जानें वो किस्सा जब रपट लिखाने किसान बनकर थाने पहुंचे थे चौधरी चरण सिंह, हो गया था पूरा थाना सस्पेंड
जानें वो किस्सा जब रपट लिखाने किसान बनकर थाने पहुंचे थे चौधरी चरण सिंह, हो गया था पूरा थाना सस्पेंड
लखनऊ, 23 दिसंबर: देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की आज 119वीं जयंती है और पूरा देश अपने नेता को नमन कर रहा है। आज के दिन को 'किसान दिवस' के रुप में पूरे उत्तर प्रदेश में मनाया जा रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह से जुड़ा एक किस्सा हम आप आपको बताने जा रहा है, जो शायद आपने पहले सुना होगा। नहीं भी सुना तो आइए आज hindi.oneindia.com पर आपको ये किस्सा बताने जा रहे है....

गरीब परिवार में 23 दिसंबर 1902 में हुआ था जन्म
23 दिसंबर 1902 को मेरठ जिले के बाबूगढ़ छावनी के निकट नूरपुर गांव में चौधरी साहब का जन्म गरीब परिवार में हुआ था। चौधरी चरण सिंह के पिता चौधरी मीर सिंह थे, जिन्होंने अपने नैतिक मूल्यों को विरासत में चरण सिंह को सौंपा था। 1929 में वह आजादी की लड़ाई में शामिल हुए और 1940 में सत्याग्रह आंदोलन के दौरान जेल भी गए। 1952 में चौधरी साहब कांग्रेस सरकार में राजस्व मंत्री बने और किसान हित में जमींदारी उन्मूलन विधेयक पारित किया।

जानें चौधरी साहब के राजनीतिक सफर के बारे में
3 अप्रैल 1967 को चौधरी साहब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 17 अप्रैल 1968 को उन्होंने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। लेकिन मध्यावधि चुनाव में उन्होंने अच्छी सफलता मिली और दुबारा 17 फ़रवरी 1970 के वे मुख्यमंत्री बने। उसके बाद वो केन्द्र सरकार में गृहमंत्री बने तो उन्होंने मंडल और अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की। 1979 में वित्त मंत्री और उपप्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्रीय कृषि व ग्रामीण विकास बैंक की स्थापना की। 28 जुलाई 1979 को चौधरी चरण सिंह समाजवादी पार्टियों तथा कांग्रेस (यू) के सहयोग से प्रधानमंत्री बने।

चौधरी साहब किसान बनकर पहुंचे थे रपट लिखाने थाने
यह बात सन् 1979 करीब 42 साल पहले की है, जब चौधरी साहब कानून व्यवस्था का हाल जानने के लिए काफिले को काफी दूर खड़ा कर इटावा जिले ऊसराहार थाने में मैला कुर्ता और धोती पहनकर रपट लिखाने के लिए पहुंच गए थे। उन्होंने दरोगा से बैल चोरी की रिपोर्ट लिखने को कहा। लेकिन सिपाही ने उन्हें इंतजार करने को कहा। कुछ देर तक इंतजार करने के बाद फिर किसान (चौधरी चरण सिंह) ने रपट लिखने की गुहार की, मगर सिपाही ने अनसुना कर दिया। हालांकि, कुछ देर बाद सिपाही ने आकर कहा, 'चलो छोटे दरोगा जी बुला रहे हैं।'

चौधरी साहब किसान बनकर पहुंचे थे रपट लिखाने थाने
यह बात सन् 1979 करीब 42 साल पहले की है, जब चौधरी साहब कानून व्यवस्था का हाल जानने के लिए काफिले को काफी दूर खड़ा कर इटावा जिले ऊसराहार थाने में मैला कुर्ता और धोती पहनकर रपट लिखाने के लिए पहुंच गए थे। उन्होंने दरोगा से बैल चोरी की रिपोर्ट लिखने को कहा। लेकिन सिपाही ने उन्हें इंतजार करने को कहा। कुछ देर तक इंतजार करने के बाद फिर किसान (चौधरी चरण सिंह) ने रपट लिखने की गुहार की, मगर सिपाही ने अनसुना कर दिया। हालांकि, कुछ देर बाद सिपाही ने आकर कहा, 'चलो छोटे दरोगा जी बुला रहे हैं।'

सिपाही ने मांगा था चौधरी साहब से खर्चा-पानी
दरोगा ने पुलिसिया अंदाज में आड़े-टेढ़े सवाल उनसे पूछे और बिना रपट लिखे किसान को डांट-डपटकर थाने से चलता कर दिया। उनके जाते समय एक सिपाही पीछे से आया और रिपोर्ट लिखने के लिए खर्चा-पानी मांगा। अंत में 35 रुपये की रिश्वत लेकर रिपोर्ट लिखना तय हुआ। मुंशी ने रिपोर्ट लिखकर किसान से पूछा बाबा अंगूठा लगाओगे या हस्ताक्षर करोगे?। इस पर किसान (चौधरी चरण सिंह) ने हस्ताक्षर करने को कहा। जिसके बाद किसान ने हस्ताक्षर में नाम लिखा, चौधरी चरण सिंह और मैले कुर्ते की जेब से मुहर निकाल कर कागज पर ठोंक दी। जिस पर लिखा था, 'प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया'। ये देख पूरे थाने में हड़कंप मच गया। इसके बाद उन्होंने पूरे ऊसराहार थाने को सस्पेंड कर दिया था। दरअसल, चौधरी साहब उस समय के प्रधानमंत्री थे जो थाने में औचक निरीक्षण करने पहुंचे थे।












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