गाजीपुर में 'कट्टर दुश्मन', अफजाल अंसारी-बृजेश सिंह में हो सकती है टक्कर, जानें बृजेश के बाहुबली बनने की कहानी
लोकसभा चुनाव नजदीक हैं, ऐसे में पार्टियां धीरे-धीरे अपने उम्मीदवारों के नाम की घोषणा कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश की गाजीपुर सीट से समाजवादी पार्टी (सपा) ने माफिया मुख्तार अंसारी के भाई अफजाल अंसारी को टिकट दिया है। पार्टी ने लोकसभा चुनाव के लिए जारी की गई अपनी दूसरी लिस्ट में गाजीपुर सीट से अफजाल अंसारी के नाम का ऐलान किया।
दूसरी ओर, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) इस सीट पर मुख्तार अंसारी के कट्टर दुश्मन माफिया डॉन ब्रजेश सिंह को मैदान में उतारने की तैयारी कर रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार बीजेपी भी चाहती है कि ब्रजेश सिंह गाजीपुर से चुनाव लड़े।

ब्रजेश सिंह को गाजीपुर सीट से उतारने का ऐलान ओपी राजभर कर चुके हैं। ओपी राजभर गाजीपुर की ही जहूराबाद सीट से विधायक हैं। माना जा रहा है कि भाजपा भी ब्रजेश सिंह को मैदान में लाना तो चाहती है लेकिन अपना सिंबल नहीं देना चाहती।
ओपी राजभर के जरिए ब्रजेश सिंह को उतार कर भाजपा एक तीर से दो निशाने लगाने की कोशिश में है। सुभासपा के टिकट पर ब्रजेश सिंह को मैदान में लाने से राजभर की भी इच्छा पूरी हो जाएगी और अफजाल अंसारी को कड़ी टक्कर देने वाला प्रत्याशी भी मिल जाएगा।
कौन हैं बृजेश सिंह?
वाराणसी के धौरहरा गांव के निवासी बृजेश सिंह का असली नाम अरुण सिंह है। अरुण के एक आम इंसान से बाहुबली बनने की कहानी भी काफी फिल्मी है। एक घटना ने पढ़ाई कर अच्छी नौकरी पाने का सपना लिए अरुण की जिंदगी बदल दी।
अरुण के बृजेश बनने की कहानी एकदम फिल्मी है। आपने अक्सर 90s की फिल्मों में देखा होगा कि 12वीं पास कर अपने सपनों को पूरा करने के लिए कॉलेज पहुंचा नौजवान किसी घटना के कारन गैंगस्टर बन जाता है। कुछ ऐसा ही हुआ बृजेश उर्फ अरुण सिंह के साथ।
बनारस के धौरहरा गांव के संभ्रांत किसान और स्थानीय नेता रविंद्र नाथ सिंह के बेटे अरुण सिंह ने 12वीं की परीक्षा पास करने के बाद कॉलेज में एडमिशन लिया। अपने पिता के सपनों को पूरा करने के लिए उसने बीएससी में एडमिशन ले लिया।
रविंद्र नाथ सिंह हर पिता की तरह चाहते थे कि उनका बेटा भी अफसर बनकर परिवार और गांव का नाम रोशन करें। लेकिन अरुण के भविष्य के लिए कुछ और ही लिखा जा चुका था।
27 अगस्त 1984 को गांव के ही दबंगों ने रविंद्र नाथ सिंह की बेरहमी से हत्या कर दी। इस हादसे ने अरुण की जिंदगी बदल दी। पिता की हत्या बौखलाए अरुण ने अपनी जिंदगी का रुख ही बदल दिया। उसने पिता की हत्या का बदला लेने की कसम खाई और 1 साल के अंदर ही 27 मई 1985 को पिता की हत्या के मुख्य आरोपी हरिहर सिंह की हत्या कर दी। यहां से शुरू हुआ अरुण का बृजेश बनने का सफर।
बृजेश सिंह के ऊपर हत्या का मामला दर्ज हुआ और पुलिस उसकी तलाश में जुट गई। लेकिन वो पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा। उसका बदला अभी पूरा नहीं हुआ था। अप्रैल 1986 में उसने चंदौली के सिकरौरा गांव के पूर्व प्रधान रामचंद्र यादव समेत सात लोगों की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी। ये सभी बृजेश के पिता की हत्या के आरोपी थे।
