वेस्ट यूपी की सियासत में दिखेगा 'कृषि कानूनों' की वापसी का असर? जानें क्या कहते हैं राजनीतिक जानकार

वेस्ट यूपी की सियासत में दिखेगा 'कृषि कानूनों' की वापसी का असर? जानें क्या कहते हैं राजनीतिक जानकार

मेरठ, 21 नवंबर: 2022 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनावों से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन कृषि कानून वापस लेने का ऐलान कर दिया है। कृषि कानून वापस लेने का सीधा असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत पर पड़ेगा। दरअसल, तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसान आंदोलन यूपी में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की सत्ता तक पहुंचने की राह पर बड़ा रोड़ा माना जा रहा था। लेकिन कानून वापस लेने के ऐलान के बाद न सिर्फ रास्ते का पत्थर हट गया है, बल्कि विपक्ष की राजनीति को भी बड़ा झटका लगा है। आइए जानते है कि इस फैसले से कितनी बदेलगी पश्चिमी यूपी सियासत?

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अगर बात पिछले 2014 के लोकसभा, 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनावों की करें तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी को बड़ी जीत मिली थी। अब बीजेपी की नजर पश्चिमी यूपी की 136 विधानसभा सीटों पर हैं। 2017 में 109 सीटें पश्चिमी यूपी की बीजेपी के खाते में गई थी। लेकिन इस बार किसान आंदोलन के बाद से स्थितियां काफी कुछ बदल गईं। 2022 में होने वाले चुनाव में किसान आंदोलन पश्चिम यूपी में बड़ा मुद्दा बनता नजर आ रहा है। इसे भुनाते हुए ही विपक्षी दलों आरएलडी, सपा और कांग्रेस ने पिछले दिनों खूब महापंचायतें आयोजित कीं। तो वहीं, बीजेपी हाईकमान को भी पश्चिमी की हर सीट पर नाराजगी का फीडबैक मिल रहा था।

राजनीतिक विश्लेषक, किसान नेता और वरिष्ठ पत्रकारों की मानें तो कृषि कानून वापस लेने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में बदलाव आएगा।

वेस्ट यूपी के वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप त्यागी ने बताया कि,

कृषि कानूनों की वापसी के असर से ज्यादा वेस्ट यूपी में जाट राजनीति का अलंबरदार बनने की होड़ शुरू हो गई है। इसके लिए रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी, भाकियू नेता राकेश टिकैत और केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान के बीच रस्साकशी चलेगी। कृषि कानूनों के आने के बाद अभी तक वेस्ट यूपी का सर्वोच्च जाट नेता की जंग जयंत चौधरी, राकेश टिकैत और संजीव बालियान के बीच थी। अब कानून वापसी के बाद जाट नेता के तमगे के लिए जयंत, टिकैत और संजीव बालियान के बीच होड़ शुरू हो गई है। इसमें चौथा चेहरा बनने की कोशिश यूपी के पंचायत राज मंत्री भूपेंद्र सिंह कर रहे हैं। यूपी के विधानसभा चुनाव के मतदान तक कृषि कानूनों की वापसी से बनी वर्तमान स्थिति बदल जाएगी। मतदान के समय तक लगता है कि किसान आंदोलन करने वालों के चेहरे भी उतर चुके होंगे।

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    राजनीतिक विश्लेषक पुष्पेंद्र कुमार ने बताया कि,

    देखिए वो प्रभाव तो है, क्योंकि ये जाट बाहुल्य क्षेत्र है इसलिए प्रभाव तो है। कानून के पक्ष में यदि एक झुकाव है तो उसके विरोध में भी है। शत-प्रतिशत किसान बीजेपी के विरोध में नहीं हो सकते हैं। केंद्र सरकार की काफी नीतियां किसानों के हित में भी रही हैं। इसलिए ये नहीं कहा जा सकता कि सारे किसान बीजेपी के विरोध में रहेंगे। मोदी सरकार को लेकर कुछ लोगों की राय है कि सुधार होने चाहिए, लेकिन कुछ ऐसा नहीं मानते। आप ये कह सकते हैं कि जयंत चौधरी की सीटें बढ़ सकती हैं। बीजेपी को नुकसान तो होगा लेकिन बहुत अधिक नहीं। पिछली बार जैसी लहर नहीं होगी।

    चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ स्नेह वीर पुंडीर ने बताया कि,

    पश्चिमी यूपी की राजनीति को किसान बहुत ज्यादा प्रभावित करते हैं। किसान के नाम पर अगर कोई दल राजनीति करता है वो रालोद है। रालोद आज किसी स्थिति में है वो अलग बात है, लेकिन वो किसानों की राजनीति करता है। किसान आंदोलन पर डेमोक्रेसी की बहुत सारी चीजें डिपेंड कर रही थी। तमाम लोग यह कह रहे थे कि अगर ये आंदोलन खत्म हुआ तो देश में कोई दूसरा बड़ा आंदोलन शुरू नहीं होगा। क्योंकि देश में एक बड़ा हिस्सा किसानों का ही है। अगर उसका भी आंदोलन फेल हो जाए तो किसी में आंदोलन में खड़े होने की संभावनाएं कम हो जाएंगी।

    अगर मैं मोदी सरकार की बात करूं तो यह सरकार अभी तक दो चीजों पर पीछे गई है। पहला भूमि अधिग्रहण कानून। ये भूमि अधिग्रहण कानून लेकर आए थे, जिसे पर इन्हें पीछे जाना पड़ा था। अब ये तीन कृषि कानून लेकर आए, जिस पर इन्हें पीछे जाना पड़ा। मोदी जी की जो एक छवि थी कि वो अपनी बात अडिग रहते है, तो लोगों यह समझ आया कि डेमोक्रेसी में आम जनता की बात सबसे महत्वपूर्ण है। दूसरा पश्चिमी यूपी में किसान राजनीति पहले से हावी रही है तो इस बात की पूरी संभावनाए है कि किसानों के जो दबाव समूह है उनका दबाव और ज्यादा बढ़ेगा। राजनीति में किसानों के मुद्दे और ज्यादा शामिल होंगे। पश्चिमी यूपी में विधानसभा चुनाव में पूरी तरह फर्क पड़ेगा। राजनीतिक पार्टियां मेनिफेस्टो जो तैयार करती है उसमें किसानों की जो हिस्सेदारी होनी थी वो बढ़ेंगी। इस चुनाव में किसान आंदोलन का पूरा-पूरा प्रभाव पड़ना तय है।

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