन मंदिर
बाबा विश्वनाथ के दरबार से महज कुछ ही दूरी पर त्रिजटा राक्षसी का प्राचीन मंदिर है। काशी के इस मंदिर में इस राक्षसी के दर्शन और पूजन के लिए दूर-दूर से भक्त यहां आते हैं। काशी के इस अनोखे मंदिर में चढ़ावा भी बेहद खास होता है। त्रिजटा राक्षसी को मूली और बैंगन का भोग लगाया जाता है। साल में सिर्फ एक बार कार्तिक पूर्णिमा के अगले दिन यहां भक्तों की भीड़ होती है। मान्यता है कि कार्तिक मास में एक महीने गंगा स्नान के बाद जो भी राक्षसी त्रिजटा की पूजा करता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती है।

माता सीता का दिया था साथ
त्रेतायुग में जब रावण ने माता सीता का हरण कर उन्हें अशोक वाटिका में रखा था तो राक्षसी त्रिजटा को ही उन्हें देखरेख की जिम्मेदारी दी गई थी। अशोक वाटिका में जब भी माता सीता पर कोई संकट आता था तो त्रिजटा ही उसका हरण करती थी। भगवान राम ने जब रावण को पराजित कर माता सीता को अशोक वाटिका से वापस ले जाने लगे तभी त्रिजटा ने उन्हें अपने साथ ले जाने का आग्रह किया जिस पर माता सीता ने उन्हें वरदान दिया कि काशी में तुम्हे एक दिन की देवी के रूप में पूजा जाएगा। जो भी ऐसा करेगा तुम उसकी सदैव हर संकट से रक्षा करोगी। काशी खण्ड में इस बात का उल्लेख किया गया है।

माता सीता की गुप्तचर
वैसे तो माता त्रिजटा रावण की सेविका थी लेकिन वह भगवान श्रीराम की विजय में विश्वास रखती थी। उसनें अपने व माता सीता के बीच के संबंधों को जगजाहिर नही होने दिया किंतु हर पल वह माता सीता को हर महत्वपूर्ण जानकारी देती थी जैसे कि लंका का दहन होना, समुंद्र पर सेतु बनना, राम लक्ष्मण का सुरक्षित होना इत्यादि। त्रिजटा के द्वारा समय-समय पर माता सीता को जानकारी देते रहने से उनकी हिम्मत बंधी रहती थी।
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त्रिजटा का अन्य रामायण में विवरण
त्रिजटा के जन्म के बारें में वाल्मीकि रामायण व तुलसीदास की रामचरितमानस में तो नही बताया गया है लेकिन कुछ अन्य भाषाओँ में त्रिजटा के बारें में भिन्न-भिन्न विवरण सुनने को मिलते हैं। सबसे प्रमुख मान्यता के अनुसार त्रिजटा को रावण के छोटे भाई विभीषण व उनकी पत्नी सरमा की पुत्री बताया गया हैं। कुछ अन्य रामायण में त्रिजटा को रावण व विभीषण की बहन के रूप में दर्शाया गया है। किसी भी बात को प्रमाणिक तौर पर नही कहा जा सकता लेकिन यह निश्चित है कि उसका जन्म एक राक्षस कुल में हुआ था फिर भी उसके अंदर राक्षसी प्रवत्ति के गुण नामात्र थे। वह हमेशा माता सीता की सच्ची मित्र के रूप में याद की जाती है।












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