बृजेश को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और उसे जेल भेज दिया गया। पिता की हत्या का बदला तो पूरा हो चुका था लेकिन अब उसकी जिंदगी बदल चुकी थी। जेल में बृजेश की मुलाकात अपने भाई के हत्यारों को मौत के घाट उतार कर सजा काट रहे त्रिभुवन सिंह से हुई। दोनों की कहानी मिलती जुलती होने की वजह से दोनों की दोस्ती हो गई।
बृजेश सिंह और मुख्तार अंसारी की दुश्मनी
जेल में रह कर बृजेश सिंह समझ गया कि दुनिया को झुकाने के लिए ताकत और दौलत की जरुरत है। यहां से बृजेश और त्रिभुवन सिंह ने स्क्रैप और बालू की ठेकेदारी करने वाले साहिब सिंह का साथ पकड़ा। दोनों साहिब सिंह के लिए काम करने लगे। ठेके के सिलसिले में बृजेश सिंह का टकराव पूर्वांचल के दूसरे माफिया मुख्तार अंसारी से शुरू हुआ। दरअसल मुख्तार अंसारी, साहब सिंह के विरोधी मकनू सिंह के लिए काम करता था।
सरकारी ठेकों में वर्चस्व को लेकर बृजेश सिंह और मुख्तार अंसारी के बीच 36 का आकड़ा हो गया। हालात इतने बिगड़ गए कि मुख्तार और बृजेश ने खुद को अलग कर अपना दबदबा कायम करना शुरू कर दिया। मुगलसराय की कोयला मंडी, आजमगढ़-बलिया-भदोही-बनारस से लेकर झारखंड तक शराब की तस्करी, स्क्रैप का कारोबार, रेलवे के ठेके, बालू के पट्टे को लेकर बृजेश और मुख्तार अंसारी के बीच गोलियां चलने लगी।
बृजेश सिंह पूरी तरह जुर्म की दुनिया में उतर चुका था। उसने कई गैरकानूनी धंधों के साथ-साथ कई हत्याएं की। इस बीच बृजेश का संपर्क मुंबई के अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम से हुआ। बृजेश सिंह और सुभाष ठाकुर ने दाऊद के बहनोई की हत्या का बदला लेने के लिए मुंबई की सबसे बड़ी शूटआउट को अंजाम दिया।
उत्तर प्रदेश में बृजेश का दबदबा बढ़ने लगा। दूसरी ओर बृजेश के विरोधी मुख्तार अंसारी ने राजनीति का रास्ता अपनाकर अपने वजूद को बड़ा कर लिया। जिसके बाद बृजेश सिंह के ऊपर कानूनी शिकंजा कसा जाने लगा।
जुलाई 2001 में मऊ से विधायक रहे मुख्तार अंसारी पर गाजीपुर के मोहम्मदाबाद के उसर चट्टी इलाके में बृजेश सिंह ने मुख्तार अंसारी पर हमला बोल दिया। इस हमले में मुख्तार अंसारी और उसका गनर घायल हो गए और गनर की मौत हो गई। नवंबर 2005 में बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय की हत्या ने मुख्तार अंसारी के वजूद को प्रदेश में सबसे बड़ा कर दिया और बृजेश सिंह को अंडर ग्राउंड होना पड़ा। उत्तर प्रदेश पुलिस ने बृजेश सिंह पर 5 लाख का इनाम रखा।
2008 में दिल्ली स्पेशल सेल ने बृजेश सिंह को उड़ीसा के भुवनेश्वर से गिरफ्तार कर लिया। उसकी गिरफ्तारी के बाद बृजेश के परिवार ने भी अपना राजनीतिक वजूद बढ़ाना शुरू किया। उनके बड़े भाई उदयनाथ सिंह दो बार एमएलसी रहे, पत्नी अन्नपूर्णा सिंह भी एमएलसी बनी। करीब 13 साल जेल में रहने के बाद लगभग 13 साल बाद बृजेश सिंह 2022 में जेल से बाहर आया।
अब गाजीपुर सीट पर बृजेश को उतारने की तैयारी चल रही है। अगर सुभासपा का यह प्लान कामयाब होता है तो वर्षों पुराने दो दुश्मन चुनाव के मैदान में आमने सामने होंगे। दोनों की टक्कर के क्या नतीजे होते हैं ये आने वाला वक्त ही बताएगा।












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