ओपी सिंह नहीं होंगे यूपी के DGP, केंद्र सरकार ने इन 7 कारणों से खारिज किया प्रस्ताव
इलाहाबाद। केंद्र सरकार ने यूपी के डीजीपी पद के लिए आईपीएस ओपी सिंह का नाम खारिज कर दिया है। बीते 31 दिसंबर को उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने ओपी सिंह को यूपी का नया डीजीपी बनाए जाने का प्रस्ताव भेजा था। लेकिन केंद्र सरकार ने शुक्रवार को यूपी सरकार के इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। अब यूपी में नए सिरे से डीजीपी की तलाश शुरू होगी। सूत्रों की माने तो भावेश कुमार सिंह और रजनीकान्त मिश्रा में से कोई एक यूपी का नया डीजीपी होगा। आपको याद दिला दें कि उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक सुलखान सिंह के सेवानिवृत्त होने के बाद सीआईएसएफ के महानिदेशक ओपी सिंह को यूपी पुलिस का डीजीपी बनाया गया था, लेकिन एक पखवारे से ज्यादा दिन का समय बीत गया, परन्तु ओपी सिंह अपना पदभार नहीं संभाल सके। आइए जानते हैं आखिर किन कारणों से केंद्र सरकार ने ओपी सिंह का नाम खारिज किया।

कारण नंबर एक - राजनैतिक नुकसान
लोकसभा चुनाव की तैयारियां लगभग हर दल ने शुरू कर दी है और उत्तर प्रदेश की लोकसभा सीटें केंद्र की सीढ़ियां मानी जाती हैं । ऐसे में भाजपा यूपी में ओ पी सिंह को पुलिस का नया डीजीपी बनाकर अपना राजनैतिक नुकसान नहीं करना चाहती है। इस राजनीतिक नुकसान के पीछे एक बहुत ही पुरानी कड़ी है जो सूबे की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के साथ जुड़ी हुई हैं । दरअसल मायावती गेस्ट हाउस कांड के दौरान ओ पी सिंह भी चर्चा में आए थे तब वह लखनऊ के एसपी थे और ओ पी सिंह को दलित विरोधी छवि का बता कर खूब राजनीति हो सकती है । यह निश्चित है कि भाजपा को उत्तर प्रदेश में बसपा घेरने का प्रयास करेगी और अगर ऐसे में ओपी सिंह डीजीपी बनते हैं तो बसपा, भाजपा को दलित विरोधी बताकर अपने वोट बैंक को बचाने में सफल हो जाएगी और सीधे तौर पर बीजेपी को पिछले चुनाव की तुलना में इस बार राजनैतिक नुकसान होगा। ऐसे में खुद को राजनैतिक नुकसान से बचाने के लिए ओ पी सिंह को डीजीपी बनाए जाने की घोषणा के बाद भी पद ग्रहण नहीं कराया गया।

2: जाति का समीकरण
उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद जब मुख्यमंत्री के तौर पर सीएम योगी आदित्यनाथ का नाम सामने आया तो एक बार जोर शोर से चर्चा उठी कि भाजपा सवर्णों की पार्टी है और उन्होंने अपना सवर्ण कैंडिडेट ही मुख्यमंत्री के तौर पर आगे किया है। मुख्यमंत्री बनने के बाद सुलखान सिंह डीजीपी बने तो एक बार फिर चर्चा यही हुई कि सीएम योगी आदित्यनाथ ठाकुर वर्ग को वरीयता दे रहे हैं। इस मुद्दे को हवा तब और मिली जब कई आईएएस आईपीएस अफसरों का ट्रांसफर हुआ तो उनमें काफी नाम ठाकुर वर्ग के रहे। जिस पर भी राजनीतिक दलों ने भी रोटी सेकने चाही थी। ऐसे में एक बार फिर से ओपी सिंह का डीजीपी बनना जातिगत समीकरण को भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता था।

