फौज में भगदड़, हथियार भी कुंद... यूपी की जंग कैसे जीतेगा मायावती का हाथी?
उत्तर प्रदेश:
लखनऊ, 28 नवंबर: उत्तर प्रदेश की सियासत में बीते तीस साल से राजनीति में नाम कमाने वाले सबसे अहम दो-तीन नामों में एक नाम मायावती का है। चार बार इस अर्से में सूबे की सीएम रहीं और बसपा सुप्रीमो मायावती एक ऐसी नेता हैं, जो अपने दम पर लड़कर इस ऊंचाई पर पहुंची हैं। उनके संघर्ष की यूपी ही नहीं देशभर के लोग कद्र करते हैं। उनकी राजनीति में बीते कुछ सालों में उतार देखने को मिला है। खासतौर से यूपी के आने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर वो जिस तरह का रवैया दिखा रही हैं, उसने तो ये सवाल खड़ा कर ही दिया है कि आखिर उनके मन में चल क्या रहा है? उनकी राजनीति पर सवाल होने की कई वजहे हैं।

संघर्ष से बचती सी क्यों दिख रहीं
मायावती का राजनीति में आने का संघर्ष काफी कड़ा रहा है। बतौर महिला और दलित उनको कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा लेकिन ये कोई चुनौती उनकी राह नहीं रोक सकी। हाल के सालों में देखें तो ना तो वो खुध और ना उनकी पार्टी ही सड़क पर दिखती है। वो जिस तरह से सड़क से दूरी बनाकर रखती हैं जैसी वो राजनीतिक दल नहीं कोई कॉर्पोरेट कंपनी चला रही हों। यहां तक कि प्रेस में बयान तक देनें में वो भी वो बहुत सक्रिय नहीं दिखती हैं। समर्थक हों या विरोधी, ये सवाल सब कर रहे हैं कि आखिर वो इतनी बेफिक्र कैसे हैं।

पार्टी छोड़ते नेताओं की नहीं दिखती फिक्र
मायावती को लेकर कहा जाता है कि पार्टी में वो काफी अनुशासन पसंद करती हैं। बीएसपी के संगठन को काफी मजबूत माना जाता रहा है लेकिन बीते करीब दो साल में जिस तरह से बसपा से नेता गए हैं, वो भी एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। उनके ज्यादातर विधायक उनको छोड़ चुके हैं तो कई सांसद भी पार्टी में इसलिए हैं कि सदस्यता जाने का खतरा है। वो किसी भी तरह से सक्रिय नहीं दिख रहे हैं। आज स्थिति ये है कि सतीश चंद्र मिश्रा ही एक पुराने और बड़े नाम पार्टी में बचे हैं। कई जिलों में तो पार्टी के पास ये स्थिति है कि कोई स्थानीय लोकप्रिय चेहरा बचा ही नहीं है। इस सबके बावजूद मायावती की ओर से पार्टी में बिखराव रोकने की कोई कशिश नहीं दिखती है। जो कि निश्चित ही राजनीति के जानने वालों को हैरान करती है।

पिछड़ों, मुस्लिमों पर दावा ही छोड़ दिया?
बहुजन समाज पार्टी को जाटवों के बाद मुस्लिमों और पिछड़ों का वोट ही सबसे ज्यादा मिलता रहा है। पार्टी में मुस्लिम और पिछड़े समाज से आने वाले नेताओं को हमेशा एक जगह भी मिलती रही है। इस बार देखा जाए तो बसपा ने इन दोनों ही वोटर पर दावा छोड़ दिया है। बसपा नेता खुले मंचों से कह रहे हैं कि वो दलितों के साथ इस बार ब्राह्मणों को जोड़ रहे हैं और इन दोनों के दम पर सरकार बनाएंगे। एक तरह से वो दलित और ब्राह्मण के अलावा बाकी वोटरों से वोट मांग ही नहीं रही है। जो कि अपने आप में अजीब बात है।

भाजपा के साथ नरमी क्यों?
बहुजन समाज पार्टी जिस मिशन से निकली है, उसमें वर्णवाद, ब्रह्मणवाद का विरोध आरक्षणक की हिमायत जैसी चीजें अहम हैं। वहीं आरएसएस और उसकी राजनीतिक भुजा भाजपा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर इन मुद्दों पर बसपा के उलट ही सोचती है। इस सबके बावजूद बसपा और मायावती की बाजपा के लिए एक नरमी दिख रही है। वो सपा और कांग्रेस पर ज्यादा हमलावर हैं। यहां तक कि बसपा के मंचों से जयश्रीराम के नारे लग रहे हैं। जाहिर है कि ये राजनीति के माहिरीन को अचरज में डाल रहा है।












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