बनारस का हिन्दू परिवार 92 सालों से मना रहा है मुहर्रम, बनाता है ताजिया
वाराणसी। काशी गंगा जमुनी तहजीब के लिए पूरे विश्व में मशहूर है। काशी में रहने वालों ने धर्म और मजहब से ऊपर उठने के कई प्रमाण भी दिए हैं। बनारस की ही मुस्लिम महिला शिवलिंग बनाती है तो दूसरी शिव मंदिर बनवाकर वहाँ पूजन करती हैं। इन्हीं मिसालों में एक कड़ी जुड़ गई। बनारस के ब्रह्मनगर इलाके के कबीरनगर कॉलोनी के रहने वाले स्वर्गीय होरीलाल का परिवार 92 सालों से मुहर्रम का त्यौहार मना रहा है। इस बार भी अपने हाथों से उन्होंने ताजिया बनाया। मोहर्रम के रस्म को निभाने वाला ये परिवार 15 दिनों पहले से पूरी तैयारियां कर खुद बांस की लड़की, गोटे, कागज लगाकर मन्नत का ताजिया बनाता है और मातम भी मनाता है।

मन्नत पूरी होने पर शुरू किया ताजिया बनाना
स्वर्गीय होरीलाल के परिवार के मनोज ने oneindia को बताया कि पहले हमारा परिवार बनारस के ही शिवाला इलाके में रहता था तब हमारे दादा जी जिंदा थे । एक बार हमारी बुआ मन्नो देवी की तबियत ज्यादा खराब ही गयी थी। कई डॉक्टरों और हकीमों को दिखाने के बाद भी उन्हें आराम नहीं मिला तो हमारे आसपास कई मुस्लिम परिवार रहते थे।

दरगाह पर जाने से बुआ हुई थी ठीक
एक दिन पड़ोस के रहने वाले मुस्लिम दादाजी ने मेरे दादा होरीलाल से बुआ को लेकर फातमान कब्रिस्तान में बीबी फातमा की दरगाह पर ले जाने का सुझाव दिया। सब लोग बुआ को लेकर वहाँ गए और वापस आने के बाद ही बुआ मन्नो देवी की तबियत ठीक हो गयी। तब से हम लोगों के घर मे ताजिया बैठाया जाता रहा है, जो आज भी चल रहा है।

रस्मो रिवाज से मनाते हैं मोहर्रम
मनोज बताते हैं कि तब से लेकर अब तक हमारा पूरा परिवार मोहर्रम में ताजिया को बैठाने से लेकर सभी रस्मों को निभाता है। हम लोग मुहर्रम के आठवें दिन घर से ताजिया लेकर अपने पुराने घर के पास बने चौक शिवाला पर जाते हैं और पूरी रात मातम मनाते हैं। दूसरे दिन यानी नौवें दिन हम लोग ताजिया को लेकर फातमान दरगाह जाते हैं जहाँ गड्ढे में ताजिया को दफन करने के बाद पानी डालकर ठंडा करते हैं, फिर वापस घर आते हैं जहाँ तीजा की रस्म निभाई जाती है।












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