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UP चुनाव में आरक्षित सीटों पर इस बार BSP का नहीं खुला खाता, क्या माया बदलेंगी रणनीति

लखनऊ, 12 मार्च: उत्तर प्रदेश में यूं तो विधानसभा के चुनाव सम्पन्न हो गए हैं लेकिन नतीजों को लेकर अभी भी चर्चा हो रही है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की मुखिया मायावती इस बार बहुत कम प्रचार के लिए निकलीं। यूपी के 18 मंडलों में वह इतनी ही सभाएं करने में सफल हुईं थीं। लेकिन चुनाव के बाद जो नतीजे आए हैं उसने मायावती की नींद उड़ाकर रख दी है। यूपी की 86 रिजर्व सीटों (आरक्षित) में से बहनजी को एक भी सीट नहीं मिली है। ये बहुत चौंकाने वाला है क्योंकि कभी इन्हीं रिजर्व सीटों ने मायावती की सरकार बनाई थी लेकिन अब वहीं उनकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हो रही है।

मायावती

आरक्षित सीटों पर बसपा का हुआ सफाया

यूपी में आरक्षित सीटों को लेकर मायावती पहले भी गणित बनाने में जुटी हुईं थीं। उन्होंने इसके लिए अपने सबसे खास और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा को लगाया था। दरअसल, यूपी की रिजर्व विधानसभा सीटों में बसपा के लिए मुश्किल हो जाती है, जहां दलितों का वोट अलग-अलग उम्मीदवारों में बंट जाता है। इसलिए सवर्णों का वोट निर्णायक साबित होता है। यही कारण है कि इस चुनाव में भी मायावती गैर-दलित और सवर्ण वोटों पर फोकस किया था जिसमें उनका निशाना मुख्य रूप से ब्राह्मण वोट था, जिससे उन्हें 2007 के विधानसभा चुनाव में जीत का स्वाद मिला। इसकी जिम्मेदारी अपने खास सिपहसलार सतीश मिश्रा को सौंपी थी। लेकिन सतीश मिश्रा भी आरक्षित सीटों पर बसपा का खता खुलवाने में नाकाम रहे।

आरक्षित सीटों पर बसपा का प्रदर्शन फीका रहा

दरअसल पिछले तीन विधानसभा चुनावों के आंकड़ों पर गौर करें तो आरक्षित सीटों पर बसपा के प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है। 2017 के विधानसभा चुनाव में इन 86 सीटों में से बसपा ने सीतापुर के सिधौली और आजमगढ़ के लालगंज में ही जीत हासिल की थी। इनमें से 70 सीटें अकेले बीजेपी ने जीती थीं। इससे पहले 2012 के चुनावों में, केवल 85 सीटें आरक्षित थीं (केवल अनुसूचित जाति के लिए) और बसपा केवल 15 सीटें ही जीत सकी। ये सीटें हैं रामपुर मनिहारन, पुरकाजी, नहटौर, हाथरस, आगरा कैंट, आगरा ग्रामीण, टूंडला, हरगांव, मोहन, महरौनी, नारायणी, मंझनपुर, कोरांव, बांसगांव और अजगरा सीट जीती थी। मायावती अपने 2007 के प्रदर्शन को दोहराना चाहती हैं क्योंकि बसपा ने इनमें से 62 सीटें गैर-दलितों के समर्थन से जीती थीं।

बसपा के जाटव वोटबैंक में बीजेपी ने लगाई सेंध

बीजेपी और उसके सहयोगी दलों ने मिलकर इस चुनाव में 86 में से 65 सीटों पर कब्जा जमाया है। यूं कहें तो बीजेपी ने सुरक्षित सीटों और दलित वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए बहुत पहले ही तैयारी शुरू कर दी थी। उत्तराखंड की उपराज्यपाल रहीं बैठी हुईं थीं वहीं दूसरी ओर बेबीरानी को इस्तीफा दिलाकर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया और फिर उन्हें टिकट दिया गया। इसका असर ये हुआ कि बीजेपी ने आगरा की सारी सीटें जीत लीं। एकतरफ जहां मायावती घर में बबेबीरानी को दलित बाहुल्य इलाकों में घुमाया गया था जिसका फायदा बीजेपी को वोट के रूप में मिला है। यहीं मायावती से चूक हुई और बीजेपी उनके कोर वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब हो गई।

क्या होगी आगे की रणनीति

मायावती को इस चुनाव में भी जोरदार झटका लगा है। वह पिछले कई चुनावों से हारती हा रही हैं। यही सिलसिला कायम है। राजनीतिक पंडितों की माने तो आने वाले समय में मायावती ने यदि अपनी रणनीति में बदलाव नहीं किया और सक्रियता नहीं दिखायी तो वह दिन दूर नहीं जब मायावती का कोर वोट बैंक बीजेपी के पाले में चला जाएगा। मायावती हालांकि अभी भी ये दावा कर रही हैं कि दलित वोट बैंक उनके साथ रहा लेकिन वोट प्रतिशत इस बात की गवाही देते हैं कि कहानी कुछ और ही है। पिछली बार मायावती का वोट प्रतिशत लगभग 23 फीसदी था जो इस बार घटकर 12 फीसदी पर पहुंच गया है जिससे मायावती भी खुश नहीं होंगी।

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