UP: 2024 में बीजेपी- मायावती की टेंशन बढ़ाएगी अखिलेश-जयंत-चंद्रशेखर की तिकड़ी?
उत्तर प्रदेश के पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने खतौली के उपचुनाव में जयंत और चंद्रशेखर को साथ लेकर एक प्रयोग किया था जिसमें वह सफल रहे थे। अब यही प्रयोग वो 2024 तक ले जाना चाहते हैं।

Bahujan Samaj Party Chief Mayawati: उत्तर प्रदेश में निकाय चुनाव का बिगुल बज चुका है। एक तरफ जहां सभी राजनीतिक दल यूपी की 17 नगर निगम की सीटों पर फोकस कर हरे हैं वहीं समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव लोकसभा चुनाव 2024 के लिहाज से शतरंज की बिसात बिछाने में जुटे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो अखिलेश यादव की नजर 2024 में पश्चिम में जाट-दलित कंबिनेशन बनाने पर है। इस कंबिनेशन को बनाने में अगर वो सफल हुए तो वाकई में बसपा चीफ मायावती और बीजेपी के लिए एक तरह से खतरे की घंटी ही है।

विधानसभा चुनाव में सपा के पक्ष में हुआ मुस्लिम ध्रुवीकरण
एक साल पहले यूपी में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी भले ही हार गई हो लेकिन उनकी सीटें बढ़कर 111 तक पहुंच गईं थीं। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह यह माना गया था कि मुस्लिम वोटरों ने सपा का साथ दिया है जिसकी वजह से उसकी सीटें बढ़ी हैं। इसलिए अखिलेश को इस बात का अहसास है कि मुस्लिम वोट के साथ यदि जाट- दलित कंबिनेशन बनाने में कामयाब हुए तो वह पश्चिम में बीजेपी और बसपा की मुखिया मायावती को मुश्किल में डाल सकते हैं।

बीएसपी का जाटव वोट बैंक पर दो दशक से एकाधिकार
उत्तर प्रदेश में जब बीएसपी ने 2007 में अपने दम पर सत्ता हासिल की थी उसमें मुस्लिम और जाटव का अहम योगदान था। हालांकि इस चुनाव में बसपा की सोशल इंजीनियरिंग भी सफल हुई थी। ऐसा माना जाता है कि पिछले दो दशक से मायावती का जाटव वोट बैंक पर एकाधिकार है। मायावती के इस एकाधिकार को चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण चुनौती दे सकते हैं। ऐसा सपा के चीफ अखिलेश यादव को लगता है। अखिलेश को शायद इस बात का भरोसा है कि चंद्रशेखर को साथ लेकर वह पश्चिम में जाटव वोट बैंक में बंटवारा कराने में कामयाब रहेंगे। यही वजह है कि चंद्रशेखर अब अखिलेश की रणनीति में शामिल हो गए हैं।

खतौली का उपचुनाव अखिलेश के लिए एक्सपेरिमेंट
यूपी के वरिष्ठ पत्रकार राजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि,
अखिलेश पश्चिम में जाट-दलित कंबिनेशन बनाकर लोकसभा चुनाव में जाना चाहते हैं। खतौली विधानसभा में हुए उपचुनाव को उदाहरण के तौर पर आप ले सकते हैं जहां अखिलेश ने इस कंबिनेशन का एक्सीपरिमेंट किया था। खतौली के चुनाव में बीजेपी को तब हार मिली जब बीजेपी ने यूपी में जाट को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाया था लेकिन बावजूद इसके बीजेपी यह चुनाव हार गई और उसको अपनी सीट गंवानी पड़ी। इसलिए अखिलेश की रणनीति इसी कंबिनेशन के साथ आगे बढ़ने की है क्योंकि उनको यह विश्वास है कि इस समीकरण में मुस्लिम भी फिट बैठेगा।

खतौली में मायावती चुनाव नहीं लड़ रही थीं
हालांकि खतौली में अखिलेश ने रालोद के उम्मीदवार मदन भैया को अपना समर्थन दिया था और उनके प्रचार के लिए भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद ने भी जयंत के साथ मंच शेयर किया था और कई जगहों पदयात्राएं भी की थीं। चंद्रशेखर की इन यात्राओं को असर पड़ा था और अखिलेश-जयंत-चंद्रशेखर की तिकड़ी ने यहां बीजेपी के हाथ से उसकी ही सीट छीन ली थी। हालांकि राजनीतिक विश्लेषक इस बात को भी स्वीकार कर रहे हैं कि खतौली उपचुनाव में बसपा ने चुनाव नहीं लड़ा था इसलिए जाटव वोटों का बंटवारा हो गया। जब बसपा लड़ेगी तो समीकरण कुछ और होंगे।

बीएसपी और बीजेपी के लिए चुनौती पेश करेगी ये तिकड़ी
उत्तर प्रदेश में एक साल पहले हुए विधानसभा चुनाव में हालांकि बसपा को दलितों का पूरा वोट मिला था ऐसा दावा पार्टी की तरफ से किया जाता है। लेकिन इधर बीजेपी भी यह दावे करती है कि जाटव वोट बैंक में वह सेंधमारी करने में कामयाब साबित हो रह है। शायद इसीलिए आगरा क्षेत्र की बेबीरानी मौर्य को कैबिनेट में जगह दी गई। इसके अलावा असीम अरुण को भी दलित कोटे से मंत्रिमंडल में बीजेपी ने शामिल किया था। लेकिन इन सबके बीच खतौली के उपचुनाव में जिस तरह से अखिलेश-जयंत-चंद्रशेखर की तिकड़ी ने बीजेपी को मात दी थी उससे आने वाले दिनों में बसपा और बीजेपी की पश्चिम की राह इतनी आसान नहीं रहेगी।












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