Hari Shankar Tiwari और वीरेंद्र शाही की अदावत से शुरू हुई थी सियासत के अपराधीकरण की शुरूआत
Hari Shankar Tiwari: पूर्वांचल के बाहुबली पंडित हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र शाही की अदावत से ही सियासत में अपराधीकरण की शुरूआत हुई थी। आइए जानते है हरिशंकर के बारे में...

Hari Shankar Tiwari: पूर्वांचल के बाहुबली नेता व पूर्व मंत्री पंडित हरिशंकर तिवारी का मंगलवार 16 मई की शाम निधन हो गया। हरिशंकर तिवारी काफी लंबे वक्त से बीमार चल रहे थे। जैसे ही लोगों को उनके निधन की खबर तो उनके आवास पर हजारों की संख्या में समर्थकों की भीड़ जुट गई।
हरिशंकर तिवारी का अंतिम संस्कार आज बलहगंज मुक्तिधाम पर किया जाएगा। पंडित हरिशंकर तिवारी की गिनती पूर्वांचल के सबसे बड़े बाहुबली नेताओं में होती थी। बता दें कि तिवारी छोटे कद के थे लेकिन उनकी निगाहें बड़ी ही पैनी थीं। वो चलते, उठते-बैठते चौकन्ना रहते थे।
हरिशंकर तिवारी के बारे में ऐसा कहा जाताया कि उनके स्वभाव में ब्राह्मणों की लचक थी, लेकिन अंदर से अक्खड़ थे। जो ठान लेते वह करके मानते थे। उनके बारे में कहा जाता है कि वो पूर्वांचल ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति को बदलने वाला नाम थे।
दरअसल, उत्तर प्रदेश में बाहुबली सियासत के अपराधीकरण की शुरूआत हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र शाही की अदावत से ही हुई थी, ऐसा माना जाता है। कहा जाता है कि यूपी में पहली बार 'माफिया' शब्द का इस्तेमाल भी पूर्वांचल के इसी (हरिशंकर तिवारी) बाहुबली के लिए हुआ था।
साल 1935 में पंडित हरिशंकर तिवारी का जन्म बड़हलगंज के टांडा गांव में हुआ था। बात 80 के दशक की है, जब पूर्वांचल की राजनीति में दो युवाओं ने अपनी छाप छोड़नी शुरू की थी। एक थे वीरेंद्र शाही, जो ठाकुर लॉबी के अगुवा माने गए और जिन्हें गोरक्षपीठ का समर्थक भी माता जाता था।
वहीं, दूसरी तरफ थे पंडित हरिशंकर तिवारी। उन्हें ब्राह्मणों का नेता माना जाता था। एनबीटी की खबर के मुताबिक, वीरेंद्र शाही और हरिशंकर तिवारी की अदावत ने देखते-देखते पूरे क्षेत्र में ब्राह्मण और ठाकुर लामबंदी शुरू करा दी थी। दोनों ही अपराधी की दुनिया में अपनी-अपनी धाक जमाना चाहते थे।
अपराधी की दुनिया में धाक जामने के लिए दोनों के बीच गैंगवॉर का सिलसिला भी शुरू हो गया था। बता दें, उत्तर पूर्व रेलवे का मुख्यालय गोरखपुर में है, जिसके टेंडर हासिल करने के लिए वीरेंद्र शाही और हरिशंकर तिवारी के बीच होड़ रहती थी। तिवारी और शाही गैंग ने इस होड़ में दुश्मनी की सारी हदें पीछे छोड़ दीं।
वहीं, इस गैंगवार की धमक लखनऊ तक सुनी जाने लगी थी। उस वक्त उत्तर प्रदेश में वीर बहादुर की सरकार हुआ करती थी। वह खुद भी गोरखपुर के ही रहने वाले थे और कहा जाता है कि इन दोनों बाहुबलियों पर नियंत्रण लगाने के लिए वीर बाहदुर की सरकार ने पहली बार गैंगस्टर एक्ट लागू किया था।
पुलिस ने दोनों बाहुबलियों पर सख्ती बढ़ा दी थी और दोनों के ऊपर कई मुकदमे भी दर्ज हुए। ऐसा बताया जाता है कि 80 के दशक में हरिशंकर तिवारी के ऊपर हत्या की साजिश, किडनैपिंग, लूट, रंगदारी आदि के कई मुकदमे दर्ज हुए थे। तिवारी को सन् 1985 में जेल भी जाना पड़ा। लेकिन, हरिशंकर तिवारी यहां रुकने वाले नहीं थे।
हालांकि, ऐसा किसे पता था पंडित हरिशंकर तिवारी के जेल जाने के बाद से उत्तर प्रदेश की सियासत भी बदलने जा रही है। 1985 में हरिशंकर तिवारी ने जेल से ही निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा और जीत दर्ज कर सभी को चौंका दिया था। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
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ऐसा बताया जाता है कि हरिशंकर तिवारी ने तीन बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता। नब्बे का दशक खत्म होते-होते हरिशंकर तिवारी पूर्वांचल में ब्राह्मणों का सबसे मजबूत चेहरा बन चुके थे। सरकार किसी की भी हो माना जाता था कि हरिशंकर तिवारी मंत्री बनेंगे ही।
पंडित हरिशंकर तिवारी 6 बार विधायक रहे और यूपी सरकार में 5 बार कैबिनेट मंत्री। यहां तक कि एक दिन के सीएम जगदंबिका पाल की कैबिनेट में भी हरिशंकर तिवारी का नाम शामिल था। कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने तो उस समय भी 'पंडित जी' को कैबिनेट में जगह दी गई थी।
यही नहीं राम प्रकाश गुप्ता, राजनाथ सिंह की सरकार के बाद मायावती और मुलायम सरकार में भी हरिशंकर तिवारी मंत्री रहे। वीरेंद्र शाही से अदावत के चलते हरिशंकर तिवारी की कभी भी गोरक्षपीठ से संबंध कभी अच्छे नहीं रहे। 2007 में चुनाव हारने के बाद हरिशंकर तिवारी राजनीति से दूर हो गए थे।












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