यूपी चुनाव में 1991-2012 तक कैसे हुआ भाजपा की सीटों का पतन, क्यों नहीं चल पाया राम मंदिर और हिंदुत्व कार्ड
लखनऊ, 17 नवंबर। उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति के इतिहास में 1991 का साल बेहद अहम है। यही वह साल था जहां से मंडल-कमंडल की राजनीति ने जोर पकड़ा, जब धर्म और जाति के आधार पर उत्तर प्रदेश के वोटरों का बंटना शुरू हुआ। कांग्रेस का पतन शुरू हुआ। राम मंदिर आंदोलन यानी कमंडल की राजनीति से भारतीय जनता पार्टी ने यूपी में हिंदुओं का ध्रुवीकरण शुरू किया। वहीं दलितों और पिछड़ों को सामाजिक न्याय दिलाने की मंडल की राजनीति से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी फलने-फूलने लगी। भारतीय जनता पार्टी ने 1991 के विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन करते हुए 221 सीटों पर जीत हासिल की थी। लेकिन इसके बाद के चुनावों में भाजपा की सीटें कम होती चली गई। आइए उत्तर प्रदेश के चुनावी इतिहास पर नजर डालते हुए यह जानते हैं कि भाजपा 1991 के चुनाव को छोड़कर 2012 के चुनाव तक अच्छा प्रदर्शन क्यों नहीं कर पाई?

कांग्रेस सरकार के फैसले से चमकी भाजपा की किस्मत
1984 में विश्व हिंदू परिषद ने साधु-संतों के साथ मिलकर बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने के लिए आंदोलन की शुरुआत की। सितंबर 1985 में कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने विश्व हिंदू परिषद के निवेदन पर बाबरी मस्जिद का ताला खोल दिया। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी और विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए बहुत बड़ा अभियान छेड़ा। 1989 में हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में लालकृष्ण आडवाणी की अध्यक्षता में भाजपा ने राम मंदिर को पार्टी का सबसे प्रमुख राजनीतिक एजेंडा घोषित करने का प्रस्ताव पास किया था। 1989 में ही केंद्र की वीपी सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिश लागू कर पिछड़ों और दलितों को आरक्षण देने का कार्ड खेला था। मंडल के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए कमंडल की राजनीति तेज हुई थी। 9 नवंबर 1989 को विश्व हिंदू परिषद ने कांग्रेस के नारायण दत्त तिवारी सरकार की अनुमति से विवादित स्थल पर शिलान्यास कार्यक्रम का आयोजन किया था। 25 सितंबर 1990 से सोमनाथ से अयोध्या तक लालकृष्ण आडवाणी रथयात्रा पर निकले थे। 2 नवंबर 1990 को अयोध्या आए कारसेवकों की भीड़ पर गोली चलाने का आदेश तत्कालीन कांग्रेस समर्थित जनता दल (एस) सरकार के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने दिया था। पुलिस फायरिंग में कई कारसेवकों की जान चली गई थी। 1991 में उत्तर प्रदेश के चुनाव में भाजपा ने 425 सीटों में से 221 सीट पर बाजी मारी जिसके पीछे 'राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे' की लहर का बड़ा योगदान रहा। मंडल की राजनीति को साधने के लिए 1991 में भाजपा ने पिछड़ी जाति के लोध नेता कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बनाया था।

