पीएम मोदी के अलावा भी योगी आदित्यनाथ का गुजरात से है गहरा नाता

योगी आदित्यनाथ का गुजरात से है गहरा नाता, उनके गुरुभाई एख मुस्लिम हैं जिन्होंने धर्म को बदला और एक महंत बनें।

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की हाल ही में कमान संभालने वाले योगी आदित्यनाथ का गुजरात से काफी करीब का रिश्ता है। वह ना सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी हैं बल्कि नाथ संप्रदाय के महंत गुलाबनाथ बापू के भी काफी करीबी हैं। गुल मोहम्मद का जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ था लेकिन उन्हें महंत गुलाबनाथ बापू के नाम से जाना जाता है वह योगी आदित्यनाथ के गुरुभाई भी है।

योगी आदित्यनाथ ने की थी महंत की नियुक्ति

महंत अवैद्यनाथ योगी आदित्यननाथ के गुरु हैं वह महंत गुलाबनाथ के भी गुरु थे। इन लोगों का आपस में रिश्ता इतना मजबूत था कि जब गुलाबनाथ ने 86 वर्ष की आयु में 6 दिसंबर 2016 को अंतिम सांस ली आदित्यनाथ गुजरात के विसनगर उनके अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे थे और उनका अंतिम संस्कार किया था। योगी आदित्यनाथ ने ही मठ के अगले महंत शंकरनाथ का चयन किया था। गुजरात के विसनगर और वडगाम में यह मठ मंदिर और अन्नक्षेत्र का संचालन करता है।

हर बड़े कार्यक्रम में शिरकत करते थे

गुलाबनाथ ने 18 वर्ष की आयु में महंत बालकनाथ से वडगाम में दीक्षा ली थी। शंकरनाथ जिन्हें विसनगर का नया महंत बनाया गया था का कहना है कि बापू गुरु-शिष्य परंपरा के छठे महंत थे। गोरखपुर के योगी आदित्यनाथ से उनका संबंध काफी पुराना था। बापू ने भी अवैद्यनाथ को अपना गुरु माना था इसी वजह से योगी आदित्यनाथ उन्हें अपना गुरुभाई मानते हैं। उन्होंने बताया कि बापू को गोरखपुर के हर बड़े कार्यक्रम में आमंत्रित किया जाता था, जब पिछले वर्ष वह आखिरी बार वहां गए थे तो आदित्यनाथ ने उनका प्रधानमंत्री मोदी द्वारा सम्मान कराया था।

शंकरनाथ बताते हैं कि योगी आदित्यनाथ हर वर्ष दो से तीन बार विसनगर आते हैं, अगर योगी आदित्यनाथ गुजरात आते हैं तो उनकी शुरुआत विसनगर से होती है। वह हमेशा बापू के बारे में जानने के लिए फोन करते थे। यह सिर्फ नाथ संप्रदाय की वजह से नहीं है बल्कि उनका इस मठ से विशेष लगाव है। शंकरनाथ कहते हैं कि हम उन्हें 25 साल से जानते हैं, उनमें काफी ऊर्जा है, वह परंपरा के खिलाफ कुछ भी बर्दाश्त नहीं करेंगे।

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हर रोज सुनते थे भजन
गुलाबनाथ बापू का झलोड़ के जन्म मुस्लिम परिवार में हुआ था, उनका परिवार खेती और मजदूरी करता था, पहले गुलाबनाथ देहवसान गांव गए और उसके बाद वह वडगांव चले गए। जिस वक्त उनकी आयु 18 वर्ष की थी तो उन्होंने महंत के क्रियाकलाप को देखा और उससे वह काफी प्रभावित हुए, जिसके बाद उन्होंने दीक्षा ली। बालकनाथ के भांजे दिलावर खान पठान का कहना है कि मेरी दादी का देहांत उस वक्त हो गया था जब बच्चे काफी छोटे थे और उनका लालन-पालन दादा हफी खान ने ही किया जोकि सूफी संप्रदाय को मानते थे। हफी खान भजन गाया करते थे और सभी धर्मों का पालन करते थे, हर रोज सुबह भजन सुनने के बाद मुमकिन है कि उन्हें दीक्षा लेने की प्रेरणा मिली हो।

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