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लगातार चार चुनाव हार चुके इमरान मसूद के जाने से कांग्रेस को कितना नुकसान, सपा को आने से क्या फायदा?

नई दिल्ली, 11 जनवरी: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राज्य के सहारनपुर जिले में बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला है। जिले के काफी चर्चित और प्रभावशाली नेता माने जाने वाले पूर्व विधायक इमरान मसूद ने कांग्रेस छोड़ दी है। इमरान करीब दस साल से कांग्रेस में थे और फिलहाल पार्टी के राष्ट्रीय सचिव थे। इमरान मसूद ने समाजवादी पार्टी में जाने का ऐलान किया है। अब ये देखना दिलचस्प है कि इमरान के इस राजनीतिक कदम का कितना असर सहारनपुर और पश्चिम यूपी की राजनीति पर होगा।

इमरान हार चुके हैं चार चुनाव

इमरान हार चुके हैं चार चुनाव

इमरान मसूद दिल्ली की मीडिया के लिए जाना पहचाना चेहरा हैं लेकिन उनका सियासी सफर देखें तो उनका रिज्यूमे कुछ खास नहीं लगता है। इमरान मसूद सिर्फ एक बार विधायकी का चुनाव जीत सके हैं। 2007 में वो बेहट से निर्दलीय विधायक बने थे। इसके बाद वो लगातार चार चुनाव हार चुके हैं। 2012 और 2017 का विधानसभा चुनाव इमरान मसूद नकुड़ विधानसभा सीट से हारे। वहीं 2014 और 2019 में सहारनपुर लोकसभा हारे हैं।

सहारनपुर में इमरान की लोकप्रियता हार जीत से परे

सहारनपुर में इमरान की लोकप्रियता हार जीत से परे

इमरान मसूद सहारनपुर के अकेले ऐसे नेता हैं, जो चार चुनाव हारकर जीते हुए नेताओं से ज्यादा लोकप्रिय हैं। वो 2007 में विधायक बनने के बाद से ही चर्चा में रहे हैं। इसकी वजह ये भी है कि उनके परिवार का जिले की राजनीति में कई दशक से दबदबा रहा है। वो दिल्ली की मीडिया में वो सहारनपुर के मौजूदा सांसद से ज्यादा जगह पाते रहे हैं। फिलहाल भी सहारनपुर के बाहर लोग शायद मौजूदा एमपी फजलुर्रहमान के मुकाबले इमरान को ही ज्यादा पहचानेंगे। इसकी वजह है उनका लगातार लोगों के बीच में रहना और जनता से मिलते-जुलते रहना। सहारनपुर जिले में 7 विधानसभा सीटें हैं और सभी सीटों पर उनका प्रभाव है, ये उन्होंने साबित किया है।

कांग्रेस को क्या नुकसान

कांग्रेस को क्या नुकसान

इमरान मसूद के कांग्रेस छोड़ने पर सहारनपुर कांग्रेस के नेताओं ने रस्मी बयान दिया है कि इससे पार्टी पर कोई असर नहीं होगा। सच्चाई ये है कि जिले में पार्टी पर इसका असर होगा। ये कहना गलत नहीं होगा कि बीते एक दशक और चार चुनावों में सहारनपुर में कांग्रेस इमरान मसूद के इर्ग-गिर्द घूमती रही है।

कांग्रेस ने 2017 के विधानसभा चुनाव में सहारनपुर की दो सीटों पर जीत मिली थी। बेहट विधानसभा से कांग्रेस के नरेश सैनी और सहारनपुर देहात सीट पर कांग्रेस के मसूद अख्तर ने जीते थे। 2017 में सहारनपुर में कांग्रेस का प्रदर्शन अमेठी और रायबरेली से बेहतर रहा था। बात 2012 के विधानसभा की करें तो इसमें मगंगोह सीट पर कांग्रेस के प्रदीप चौधरी ने जीत दर्ज की थी। वहीं सहारनपुर की बाकी छह विधानसभा सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे थे। बाद में उपचुनाव में देवबंद सीट भी कांग्रेस ने जीत ली थी। जिले में कांग्रेस को मिले इस वोट के पीछे इमरान मसूद और उनके परिवार का प्रभाव बहुत साफ रहा है। जाहिर है कि इमरान मसूद के जाने के बाद अब कांग्रेस अगर जिले की दो-तीन सीटों पर अच्छी फाइट भी कर जाए तो बहुत होगा।

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     सपा को क्यों हो सकता है फायदा

    सपा को क्यों हो सकता है फायदा

    पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सहारनपुर ऐसा जिला है, जहां सपा की स्थिति बहुत अच्छी नहीं रही है। यहां 2007 और 2012 में बसपा तो 2017 में भाजपा को बढ़त मिली। 2012 में जब सपा की पूरे प्रदेश में लहर थी तो समाजवादी पार्टी को सिर्फ देवबंद सीट पर जीत मिली थी। 2012 विधानसभा चुनाव में राजेंद्र राणा सहारनपुर की देवबंद विधानसभा सीट से सपा से विधायक बने थे। राजेंद्र राणा का निधन होने के बाद उपचुनाव हुआ और सपा यहां कांग्रेस के माविया अली से चुनाव हार गई। इसके बाद 2017 में भी सपा को सहारनपुर में एक सीट ही मिल सकी। 2017 में शहर सीट पर सपा के संजय गर्ग चुनाव जीते थे। 2012 और 2017 के ही चुनाव को देख लें तो ये साफ है कि सपा के कमजोर प्रदर्शन की वजह कांग्रेस की मजबूती भी रही जो कि जाहिर है कि इमरान की वजह से थी। ऐसे में इमरान मसूद के साथ मिलकर निश्चिम ही जिले में सपा का ग्राफ ऊपर जाएगा। सपा इस चुनाव में सहारनपुर में 2012 और 2017 के मुकाबले बेहतर नतीजों की उम्मीद करेगी।

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