बाबरी विध्वंस और 1992 में मुलायम की समाजवादी पार्टी का उदय
मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने 1991 के अक्टूबर में बाबरी मस्जिद कॉम्प्लेक्स में जमीन के एक हिस्से का अधिग्रहण किया और वहां जुलाई 1992 में वीएचपी और आरएसएस ने एक चबूतरा बनाया जिसको कल्याण सिंह सरकार ने कहा कि वह भजन करने के लिए बनाया गया था। दिसंबर 1992 में हजारों कारसेवक अयोध्या में जमा थे और कल्याण सिंह सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दिया था कि बाबरी मस्जिद ढांचा सुरक्षित रहेगा लेकिन 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद को गिरा दिया था। इसके बाद दंगे भड़क गए थे। कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाया गया था। मुलायम सिंह यादव ने अक्टूबर 1992 में समाजवादी पार्टी बनाई थी। मुलायम ने भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ जमकर प्रचार-प्रसार करना शुरू किया। पिछड़ों, दलितों और मुसलमानों के वोट को मुलायम ने अपनी तरफ खींचा। साथ ही मुलायम ने कांशीराम के साथ गठजोड़ किया। 1993 के विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन का असर दिखा। राम जन्मभूमि का मामला कोर्ट में जाने की वजह से ठंडा पड़ गया था। भाजपा 1993 में 177 सीट ही हासिल कर पाई। सपा को 109 और बसपा को 67 सीटों पर जीत हासिल हुई। कांग्रेस 28 सीटों पर सिमट गई। 1993 के चुनाव ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को मंडल पर शिफ्ट कर दिया। 1993 के बाद जातिवाद की राजनीति उत्तर प्रदेश में हावी हुई और हर चुनाव में इसका असर दिखा।
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1996 के चुनाव में भाजपा को मिली 174 सीटें
1993 के चुनाव के बाद मुलायम ने बसपा और अन्य पार्टियों के सहयोग से सरकार बनाई थी। लेकिन मायावती और मुलायम के बीच गठबंधन लंबा नहीं खिंच पाया। मायावती के समर्थन वापस लेने के बाद सरकार गिर गई और फिर 1995 के जून में गेस्ट हाउस कांड हुआ। मायावती और बसपा विधायकों पर सपा विधायकों ने समर्थकों के साथ हमला बोल दिया था। मायावती को किसी तरह से वहां से बचाकर निकाला गया था। इसके बाद मुलायम और मायावती के रिश्ते खराब हो गए थे। भाजपा के समर्थन से मायावती यूपी की पहली दलित मुख्यमंत्री बनी थीं। 137 दिन बाद भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया, मायावती सरकार गिर गई और यूपी में राष्ट्रपति शासन लग गया था। 1996 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को 174, मुलायम की सपा को 110, मायावती की बसपा को 67 सीटें मिलीं। रिजल्ट कमोबेश 1993 की ही तरह रहे थे। बसपा ने यह चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा था। कांग्रेस ने 33 सीटें हासिल की थी। छह-छह महीने मुख्यमंत्री बदलने के समझौते पर भाजपा और बसपा ने मिलकर सरकार बनाई। पहले मायावती मुख्यमंत्री रहीं और उसके बाद जब कल्याण सिंह की बारी आई तो भाजपा पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाकर बसपा ने समर्थन वापस खींच लिया। कांग्रेस से नरेश अग्रवाल के नेतृत्व में टूटकर आए विधायकों का साथ लेकर भाजपा ने कल्याण सिंह की सरकार बना ली। 1998 के लोकसभा चुनाव में भाजपा यूपी में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई तो अटल बिहारी वाजपेयी ने कल्याण सिंह को हटाकर पहले राम प्रकाश गुप्ता और उसके बाद राजनाथ सिंह को मुख्यमंत्री बनाया।

2002 के चुनाव में भाजपा की रह गई 88 सीटें
1999 में कल्याण सिंह ने भाजपा छोड़कर राष्ट्रीय क्रांति पार्टी बनाई थी। 2002 के चुनाव में भाजपा को कल्याण सिंह ने बहुत नुकसान पहुंचाया। इस चुनाव में भाजपा को 88, समाजवादी पार्टी को 143, बसपा को 98 और कांग्रेस को 25 सीटें मिली थी। कल्याण सिंह की राष्ट्रीय क्रांति पार्टी से चार विधायक बने थे। बहुमत किसी के भी पास नहीं था। यूपी में राष्ट्रपति शासन लगा और 56 दिन बाद भाजपा के समर्थन से मायावती मुख्यमंत्री बनीं। 29 अगस्त 2003 तक मायावती सरकार चली। भाजपा के समर्थन खींचने के बाद बसपा के 37 विधायकों का दल टूटकर मुलायम के पक्ष में आ गया। कांग्रेस, निर्दलीय और रालोद के विधायकों के समर्थन से मुलायम फिर मुख्यमंत्री बन गए। विधायकों के दल-बदल का मामला कोर्ट में चला। जब तक सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया तब तक 2007 का चुनाव आ गया।

