मसूरी और सहसपुर में हैट्रिक बनाने की कोशिश में भाजपा तो राजपुर में कांग्रेस को इतिहास कायम रखने का भरोसा

देहरादून की मसूरी, राजपुर और सहसपुर सीट

देहरादून, 7 फरवरी। राजधानी देहरादून की मसूरी, राजपुर और सहसपुर सीट तीनों सीटें क्षेत्रीय और जातिय समीकरण के हिसाब से खास हैं। तीनों सीटों पर 2017 में भाजपा ने कब्जा जमाया था। लेकिन इस बार समीकरण बदले हुए नजर आ रहे हैं। मसूरी और सहसपुर सीट पर भाजपा हैट्रिक बनाने की कोशिश में है तो राजपुर सीट पर कांग्रेस परिवर्तन के जरिए इतिहास कायम रखना चाहती है।

BJP trying to make hat-trick in Mussoorie and Sahaspur, Congress confident of maintaining history in Rajpur

मसूरी में गणेश और गोदावरी फिर से आमने-सामने
सबसे पहले बात वीआईपी सीट मसूरी की। मसूरी पर्यटन की दृष्टि से सबसे खास सीट है। मसूरी को लोग पहाड़ों की रानी के नाम से जानते हैं। मसूरी का नाम आते ही पहाड़ की सुंदरता सामने आ जाती है। पिछले सालों में मसूरी में कई विकास योजनाएं हुई हैं। जिन्हें कांग्रेस अपने शासनकाल के काम और भाजपा अपने सरकार के काम बता रही है। मसूरी सीट पर 2007 में कांग्रेस के जोत सिंह गुनसोला विधानसभा पहुंचे, लेकिन 2012 में बीजेपी के गणेश जोशी ने जोत सिंह गुनसोला को हरा दिया। 2017 में गणेश जोशी दोबारा जीत कर आए और आ​खिरी समय में सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाए गए। इस बार मसूरी सीट पर एक बार फिर भाजपा के गणेश जोशी और कांग्रेस की गोदावरी थापली के बीच मुकाबला है। गणेश जोशी सैनिक पृष्टभूमि और मिलनसार व्यक्तित्व के कारण लोगों में अपनी खास जगह बनाते हैं। जबकि गोदावरी थापली महिलाओं और एक खास जाति वर्ग के बीच खुद का वोटबैंक रखती हैं। हालांकि मसूरी सीट पर हर जाति वर्ग के मतदाता हैं। खासकर राजपूत और ब्राह्मण मोटर। ऐसे में गोदावरी ​थापली एक बार जनता से विधानसभा पहुंचाने का आशीर्वाद मांग रही हैं जबकि गणेश जोशी अपने कार्यों और छवि के आधार पर हैट्रिक लगाने के बेताब नजर आ रहे हैं।
राजपुर रोड बदलेगा इतिहास या रहेगा कायम
एक तरफ वीआईपी राजपुर रोड और दूसरी तरफ मलिन ​बस्तियों के क्षेत्र से बनी राजपुर रोड सीट भी 2017 की तरह कांग्रेस के राजकुमार और भाजपा के खजानदास आमने सामने हैं। राजपुर सीट पर एक बार कांग्रेस एक बार भाजपा कब्जा जमा चुकी है। इस बार दोनों दल अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। राजकुमार अपने मलिन बस्तियों के लिए काम को जबकि खजानदास मोदी चेहरे पर जनता के बीच हैं। पहली बार इस सीट पर 2012 में आ​रक्षित सीट पर चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी राजकुमार विधायक बने। 2017 में धनोल्टी सीट छोड़कर आए भाजपा के खजानदास ने यहां से जीत दर्ज की। इससे पहले यह सीट राजपुर नाम से जानी जाती थी। तब 2002 में यहां कांग्रेस प्रत्याशी हीरा सिंह बिष्ट जीते थे, जबकि 2007 में भाजपा के गणेश जोशी ने बाजी मारी। इस सीट का इतिहास एक बार भाजपा और एक बार कांग्रेस का। ऐसे में कांग्रेस इस मिथक को बरकरार रखना चाहेगी। राजपुर सीट पर पर्वतीय के साथ हिंदू, मलिन बस्ती के वोटर, मुस्लिम वोटर हैं। राजकुमार की मलिन बस्ती और मुस्लिम वोटर में जबकि खजानदास की पर्वतीय और पॉश इलाकों में वोटबैंक माना जाता है।
सहसपुर में भाजपा की राह नहीं आसान
देहरादून जिले की अल्पसंख्यक बाहुल्य सीट सहसपुर सीट पर भाजपा हैट्रिक मारने को बेताब है। हालांकि इस सीट पर इस बार कांग्रेस का पक्ष भी मजबूत माना जा रहा है। 2002 में सहसपुर सीट पर कांग्रेस के साधु राम जीते, जबकि 2007 में बीजेपी के राजकुमार और 2012, 2017 दो बार सहदेव पुंडीर जीतकर विधायक बने। सहदेव पुंडीर एक बार फिर जीतकर हैट्रिक बनाने को मैदान में है। जबकि कांग्रेस ने इस बार आर्येंद्र शर्मा को टिकट देकर चुनाव दिलचस्प बना दिया। इस सीट पर 2017 में कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय चुनाव हार गए थे। जिसके बाद किशोर उपाध्याय ने खुलकर बगावत को अपनी हार का कारण माना था। किशोर का दावा था कि निर्दलीय आर्येंद्र शर्मा उनकी हार का कारण बने। ऐसे में इस बार सीधी चुनौती कांग्रेस और भाजपा में नजर आ रही है। सहदेव पुंडीर के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर बताई जा रही है। जिसका फायदा कांग्रेस को हो सकता है। ऐसे में भाजपा एक तरफ हैट्रिक बनाने की कोशिश में है तो कांग्रेस नया इतिहास कायम करना चाहेगी।

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