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नवरात्र में देवी मां को खुश करने के लिए खौलती खीर से नहाता है पुजारी, देखिए वीडियो

Varanasi news, वाराणसी। काशी के जैतपुरा में बागेश्वरी देवी दुर्गा मंदिर में नवरात्र में कड़हा पूजन होता है, जिसमें सैकड़ों भक्तों की मौजूदगी में पुजारी खौलती हुई खीर, दूध, घी और आग से खेलता है। इसके बाद वह अग्निदेव को पसंद करने के लिए अग्निकुंड में अपना सिर तक झोंक देते हैं। दरअसल, देश में समृद्धि और शांति के लिए भगवान श्री कृष्ण ने शक्ति की पूजा-अर्चना शुरू की थी, इसे आज भी कि‍या जाता है। इसमें पुजारी खौलती खीर को बदन पर डालकर और आग से खेलकर देवी की आराधना करते हैं।

 भगवान कृष्ण के नाम पर होती है पूजा

भगवान कृष्ण के नाम पर होती है पूजा

ठंडे पानी से स्नान कर पुजारी खौलते घी से पुड़िया निकालता है और सबको बांटता है। अग्नि कुंड में झुककर देवी को पुजारी प्रसन्न करता है। इतना ही नहीं खौलती खीर की कई हांडियों से खीर निकालकर पुजारी अपने शरीर पर और भक्तों पर लगाते या यूं कहें लगभग नहाते दिखता हैं। इतना सब कुछ करने के बाद भी पुजारी का बाल भी बाका नहीं होता और लोग चमत्कार को नमस्कार करते हैं। आस्था में डूबे भक्त इस पूजन को देखने के लिए दूर-दराज से आते हैं। इस पूजा के आयोजक अशोक यादव बताते हैं कि भगवान कृष्ण और उनके भाई बलदाऊ की पूजा होती है। इसमें खीर का भोग लगाकर अपने शरीर पर लगाते हैं। भगवान के प्रसाद होने के कारण खौलती खीर भी शरीर पर कोई फर्क नहीं डालती। इस पूजा को क्षेत्र के सुख-शांति के लिए करवाया जाता है। यह यदुवंशियों की मुख्य पूजा है।

भक्त मानते हैं देवी की कृपा से नहीं जलता कोई

भक्त मानते हैं देवी की कृपा से नहीं जलता कोई

यदुवंशी समाज के इस प्राचीन अनुष्ठान को समाज का पढ़ा-लिखा तबका भी आस्था की शक्ति मानता है। विश्व कल्याण के नाम पर वर्ष में दो बार पड़ने वाले नवरात्र की शुरुआत इस गाव में ऐसे ही होती है। भानी भगत ही नहीं, उनके पूर्वजों से ही इस अनुष्ठान को निभाने की परंपरा चली आ रही है। अनुष्ठान के बाद शाकला, दूध, पूड़ी और घी लोगों में प्रसाद के रूप में वितरित भी कर दिया जाता है। पूजा में आए श्रद्धालुओं की मानें तो ये माता का पूजन है, इसमें गर्म खीर से भक्त लोग नहाते हैं। इसमें माता के आशीर्वाद लेने के लिए आये हैं और जो पुजारी कहते हैं उसे सुनते हैं। इसमें माता का आशीर्वाद है कि भक्त खौलती खीर से भी नहीं जलते हैं। श्रद्धालु बताते हैं कि इस पूजा में माता साक्षात् यहां आती हैं और उन्हीं की शक्ति होती है। इस पूजा की बहुत मान्यता होती है।

बंद होने के बाद फिर शुरू हुई परंपरा

बंद होने के बाद फिर शुरू हुई परंपरा

कड़हा पूजन का अनुष्ठान धर्म की नगरी काशी में कोई नया नहीं है। इससे पहले भी इस अनुष्ठान को काफी अमानवीय तरीके से वाराणसी में कई अंजाम दिया जा चुका है, जिसमे अबोध से लेकर गोद के बच्चों को भी पुजारी अपने साथ गरम दूध से स्नान में शामिल कर लेता था, लेकिन मीडिया में चर्चा के बाद इसपर अंकुश लग पाया था। हांलाकि, अब धीरे-धीरे ही सही यह अनुष्ठान एक बार फिर धार्मिक आस्था के नाम पर किसी मदारी के तमाशे की तरह परोसा जाना शुरू हो गया है।

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