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Madhumita Shukla: कौन थी मधुमिता, जिसकी वजह से यूपी की सियासत में आया था भूचाल

Madhumita Shukla Hatyakand: साल 2003 में हुए कवयित्री मधुमिता शुक्ला हत्याकांड की वजह से उत्तर प्रदेश की राजनीति में भूचाल आ गया था। क्योंकि, इस हत्याकांड का आरोप अमरमणि त्रिपाठी पर लगा था। उस वक्त अमरमणि त्रिपाठी बसपा सरकार के कद्दावर मंत्री हुआ करते थे।

देहरादून की अदालत ने मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में अमरमणि त्रिपाठी और उनकी पत्नी मधुमणि को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। आजतक की खबर के मुताबिक, दोनों बीते 20 साल एक महीना और 19 दिन से जेल में है। उनके अच्छे आचरण की वजह से उनकी शेष सजा समाप्त कर दी गई है।

Madhumita Shukla Hatyakand

राज्यपाल की अनुमति से कारागार प्रसाशन एवं सुधार विभाग ने इसका आदेश जारी किया है और दोनों (अमरमणि त्रिपाठी और उनकी पत्नी मधुमणि) को 20 साल बाद रिहा किया जाएगा। आदेश में कहा गया है कि अगर दोनों को किसी अन्य मामले में जेल में निरुद्ध रखना आवश्यक न हो, मुक्त कर दिया जाए।

कौन थी मधुमिता शुक्ला?
मधुमिता शुक्ला, उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के एक छोटे से कस्बे की रहने वाली थी। मधुमिता ने महज 16 साल की उम्र से ही वीर रस की कविताओं का मंच पर पाठ करना शुरू कर दिया था। पीएम तक को खरी-खोटी सुनाने वाली इस युवा कवयित्री का यही अंदाज उसे सफलता की ओर ले जा रहा था।

इस दौरान मधुमिता लखनऊ आ गई और यहां निशातगंज स्थित पेपर मिल कॉलोनी में रहने लगी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मधुमिता की कविताओं को सुनने के लिए अमरमणि त्रिपाठी की मां के साथ उनकी दोनों बेटियां भी जाती थीं। धीरे-धीरे दोनों बेटियों से मधुमिता की दोस्ती हो गई और घर में आना-जाना हो गया।

इस दौरान अमरमणि त्रिपाठी भी मधुमिता के संपर्क में आए तो उनका नाम बड़ा हो गया। मंच से शोहरत मिली और सत्ता से नजदीकी ने उन्हें और पावरफुल बना दिया। ऐसा कहते है कि इसी दौरान मधुमिता और अमरमणि के बीच इश्क भी परवान चढ़ने लगा। दोनों के बीच शारीरिक संबंध स्थापित हो गए और मधुमिता प्रेग्नेंट हो गई।

मर्डर के वक्त 7 महीने की प्रेंग्नेंट थी मधुमिता
जैसे मधुमिता के प्रेंग्नेंट होने की जानकारी अमरमणि और उनकी पत्नी मधुमणि को लगी तो उन्हेंने गर्भपात का दबाव बनाया। लेकिन मधुमिता ने गर्भपात कराने से साफ इनकार कर दिया। खबर के मुताबिक, 7 महीने की प्रेंग्नेंट कवियत्री मधुमिता की 9 मई 2003 को लखनऊ स्थित उनके घर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

जिस वक्त यह हत्याकांड हुआ था, उस समय सूबे में बसपा की सरकार थी और मायावती मुख्यमंत्री थी। तो वहीं, अमरमणि त्रिपाठी बसपा सरकार के कद्दावर मंत्रियों में शुमार थे। मधुमिता शुक्ला हत्याकांड की सूचना मिलते ही चंद मिनटों में पुलिस मौके पर पहुंच गई थी।

खबर के मुताबिक, नौकर देशराज ने पुलिस अधिकारियों को मधुमिता और अमरमणि के प्रेम प्रसंग की जानकारी दी थी। जानकारी होते ही अधिकारियों ने बड़े अधिकारियों को सूचित किया। जिसके बाद इस हत्याकांड की जांच तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने सीबीसीआईडी (CBCID) को सौंपी थी।

इस दौरान पुलिस ने मधुमिता के शव का पोस्टमार्टम करने के बाद उसके शव को गृह जनपद लखीमपुर भेजा दिया था। तभी, एक पुलिस अधिकारी की नजर अचानक एक रिपोर्ट पर पड़ी, जिसने इस मामले की जांच की दिशा बदल दी। दरअसल, रिपोर्ट में मधुमिता के गर्भवती होने का जिक्र था। तत्काल शव को रास्ते से वापस मंगवाकर दोबारा परीक्षण कराया गया।

डीएनए जांच में सामने आया कि यह बच्चा अमरमणि त्रिपाठी का था। निष्पक्ष जांच के लिए विपक्ष के बढ़ते दबाव की वजह से बसपा सरकार को आखिरकार इस मामले की जांच सीबीआई से कराने की संस्तुति करनी पड़ी। सीबीआई जांच के दौरान भी गवाहों को धमकाने के आरोप लगे तो मुकदमा देहरादून की फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थानांतरित कर दिया गया था।

देहरादून की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 24 अक्टूबर 2007 को अमरमणि, उनकी पत्नी मधुमणि, भतीजा रोहित चतुर्वेदी और शूटर संतोष राय को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। जबकि एक अन्य शूटर प्रकाश पांडेय को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। हालांकि, बाद में नैनीताल हाईकोर्ट ने प्रकाश पांडेय को भी दोषी पाते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

जानिए अमरमणि त्रिपाठी का राजनीतिक इतिहास?
अमरमणि त्रिपाठी के राजनीतिक करियर की शुरुआत विधायक हरीशंकर तिवारी के साथ हुई थी। अमरमणि त्रिपाठी, महाराजगंज जिले के नौतनवां विधानसभा (पूर्व में लक्ष्मीपुर) से कई बार विधायक चुने गए है। कल्याण सिंह की सरकार में पहली बार मंत्री बने थे। लेकिन, एक अपहरण कांड में अमरमणि का नाम सामने आने के बाद उन्हें तत्कालीन सीएम कल्याण सिंह ने मंत्री पद से बर्खास्त कर दिया था।

अमनमणि को चुनावी मैदान में उतारा
बाद में मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में जेल जाने के बाद त्रिपाठी परिवार की चमक को बरकराक रखने के लिए अमरमणि ने अपने बेटे अमनमणि को चुनावी मैदान में उतारा था। सपा के टिकट पर 2012 में चुनाव लड़े अमनमणि चुनाव हार गए थे। लेकिन, 17वीं विधानसभा में मोदी लहर के बाद भी अमनमणि ने जेल में रहते हुए निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन किया था। अमनमणि की बहनें प्रचार में उतरीं, जिसके बाद वह चुनाव जीत गए औऱ पहली बार विधायक बने।

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