उत्तर प्रदेश चुनाव : सपा का एक ‘सिंह’ जो ‘मुलायम’ भी है और भाजपा का ‘मित्र’ भी
लखनऊ, 23 दिसंबर। वे समाजवादी पार्टी के 'सिंह' हैं। मुलायम भी हैं। यारो के यार भी हैं। उनके लिए दल से अधिक दिल मायने रखता है। जो भी प्यार से मिला वे उसी के हो लिये। रिश्ते की राह में राजनीति कभी आड़े नहीं आयी। न भाजपा से गुरेज न संघ से। न्योता मिला तो पहुंच गये। सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव का मिजाज कुछ ऐसा ही हैं। मंगलवार को वे उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू के निवास पर एक मांगलिक कार्यक्रम में शामिल हुए।

ऐसा संयोग हुआ कि मुलायम सिंह यादव संघ प्रमुख मोहन भागवत की बगल में बैठ गये। आम तौर पर शादी-विवाह से जुड़े कार्यक्रमों में राजनीति की गुंजाइश नहीं होती। लेकिन उत्तर प्रदेश चुनाव में अपनी जमीन तलाश रही कांग्रेस ने इसे सियासत का मुद्दा बना दिया। कांग्रेस ने सपा की नयी परिभाषा गढ़ दी। नयी सपा में 'स' का मतलब संघवाद। क्या दो विरोधी दलों के नेता शादी-विवाह के मौके पर भी नहीं मिल सकते ? क्या किसी पारिवारिक समारोह में दो विरोधी नेता अगल-बगल नहीं बैठ सकते ? क्या चुनावी फायदे के लिए कांग्रेस सामाजिक शिष्टाचार भी भूल गयी ? क्या उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपने फायदे और सपा के नुकसान के लिए कांग्रेस ये मुद्दा उछाल रही है ? अगर वैवाहिक कार्यक्रमों को राजनीतिक आंकलन का आधार बनाया गया तब तो इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी और लालू यादव को भाजपाई मान लेना पड़ेगा !

अरुण जेटली की शादी में वाजपेयी से मिली थीं इंदिरा गांधी
भाजपा के दिवंगत नेता अरुण जेटली छात्र नेता के रूप में ही मशहूर हो चुके थे। इमरजेंसी के खिलाफ आंदोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। इंदिरा गांधी की निरंकुश सत्ता का खुल कर विरोध किया था। 1982 में अरुण जेटली की शादी कांग्रेस के पूर्व सांसद और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मंत्री गिरधारी लाल डोगरा की पुत्री संगीता से हुई थी। इंदिरा गांधी उस समय प्रधानमंत्री थीं। राजनीतिक रूप से जेटली और इंदिरा गांधी एक दूसरे के विरोधी थे। लेकिन इसके बाद भी इंदिरा गांधी अरुण जेटली की शादी में शामिल हुईं। इस मौके पर अटल बिहारी वाजपेयी भी वहां मौजूद थे। इंदिरा गांधी उनसे भी गर्मजोशी के साथ मिलीं। खुशी का मौका था। अटल बिहारी वाजपेयी और इंदिरा गांधी ने आमने-सामने बैठ कर कुछ देर बात की। इंदिरा गांधी का एक भाजपा नेता की शादी में शामिल होना, अटल बिहारी वाजपेयी से बात करना क्या राजनीति का परिचायक था ? इसके आधार पर क्या कांग्रेस के 'स' को संघवाद मान लेना चाहिए ? लेकिन गनीमत है कि उस दौर में आज की तरह 'राजनीति' नहीं होती थी।

अगल-बगल जेटली-सुषमा और बीच में मनमोहन
भाजपा नेता नितिन गडकरी ने 2012 में बेटे सारंग की शादी की रिशेप्शन पार्टी दी थी। उस समय मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। दिल्ली में कार्यक्रम आयोजित था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने व्यस्त कार्यक्रम के बीच इस समारोह में शामिल होने के लिए समय निकाला। वे गड़करी के पुत्र और बहू को आशीर्वाद देने पहुंचे। जब वर-वधू ने पैर छू कर मनमोहन सिंह को प्रणाम किया तो उनके जैसा गंभीर व्यक्ति भी भावविह्वल हो गया। उन्होंने वधू के सिर पर हाथ रख कर अपना आशीष दिया। इसके बाद अरुण जेटली प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास पहुंच गये। वे दोनों बात करते हुए आगे बढ़े। सुषमा स्वराज को बैठा देख कर मनमोहन सिंह वहां रुक गये और उनकी बगल में बैठ गये। उनकी दूसरी तरफ अरुण जेटली बैठ गये। आजू-बाजू जेटली- सुषमा स्वराज और बीच में मनोहन सिंह। इसके बाद सुषमा स्वराज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से बात करने लगीं। मनमोहन सिंह कभी सुषमा स्वराज की तरफ देख कर कुछ कहते तो कभी जेटली की तरफव मुखातिब हो कर कुछ कहते। भाजपा के दो दिग्गज नेताओं के बीच कांग्रेस के प्रधानमंत्री के यूं बैठने पर किसी ने कोई ध्यान नहीं दिया। खुशी का मौका था। जश्न था। दावत थी। ऐसे में भला किसे फिक्र थी पॉलिटिक्स की। तब तो किसी ने नहीं कहा कि मनमोहन सिंह भाजपाई हो गये।

कांग्रेस और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ
सोनिया गांधी का अरुण जेटली की पत्नी संगीता से मित्रवत रिश्ता रहा है। राजनीति अलग है। व्यक्तिगत रिश्ते अलग हैं। दिसम्बर 2019 में दिल्ली में गीता प्रेरणा महोत्सव हुआ था। इस कार्यक्रम में सोनिया गांधी के करीबी नेता जनार्दन द्विवेदी ने मोहन भागवत के साथ मंच साझा किया था। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी 2018 में संघ के मुख्यालय नागपुर गये थे। उनकी बेटी तक ने इसका विरोध किया था। लेकिन न तो जनार्दन द्विवेदी भाजपाई हुए और न ही प्रणब मुखर्जी। इसी तरह लालू यादव की बेटी राजलक्ष्मी और मुलायम सिंह यादव के पोते तेजप्रताप सिंह यादव के तिलक समारोह में एक अनोखा दृश्य सामने आया था। कार्यक्रम के दौरान लालू यादव, नरेन्द्र मोदी और मुलायम सिंह यादव एक साथ सोफे पर बैठे हुए थे। तो क्या इससे राजनीति बदल गयी ? लालू यादव आज भी नरेन्द्र मोदी के कट्टर विरोधी हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश की चुनावी मजबूरियों में फंसी कांग्रेस सामाजिक शिष्टाचार में भी राजनीति तलाश रही है।












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