3: कानूनी अड़चन
कानूनी प्रक्रिया के बारे में हमने वरिष्ठ अधिवक्ता सूर्या नारायण मिश्र से बात की तो उन्होंने बताया कि ओपी सिंह के डीजीपी ना बने में सबसे अहम जो कारण है वह कानूनी अड़चन का है। दरअसल किसी भी अधिकारी को सेंट्रल डेपुटेशन का कार्यकाल बिना पूरा किए होम कैडर में वापस जाने के लिए अपॉइंटमेंट कमेटी ऑफ कैबिनेट की अप्रूवल लेना जरूरी होता है, लेकिन ओपी सिंह को यह अप्रूवल अभी तक नहीं मिल सकी है। हालांकि राज्य और केंद्र में दोनों जगह भाजपा की सरकार है ऐसे मे यह अड़चन मात्र दिखावा ही है। अगर राज्य सरकार अगर डीजीपी जैसे पद के लिए अपने कैडर को वापस बुलाना चाहती है तो यहा प्रक्रिया सिर्फ औपचारिकता मात्र होती है, लेकिन बाहरी दिखावे के लिए इसी कारण को सबसे अधिक फोकस कराया जा रहा है। जिससे यह संदेश जाए कि केंद्र सरकार ने ओ पी सिंह को रिलीज ही नहीं किया है। यह तो खुद ही साफ है कि सरकार खुद ओपी सिंह को डीजीपी नहीं बनाना चाहती क्योंकि ओपी सिंह केंद्र सेवा में कार्यरत है और जब तक वहां से रिलीव नहीं होते वह डीजीपी का पद ले ही नहीं सकते है।
4 - सोशल मीडिया पर छवि
ओपी सिंह के डीजीपी बनाये जाने की घोषणा के साथ ही सोशल मीडिया पर भी खूब चर्चा शुरू हुई। सिंह की ईमानदारी कारनामे व अन्य उपलब्धियां गिनाई जा रही थी कि उसी दौरान सोशल मीडिया पर उनके स्टेज शो का वीडियो भी वायरल हुआ। जिसमें सिंह गाना गाते हुये दिख रहे थे। ये वीडियो इतनी तेजी के साथ वायरल हुआ कि खुद कि सरकारी महकमा भी आश्चर्यचकित हो गया। इस वीडियो से नए डीजीपी की छवि को लोग तरह तरह से देखने लगे और राजनैतिक दल भी अपने अपने तरीके से चुटकी लेने में जुट गए थे।

5 - संघ की नापसंद
ओपी सिंह को डीजीपी पद पर पसंद करने वालों में भाजपा के कयी बडे चेहरे थे, लेकिन संघ को यह चेहरा पसंद नहीं था। सूत्रों के अनुसार संघ और अमित शाह के बीच लोक सभा चुनाव पर चर्चा के बाद ओपी सिंह के जाति, दलित विरोधी छवि, मुलायम सिंह से नजदीकी, गेस्ट हाउस कांड में संघ से तनातनी की वजह उनके डीजीपी न बनने के सबसे अहम कारण थे। यही कारण था कि सीएम योगी आदित्यनाथ ने भी पीएम मोदी से मुलाकात की और गहन चर्चा के बाद ओपी सिंह को डीजीपी न बनाने की सहमति बनी। लेकिन अचानक ने नाम की घोषणा और फिर नाम वापसी से अपनी किरकिरी न होने का तरीका ढूंढा गया और केन्द्रीय नियुक्ति से ओपी सिंह को रिलीव ही नहीं किया गया। ओ पी सिंह को डीजीपी का पद संभालना था, लेकिन तारीख पर तारीख बढ़ती रही और यह क्रम लगातार जारी रहा और अब तय समय के अंदर पद का कार्यभार ना संभाले जाने के कारण ओपी सिंह का नाम डीजीपी पद से पीएमओ ने बाहर कर दिया है।
6 - कई बड़े नाम
मीडिया रिपोर्ट्स में पहले यह खबर चली कि ओपी सिंह भी सीएम योगी आदित्यनाथ की पहली पसंद है, लेकिन यह ख़बर पूरी तरह से सही नहीं थी। क्योंकि डीजीपी की तलाश में जो सबसे ऊपर नाम थे उनमें 1982 बैच के रजनीकांत मिश्रा , प्रवीण कुमार सिंह और सूर्य कुमार शुक्ला थे, लेकिन अचानक से 1983 बैच के ओपी सिंह का नाम सामने आया और उस पर मुहर लग गई ।तब माना जा रहा था कि गृह मंत्री राजनाथ सिंह के करीबी होने के कारण ओ पी सिंह को यह फायदा मिला है । क्योंकि उससे पहले ही एनडीआरएफ के डी जी के पद से उन्हें सीआईएसएफ का डीजी बनाया गया था। हालांकि सीएम योगी ने कोई आपत्ति नहीं की थी लेकिन संघ की चुनावी तैयारी में ओपी सेट नहीं हो पाये।

7 - मुलायम से नजदीकी
ओ पी सिंह को सपा के पूर्व मुखिया मुलायम सिंह यादव का बेहद ही करीबी माना जाता है। मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान ओ पी सिंह काफी चर्चा में रहे। लखनऊ में एसपी रहने के दौरान ही मायावती से अभद्र व्यवहार हुआ था और गेस्ट हाउस कांड के नाम से यह मुद्दा पूरे देश में सुर्खियों आया था। बाद में काफी दबाव के बाद ओपी सिंह को सस्पेंड किया गया था। चुनावी सरगर्मी बढने वाली है ऐसे में भाजपा अपने धुर विरोधियों को किसी तरह से राहत या घेराव का मुद्दा नहीं देना चाहती है।












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