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Raksha Bandhan 2023: पिरूल से तैयार हो रही राखियां, पहाड़ में वनाग्नि का मुख्य कारण कैसे बना रोजगार का साधन

उत्त्तरकाशी मे महिलाओं का एक समूह पिरूल से राखियां तैयार कर रहा है। ये समूह दुरस्त उत्तरकाशी के पुरोला का है। जहां ग्रामीण उद्यम परियोजना के अंतर्गत महिला समूह को पिरूल से राखियां बनाने का प्रशिक्षण दिया गया।

रक्षाबंधन त्यौहार को लेकर बहनों ने तैयारियां शुरू कर दी है। इस त्यौहार में सबसे ज्यादा बहनें राखी पर ही फोकस करती हैं। हर बहन अपने भाई को सबसे आकर्षक और अच्छी राखी पहनाना पसंद करती हैं। इसके लिए बाजार में हर साल तरह तरह की राखियां उपलब्ध रहती हैं। पिछले कुछ सालों से आर्गेनिक और देशी उत्पादों पर सरकार फोकस कर रही है। कुछ ऐसी ही पहल पहाड़ की महिलाओं ने इस बार की है। उत्तरकाशी की महिलाएं पिरूल से राखियां तैयार कर रही हैं।

Raksha Bandhan 2023 UTTARKASHI Rakhi being prepared from Pirul, how the main reason for forest fire in the mountain became a means of employment

उत्त्तरकाशी मे महिलाओं का एक समूह पिरूल से राखियां तैयार कर रहा है। ये समूह दुरस्त उत्तरकाशी के पुरोला का है। जहां ग्रामीण उद्यम परियोजना के अंतर्गत महिला समूह को पिरूल से राखियां बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। जिसके बाद करीब 28 महिलाएं इन दिनों स्वरोजगार के लिए राखियां तैयार कर रही हैं। ग्रामीण उद्यम परियोजना के परियोजना प्रबंधक कपिल उपाध्याय ने बताया कि पिरूल से राखियां बनाने का प्रशिक्षण महिलाओं को दिया गया था जिसके बाद महिलाएं इसमे रुचि ले रही हैं और आत्मनिर्भर बन रही हैं।

उत्तराखण्ड में 500 से 2200 मीटर की ऊंचाई पर बहुतायत से पाये जाने वाले चीड़ के पेड़ों की पत्तियों को पिरूल नाम से जाना जाता है। उत्तराखण्ड वन सम्पदा के क्षेत्र में चीड़ के वन भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। इसके सूखे पत्ते अत्यन्त ज्वलनशील होते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में वनाग्नि के मुख्य कारणों में पिरूल भी एक कारण है। चीड़ के पेड़ पर लगने वाले ठीटे का थोड़ा बहुत व्यावसायिक उपयोग शो पीस बनाकर किया जाता रहा है, जो कि पर्यटकों को भी पसंद आता रहा है।

इसके अलावा पिरुल का उपयोग जानवरों के बिछावने के रूप में होता आ रहा है। इसके अलावा पिरुल का अब तक कोई खास इस्तेमाल नहीं हुआ है। दावा है कि 1970 के दशक में नैनीताल जिले के कैंची नामक स्थान में 'नवीन पाइनैक्स' नाम से नवीन नाम के एक उद्यमी ने पिरूल से रेशा तैयार कर वस्त्र उद्योग में इसका इस्तेमाल कर एक पहल की थी। लेकिन ये पायलेट प्रोजेक्ट ज्यादा दिन नहीं चल पाया।

इसके अलावा काफल ट्री पर स्कूली छात्रा ने पिरूल की हरी पत्तियों से टोकरी, बैग आदि बनाकर प्रेरक कार्य किया। जो कि पहाड़ में प्लास्टिक के विकल्प के रूप में कैरी बैग का स्थान लेने की दिशा में महत्वपूर्ण माना गया है। उधर उत्तराखण्ड सरकार गैर पारम्परिक ऊर्जा के क्षेत्र में इसके उपयोग पर काम शुरू भी हो चुका है।

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