Uttar Pradesh Assemby Elections: क्या अयोध्या में विकास पर भारी पड़ेगी आस्था ?

लखनऊ, 26 फरवरी। अयोध्या में प्रवेश करते ही धार्मिक आस्था की अनुभूति होने लगती है। मुख्य सड़क के दोनों किनारों पर बने अधिकतर मकान पीले रंग के हैं। मकानों-दुकानों पर पीला रंग क्यों चढ़ा है ? तो एक सज्जन बताते हैं, भगवान राम को विष्णु का अवतार माना जाता है। भगवान विष्णु को पीला रंग प्रिय है।

uttar pradesh assemby election 2022 Will faith prevail over development in Ayodhya

वैसे भी पीला रंग धार्मिक अनुष्ठान का प्रतीक है। इसलिए अयोध्या ने पीली चादर ओढ़ ली है। राममंदिर निर्माण के लिए दो साल पहले भूमिपूजन हुआ था। उस समय ही यह रंग-रोगन हुआ था।

सपना सच हुआ, इसके लिए हजार मुद्दे कुर्बान

सपना सच हुआ, इसके लिए हजार मुद्दे कुर्बान

एक बड़े मकान की चहारदिवारी पर रामकथा के प्रसंग चित्र के रूप में अंकित हैं। शहर के मिजाज का अंदाजा मिलने लगता है। सड़क के किनारे एक मिठाई की दुकान पर रुकता हूं। वहां कुछ लोग मिलते हैं। उनसे पूछता हूं, 2022 के चुनाव में अयोध्या से कौन जीतेगा ? भाजपा के वेदप्रकाश गुप्त या सपा के तेजनारायण पांडेय ? या फिर कोई तीसरा ? सीधे सवाल पूछे जाने पर वे कुछ कहने में झिझकते हैं। थोड़ी देर बाद एक नौजवान कहता है, जीतेगी तो भाजपा ही। क्यों ? तो वह कहता है, मेरे पुरखे राममंदिर की आस में गुजर गये। उनकी हसरत अधूरी रह गयी। मैंने भी कभी ये नहीं सोचा था कि मेरे जीते जी मंदिर बन पाएगा। लेकिन आज मंदिर बन रहा है। जो सैकड़ों साल से नहीं हुआ। वह अब हो रहा है। अयोध्या के लोगों के लिए यह यादगार पल है। यहां के लोग एक नया इतिहास बनते हुए देख रहे हैं। इससे बढ़ कर मेरे लिए कोई और खुशी नहीं। इस सपने को सच करने के लिए हजार मुद्दे कुर्बान हैं।

महंगाई तो है लेकिन वोट श्रीराम के नाम पर पड़ेगा

महंगाई तो है लेकिन वोट श्रीराम के नाम पर पड़ेगा

थोड़ा आगे बढ़ने पर कुछ स्थानीय लोग मिलते हैं। उनसे चुनावी हवा का रुख जानना चाहता हूं ? क्या योगी सरकार ने अयोध्या में काम किया है ? रोजी- रोजगार का क्या हाल है ? एक सज्जन कहते हैं, मेरी गल्ले की दुकान है। महंगाई में जितना भी कमाओ, कम पड़ जाता है। महंगाई और रोजगार यहां मुद्दा है। लेकिन काम भी हुए हैं। आपने खुद अयोध्या की सड़कों को देखा होगा। अब तो यहां की गलियां भी चमचमा रहीं हैं। वोट तो श्रीराम के नाम पर ही पड़ेगा। मेरा तो जीवन ही श्रीराम के लिए समर्पित है। उनसे सवाल पूछता हूं, जब कमाने खाने को लेकर दिक्कत है तो फिर ऐसा क्यों सोचते हैं ? बदलाव के लिए वोट क्यों नहीं कर रहे ? वे जवाब देते हैं, महंगाई कब नहीं थी ? अभी महंगाई तो हैं लेकिन शांति भी है। एक रोटी कम खाते हैं लेकिन चैन की नींद सोते हैं। किसी गुंडे का डर तो नहीं है। पहले क्या होता था ? इस बार भाजपा के वेद प्रकाश गुप्ता और बड़ी मार्जिन से जीतेंगे। पिछली बार उन्हें एक लाख से अधिक वोट मिले थे।

सपा के पास फिर जीत का मौका

सपा के पास फिर जीत का मौका

कुछ दूर आगे जाने पर दूध के कारोबारी महेश कुमार मिलते हैं। उनसे भी वही सवाल। अयोध्या में कौन जीतेगा ? वे कहते हैं, राम मंदिर बन रहा है। अब यहां मंदिर-मस्जिद कोई मुद्दा नहीं। अब रोजगार और विकास की जरूरत है। इस पर ही बात होनी चाहिए। मेरी नजर में इस बार चुनाव थोड़ा हट कर होगा। समाजवादी पार्टी ने फिर तेजनारायण पांडेय (पवन पांडेय) को टिकट दिया है। सीट निकालने का उनके पास अच्छा मौका है। मुस्लिम समुदाय का भी उन्हें समर्थन मिल रहा है। 2012 में तेजनारायण पांडेय इस सीट पर जीत चुके हैं। कोरोना के समय हुई परेशानियों को लोग भूले नहीं हैं। इस बार भाजपा को इस सीट पर बहुत मुश्किल होने वाली है। ऐसा नहीं है कि भाजपा अयोध्या में हार नहीं सकती। तेजनारायण पांडेय ने 2012 में भाजपा के पांच बार से विधायक रहे लल्लू सिंह को हराया था।

वोट आस्था के नाम पर या विकास के नाम पर ?

वोट आस्था के नाम पर या विकास के नाम पर ?

अयोध्या ही वह जगह जिसने भाजपा की किस्मत बदली थी। श्रीराम के जन्मस्थान पर मंदिर बनाने के लिए संघर्ष तो आजादी के पहले से चल रहा था। आजादी के बाद भी आंदोलन चला। लेकिन आश्चर्यजनक परिवर्तन हुआ 1989 में। जब भाजपा ने 1988 में राममंदिर निर्माण के लिए शिलापूजन का आंदोलन चलाया तो उसका व्यापक असर हुआ। मंदिर के प्रति करोडों लोगों की आस्था ने राजनीति के स्वरूप को बदल दिया। भाजपा की शक्ति अचानक बहुत बढ़ गयी। 1984 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को सिर्फ दो सीटें मिलीं थीं। लेकिन 1989 के में उसने 85 सीटें जीत कर सबको चौंका दिया। अब अयोध्या में राम मंदिर कोई चुनावी मुद्दा नहीं है। लेकिन फिर भी यह आस्था का प्रतीक है। स्थानीय लोग मंदिर निर्माण को बहुत बड़ी उपलब्धि मानते हैं। अब देखना है कि यहां मतदान आस्था के नाम पर होता या विकास के नाम पर।

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