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तो ये है असली वजह जिसके चलते सपा से गठबंधन को तैयार हैं मायावती

भाजपा के खिलाफ एकजुट होने के लिए सपा और बसपा के सामने हैं बड़ी मुश्किल, आसान नहीं होगा दोनों दलों के लिए।

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में जिस तरह से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का सफाया होने के बाद सपा और बसपा करीब आती दिख रही हैं, दोनों ही पार्टियों ने गठबंधन के संकेत दे दिए हैं। मायावती और अखिलेश यादव ने एक साथ आने के जिस तरह से संकेत दिए हैं उसके बाद माना जा रहा है कि 2019 के चुनाव में दोनों दल एक साथ आ सकते हैं। सपा और बसपा को एक दूसरे का धुर विरोधी माना जाता है और इस साल के विधानसभा चुनाव से पहले दोनों ही दलों के बीच गठबंधन की किसी ने सोचा भी नहीं था।

भाजपा से लड़ने के लिए साथ आ सकते हैं

भाजपा से लड़ने के लिए साथ आ सकते हैं

कई बसपा के नेताओं ने मायावती के साथ बैठक की जिसमें मायावती ने साफ कर दिया है कि भाजपा और ईवीएम के खिलाफ लड़ने के लिए उन्हें किसी भी दल के साथ गंठबंधन करने में कोई दिक्कत नहीं है। सूत्रों की मानें तो 19 अप्रैल को हुई इस बैठक में मायावती ने साफ किया है कि वह पार्टी के बुरे प्रदर्शन को भूल सकती है, पार्टी कांग्रेस और सपा के साथ गंठबंधन कर सकती है ताकि अगले चुनाव में सम्मानजनक स्थिति को हासिल किया जा सके।

आसान नहीं है दोनों दलों का साथ आना

आसान नहीं है दोनों दलों का साथ आना

आपको बता दें कि 1993 में पहली और आखिरी बार सपा और बसपा साथ आए थे, उस दौरान दोनों ही दलों ने गठबंधन किया था, लेकिन दो साल के बाद जिस तरह से मायावती और बसपा कार्यकर्ताओं पर हमला कराया, उसके बाद बसपा ने सपा से अपना समर्थन वापस ले लिया था। लेकिन अब दोनों ही पार्टियों में कई ऐसा नेता खुलकर सपा-बसपा के बीच गठबंधन की वकालत कर रहे हैं। मौजूदा समय में बसपा के पास सिर्फ 19 विधायक हैं, ऐसे में मायावती अकेले दम पर राज्यसभा भी नहीं पहुंच सकती हैं, मायावती का राज्यसभा का कार्यकाल 2018 में खत्म हो रहा है, लिहाजा अगले कार्यकाल के लिए मायावती को अन्य दलों का साथ चाहिए होगा।

पहली बार राज्यसभा पहुंचने पर संकट

पहली बार राज्यसभा पहुंचने पर संकट

मायावती अगर राज्यसभा नहीं पहुंच पाती हैं तो 1994 के बाद ऐसा पहली बार होगा जब वह यूपी की सरकार में भी नहीं हों और संसद में भी नहीं हो। ऐसे में अगर मायावती को सपा का साथ मिलता है तो वह एक बार फिर से राज्यसभा पहुंच सकती हैं। सपा नेता शाकिर अली का कहना है कि भाजपा को रोकने के लिए गठबंधन दोनों ही दलों के जरूरी है, दोनों ही दलों को पुरानी बातों को भूलकर आगे बढ़ना होगा, दोनों ही दल इस बात को समझते हैं, सभी पार्टी के कार्यकर्ता और समर्थक इस पक्ष में हैं कि गठबंधन होना चाहिए।

भाजपा से लड़ने के लिए पहले भी साथ आ चुके हैं

भाजपा से लड़ने के लिए पहले भी साथ आ चुके हैं

आपको बता दें कि 1993 में भाजपा को रोकने के लिए सपा और बसपा के बीच गठबंधन हुआ था, बाबरी मस्जिद के विध्वंश के बाद जिस तरह से भाजपा ने राम मंदिर के मुद्दे को भुनाया और सत्ता में वापसी की उस वक्त उस स्थिति से निपटने के लिए ऐसा किया गया था। उस वक्त सपा के पास 109 सीटें थी, जबकि बसपा के पास 67 सीटें थी, जबकि भाजपा के खाते में 177 सीटें आई थी। दोनों ही दलों के वोट बिखरने की वजह से दोनों ही दलों को नुकसान उठाना पड़ा था। ऐसे में दो दशक के बाद एक बार फिर दोनों दल भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर अपने वोट बैंक को बिखरने से रोकना चाहती हैं।

आसान नहीं होगा वोटर्स का साथ आना

आसान नहीं होगा वोटर्स का साथ आना

मायावती कई बार इस बात को कह चुकी हैं कि दलित समर्थक अपना वोट 1993 में सपा और 1996 में कांग्रेस को दिया था, लेकिन सपा और कांग्रेस के वोटर कभी भी बसपा के साथ नहीं गए हैं। मायावती इस बात को समझती हैं कि दलितों का यादव, जाट और ब्राह्मण जातियों से टकराव होता है। इसी के चलते मायावती ने दलितों और ब्राह्मणों को 2007 में एक साथ लाने का प्रयास किया था। 1993 में बसपा के मंत्री दीनानाथ भाष्कर जोकि अब भाजपा के विधायक हैं का कहना है कि सपा और बसपा अलग हैं, मुमकिन है कि मुश्किल समय में दोनों ही दल साथ आ जाए लेकिन उनके वोटर साथ नहीं आएंगे। मायावती और मुलायम सिंह ने एक दूसरे के खिलाफ समाज में काफी अंतर पैदा किया है। यह सच है कि गांवों में यादव और राजपूतों का दलितों से टकराव होता है, ऐसे में अगर सपा गठबंधन को जाती है तो जो सपा नेता खुद को पार्टी से किनारे होते देख रहे हैं वह इस गठबंधन के लिए मुश्किल खड़ी करेंगे।

वोटर्स को भी साथ आना होगा

वोटर्स को भी साथ आना होगा

अगर सपा और बसपा और कांग्रेस साथ आते हैं तो यह बेहतर विकल्प हो सकता है, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि इन दलों के समर्थक भी साथ आए। अगर 2014 के लोकसभा चुनाव में सभी दलों का वोट हर सीट के लिहाज से देखें तो अगर ये तीनों दल साथ आए होते तो भाजपा और अपना दल सिर्फ 23 सीटें जीत पाती, जबकि सपा और कांग्रेस को कुल 50 सीटें हासिल हो सकती थी। अगर कांग्रेस को अलग करें और सपा बसपा को साथ लाए तो दोनों ही दल 37 सीटें जीतने में सफल होते। मौजूदा समय में आरएलडी के नेता और 1993 में बसपा सरकार में मंत्री रहे मसूह अहमद का कहना है कि यह मुश्किल समय है, दोनों ही पार्टियो के वोटर्स को साथ आना होगा, 18 फीसदी मुस्लिम और मायावती के कोर 14 फीसदी वोटर साथ आते हैं, इसके साथ ही मुलायम सिंह यादव से जुड़े 9 फीसदी अन्य वोटर एकजुट हो तो कुल 40 फीसदी वोटर एक साथ होंगे। लेकिन इन दलों को सोनिया गांधी और नीतीश कुमार जैसे नेताओं की जरूरत है जो इन्हें साथ ला सके।

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