Kakori Train एक्शन के 100 साल:लखनऊ के छेदीलाल धर्मशाला में बनी थी योजना, GPO में चला ऐतिहासिक मुकदमा
Kakori Train Action 100 Years: लखनऊ के पास काकोरी में 9 अगस्त 1925 को हुई एक साहसी ट्रेन डकैती ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी। इस घटना को इतिहास में काकोरी रेलगाड़ी कांड के नाम से जाना जाता है, जिसे अब उत्तर प्रदेश सरकार ने काकोरी ट्रेन एक्शन का नाम दिया है।
इस क्रांतिकारी घटना ने न सिर्फ स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी, बल्कि लखनऊ की दो ऐतिहासिक इमारतों-जनरल पोस्ट ऑफिस (जीपीओ) और छेदीलाल धर्मशाला-को भी इस गौरवमयी इतिहास का हिस्सा बनाया। आइए, इस शताब्दी वर्ष में इन दोनों स्थानों के इस कांड से जुड़े महत्व को जानते हैं...

छेदीलाल धर्मशाला: क्रांतिकारियों का ठिकाना
लखनऊ के हलचल भरे अमीनाबाद इलाके में, झंडेवालान पार्क के सामने बनी छेदीलाल धर्मशाला वह गुप्त ठिकाना था, जहां क्रांतिकारियों ने काकोरी कांड की योजना को अंतिम रूप दिया। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के नेतृत्व में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी, चंद्रशेखर आजाद और अन्य क्रांतिकारियों ने 8 अगस्त 1925 को इस धर्मशाला में इमरजेंसी मीटिंग की थी।
धर्मशाला के प्रबंधक रामनाथ गुप्ता के मुताबिक, राम प्रसाद बिस्मिल कमरा नंबर 211 (अब 227) में रुके थे। गोपनीयता बनाए रखने के लिए क्रांतिकारी छद्म नामों और फर्जी पतों के साथ यहां ठहरे थे, ताकि उनकी योजना ब्रिटिश पुलिस की नजरों से बची रहे।
क्रांतिकारी रामकृष्ण खत्री के पोते रोहित खत्री ने बताया, 'मेरे पिता उदय खत्री मुझे काकोरी के वीरों की कहानियां सुनाया करते थे। धर्मशाला में क्रांतिकारियों की बैठक इतनी गुप्त थी कि कई लोग एक-दूसरे को नहीं जानते थे, फिर भी एक मिशन के लिए एकजुट थे।' रोहित का सुझाव है कि धर्मशाला में एक छोटा संग्रहालय बनाया जाए, ताकि युवा पीढ़ी को इस बलिदान की कहानी पता चले।
जनरल पोस्ट ऑफिस (जीपीओ): जहां चला ऐतिहासिक मुकदमा
लखनऊ के हजरतगंज में खड़ा जनरल पोस्ट ऑफिस पहले रिंग थिएटर के नाम से जाना जाता था। काकोरी कांड के बाद यहीं वह ऐतिहासिक मुकदमा चला, जिसमें क्रांतिकारियों को सजा सुनाई गई। शुरुआत में यह केस रोशनुद्दौला कचहरी में शुरू हुआ, लेकिन क्रांतिकारियों के समर्थन में उमड़ती भीड़ को देखते हुए अंग्रेजों ने इसे जीपीओ में स्थानांतरित कर दिया। इतिहासकार डॉ. रवि भट्ट के अनुसार, '1926 में जीपीओ में एक अस्थायी कोर्ट बनाया गया था। यहीं पर जज आर्चीबाल्ड हैमिल्टन ने राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी को फांसी की सजा सुनाई।'
6 अप्रैल 1927 को कोर्ट ने अपना अंतिम फैसला सुनाया, जिसमें चार क्रांतिकारियों को मौत की सजा और अन्य को 4 से 14 साल तक की सजा दी गई। इस मुकदमे में 42 लोग गिरफ्तार हुए, लेकिन चंद्रशेखर आजाद पुलिस की पकड़ से दूर रहे। जीपीओ की दीवारें आज भी उन क्रांतिकारियों की हुंकार की गवाह हैं, जिन्होंने कोर्ट में 'मेरा रंग दे बसंती चोला' गाते हुए फांसी को गले लगाया।
काकोरी कांड: क्यों और कैसे हुआ?
1922 में चौरी-चौरा कांड के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था, जिससे युवा क्रांतिकारी निराश हो गए। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ने सशस्त्र क्रांति के लिए धन जुटाने का फैसला किया। राम प्रसाद बिस्मिल ने देखा कि सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन (8 डाउन) में सरकारी खजाना बिना ताले के लोहे के संदूक में ले जाया जाता है। 9 अगस्त 1925 को काकोरी के पास राजेंद्र लाहिड़ी ने ट्रेन की चेन खींची, और बिस्मिल, अशफाकउल्ला, और चंद्रशेखर आजाद ने गार्ड को काबू कर 4601 रुपये लूट लिए। इस धन का इस्तेमाल हथियार खरीदने के लिए होना था।
लेकिन एक चादर पर लगी धर्मशाला की मोहर ने क्रांतिकारियों को पकड़वाने में अहम भूमिका निभाई। अंग्रेजों ने 40 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया और करीब 10 लाख रुपये खर्च कर इस केस को सुलझाया।
शताब्दी वर्ष में स्मरण
2024-25 में काकोरी कांड की 100वीं वर्षगांठ पर उत्तर प्रदेश सरकार ने कई आयोजन किए। 8 अगस्त 2025 को लखनऊ के काकोरी शहीद स्मारक में समापन समारोह में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, 'यह घटना युवाओं के लिए प्रेरणा है। क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश खजाने को लूटकर स्वतंत्रता संग्राम को नई ऊर्जा दी।' दिल्ली के सेंटर फॉर सिविलाइजेशनल स्टडीज ने भी 8 अगस्त 2024 से 9 अगस्त 2025 तक साल भर के समारोह की घोषणा की है।
आज की पीढ़ी को जागरूक करने की जरूरत
लखनऊ के निवासी और छात्र मोहित कुमार ने कहा, 'मैं अक्सर जीपीओ और अमीनाबाद जाता हूं, लेकिन मुझे इन जगहों का काकोरी कांड से जुड़ाव नहीं पता था।' रोहित खत्री ने जोर दिया कि सरकार को इन ऐतिहासिक स्थलों को संरक्षित कर संग्रहालय बनाना चाहिए। छेदीलाल धर्मशाला में अब कोई पुराना दस्तावेज नहीं बचा, लेकिन ट्रस्ट ने पिछले साल क्रांतिकारियों की तस्वीरें लगाने का प्रस्ताव पारित किया था, जो अभी तक लागू नहीं हुआ।
काकोरी रेलगाड़ी कांड ने न सिर्फ अंग्रेजों को चुनौती दी, बल्कि युवाओं में देशभक्ति की लौ जलाई। छेदीलाल धर्मशाला और जीपीओ आज भी उस साहस और बलिदान की गाथा को संजोए हुए हैं।












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