2007 में भाजपा 51 सीटों पर सिमट गई
1991 से 2007 के बीच उत्तर प्रदेश में स्थायी सरकार कभी नहीं बनती दिखी, चुनाव में किसी को स्पष्ट बहुमत जनता ने नहीं दिया था। 2007 में बहुजन समाज पार्टी को जनता ने बहुमत दे दिया। मुलायम सरकार अपने खराब कानून-व्यवस्था और विकास के मामले में काम नहीं करने की वजह से बदनाम हुई और जनाधार बसपा के पाले में खिसक गया। मायावती के पक्ष में दलित ही नहीं पिछड़ों, मुस्लिमों और सवर्णों ने भी वोट डाला। मायावती ने भी बहुजन हिताय से आगे बढ़कर सर्वजन हिताय का नारा दिया था। इस चुनाव में बसपा को 206, सपा को 97, भाजपा को 51 और कांग्रेस को 22 सीटें मिली थी। पांच साल चली मायावती सरकार पर घोटालों और मूर्तियों को बनाने की वजह से सवाल उठे और 2012 के चुनाव में जनता का झुकाव समाजवादी पार्टी की तरफ दिखा। भाजपा के लिए राम मंदिर और हिंदुत्व कार्ड काम नहीं कर रहा था। 2012 के चुनाव में भाजपा और नीचे चली गई।

2012 में भाजपा ने जीती 47 सीट
2012 का विधानसभा चुनाव अखिलेश यादव के नाम रहा जिनको मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी के सीएम चेहरे के तौर पर आगे किया। समाजवादी पार्टी ने 224 सीटों पर जीत हासिल की। इस चुनाव में भाजपा की 47 सीट रह गई। बसपा के खाते में 80 सीटें और कांग्रेस के खाते में 28 सीटें गईं। अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और सपा सरकार पांच साल चली। भाजपा 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने में सफल रही। 2017 के चुनाव में मोदी लहर और भाजपा के चुनाव प्रबंधन का असर दिखा। उधर सपा के अंदर अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के बीच पार्टी पर हक को लेकर घमासान हुआ जिसमें मुलायम सिंह यादव को हटाकर अखिलेश यादव पार्टी के मुखिया बन गए। मुलायम को अलग करने के बाद अखिलेश यादव की छवि को भी धक्का लगा। 2017 के चुनाव में भाजपा ने रणनीति बनाकर सपा और बसपा को बहुत पीछे धकेल दिया।

2017 में भाजपा को मिला प्रचंड बहुमत
2012 में भाजपा को 47 सीटें मिली थीं, वहीं 2017 के चुनाव में सपा 47 सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस के साथ गठबंधन अखिलेश के काम नहीं आया। कांग्रेस को महज सात सीटें मिली। बसपा को 19 सीटों से संतोष करना पड़ा। भाजपा ने 312 सीटों पर जीत हासिल कर इतिहास रच दिया। 2017 के चुनाव में भाजपा ने सपा और बसपा शासनकाल में असंतुष्ट रही जातियों को साधा। सुभासपा और अपना दल जैसे छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन किया। गैर-जाटव, गैर-यादव और सवर्णों को भाजपा ने साधा और मोदी लहर के सहयोग से प्रचंड बहुमत हासिल कर लिया। एक बार फिर हिंदुत्व और राम मंदिर भाजपा के एजेंडे में आ चुका है। अयोध्या में राम मंदिर बन रहा है और 2022 के चुनाव में भाजपा एक बार फिर इसको भुनाने की तैयारी में है।
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