उत्तराखंड के प्रसिद्ध मंदिर परिसर में जन्म दिन का केक काटने की फोटो सोशल मीडिया में वायरल, खड़ा हुआ विवाद
जौनसार बावर स्थित हनोल महासू देवता मंदिर के परिसर का मामला
देहरादून, 19 जुलाई। जौनसार बावर स्थित विश्व प्रसिद्ध हनोल महासू देवता मंदिर के परिसर में जन्म दिन मनाने और केक काटने की फोटो सोशल मीडिया में वायरल हो गई है। जिसके बाद एक नया विवाद खड़ा हो गया है। स्थानीय लोगों में इसको लेकर आक्रोश नजर आ रहा है, साथ ही इस पर कार्रवाई की मांग की गई है।

मंदिर परिसर के अंदर की फोटो हुई वायरल
प्राप्त जानकारी के अनुसार सोमवार को सोशल मीडिया पर जौनसार बावर स्थित हनोल महासू देवता मंदिर के अंदर के फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए। फोटो में कुछ लोग मंदिर परिसर के अंदर केक काटते हुए नजर आ रहे हैं। इस फोटो के सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद लोगों ने इस पर आपत्ति जताई है। स्थानीय लोगों ने इसको लेकर प्रशासन से कार्रवाई की मांग की हैै।

स्थानीय लोगों ने किया जमकर विरोध
सोशल मीडिया में फोटो वायरल होने पर एक स्थानीय व्यक्ति अभय कैंतुरा ने फेसबुक पर पोस्ट कर आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने लिखा कि
पांचवे धाम के रूप में ख्याति पा रहे श्री महासू महाराज के हनोल मंदिर के भीतर की आयी कुछ तस्वीरों की। जिसमे एक परिवार के कुछ लोग जन्मदिन का केक काट रहे है, आपत्ति केक काटने की नही बल्कि मंदिर के भीतर उस कमरे से ली गयी तस्वीरों की है। जहां पर फ़ोटो खींचना भी सख्त मना है । यह वह कमरा है जहां से भक्तजन श्री महासू महाराज के देव दर्शन करते है। यही से पुजारी अग्नि की रोशनी से दर्शन करवाते है। अब उस कमरे में पार्टी होने लगी है। मान्यताओ को दरकिनार किया जा रहा है। ऐसा नही होना चाहिए था।

महासू देवता के बारे में सबकुछ
महासू देवता मंदिर में महासू देवता की पूजा की जाती हैं, जो कि शिवशंकर भगवान के अवतार माने जाते हैं। मिश्रित शैली की स्थापत्य कला को संजोए यह मंदिर बहुत प्राचीन व प्रसिद्ध हैं। 'महासू देवता' एक नहीं चार देवताओं का सामूहिक नाम है और स्थानीय भाषा में महासू शब्द 'महाशिव' का अपभ्रंश है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी, संपूर्ण जौनसार-बावर क्षेत्र, रंवाई, हिमाचल प्रदेश के सिरमौर, सोलन, शिमला, बिशैहर और जुब्बल तक महासू देवता की पूजा होती है। इन क्षेत्रों में महासू देवता को न्याय के देवता और मन्दिर को न्यायालय के रूप में माना जाता है। महासू देवता के मंदिर के गर्भ गृह में भक्तों का जाना मना है। केवल मंदिर का पुजारी ही मंदिर में प्रवेश कर सकता है। यह बात आज भी रहस्य है। मंदिर में हमेशा एक ज्योति जलती रहती है जो दशकों से जल रही है। मंदिर के गर्भ गृह में पानी की एक धारा भी निकलती है, लेकिन वह कहां जाती है, कहां से निकलती है यह अज्ञात है। यह मंदिर 9वीं शताब्दी में बनाया गया था। वर्तमान में यह मंदिर पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) के संरक्षण में है। मान्यता भी है कि महासू ने किसी शर्त पर हनोल का यह मंदिर जीता था। यह मंदिर देहरादून से 190 किमी और मसूरी से 156 किमी दूर है। यह मंदिर चकराता के पास हनोल गांव में टोंस नदी के पूर्वी तट पर स्थित है।












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