West UP: भाजपा ने क्यों उठाई पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने की मांग?
2024 के लोकसभा चुनावों से पहले एक बार फिर से उत्तर प्रदेश को दो हिस्सों में बांटने की मांग उठ गई है। लेकिन, इस बार इस मांग की अहमियत इसलिए ज्यादा बढ़ गई है, क्योंकि यह केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता संजीव बालियान की ओर से की गई है।
संजीव बालियान ने यह मांग जाटों के एक कार्यक्रम में की है। वह खुद भी जाट नेता हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को जिन कुछ और नामों से जाना जाता है, उसमें से जाट लैंड भी एक चर्चित नाम है। पूरे उत्तर प्रदेश में जाटों की आबादी भले ही सिर्फ 2% बताई जाती है, लेकिन इस क्षेत्र में उनकी जनसंख्या 12 से लेकर 15% तक अनुमानित है, जो कि किसी भी चुनाव का प्रभावित करने में सक्षम है।

केंद्रीय मंत्री ने की पश्चिमी यूपी को अलग राज्य बनाने की मांग
अगर संजीव बालियान ने पश्चिमी यूपी को अलग राज्य बनाने और मेरठ को इसकी राजधानी बनाने की मांग की है, तो इसके पीछे खास वोट बैंक को एकजुट रखने की सोची-समझी रणनीति हो सकती है। यूं तो उनकी दलील है कि हाई कोर्ट यहां से 750 किलो मीटर दूर है, इसलिए अलग राज्य ही बेहतर विकल्प है।
2014 में पश्चिमी यूपी की सारी सीटें बीजेपी जीती थी
अगर राजनीतिक नजरिए से देखें तो 2013 का मुजफ्फरनगर दंगा पश्चिमी यूपी के चुनावी गणित के लिए एक टर्निंग प्वाइंट की तरह है। क्योंकि, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की भी आबादी काफी प्रभावशाली है। दंगों के बाद मुस्लिम-जाट वोट बैंक पूरी तरह से बंटा हुआ था और उसके बाद हुए 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी इस क्षेत्र की सभी 14 संसदीय सीटें जीत गई थी।
2019 में भाजपा को हुआ था बड़ा नुकसान
लेकिन, जब 2019 में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल ने गठबंधन करके चुनाव लड़ा तो बीजेपी आधी सीटें गंवा बैठी। इस तरह से यूपी में पार्टी की कुल जितनी सीटें कम हुईं उसका ज्यादातर हिस्सा इसी सीट से घटी थी। इस इलाके की चार सीटें बसपा के खाते में गई और तीन सपा को मिली थी। हालांकि, अब बसपा इन दलों के गठबंधन इंडिया ब्लॉक में शामिल नहीं है।
पश्चिमी यूपी में शामिल जिले
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राज्य के मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, मथुरा, अलीगढ़, बिजनौर, बुलंदशहर, सहारनपुर, बागपत, आगरा, गाजियाबाद, हापुड़, गौतम बुद्ध नगर और हाथरस जैसे जिले शामिल हैं।
2024 का चुनाव भाजपा के लिए बहुत महत्वपूर्ण
दरअसल, बीजेपी हर हाल में सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने प्रदर्शन को बेहतर से बेहतर रखना चाहती है। पार्टी के लिए 2024 का लोकसभा चुनाव बहुत ही महत्वपूर्ण है, जिसमें यूपी की 80 लोकसभा सीटों के नतीजे बहुत ज्यादा मायने रखने वाले हैं।
पश्चिमी यूपी पर बीजेपी कर रही है काफी फोकस
यही वजह है कि पिछले महीने ही पार्टी ने राज्य में जो संगठनात्मक बदलाव किए हैं, उसमें सबसे ज्यादा परिवर्तन पश्चिमी यूपी में ही किया गया है। यहां के 17 जिलाध्यक्षों को बदल दिया गया है। पश्चिमी यूपी की जनसंख्या 8 करोड़ बताई जाती है। यह मूल रूप से कृषि और किसानों के दबदबे वाला क्षेत्र है, जिसमें हिंदुओं में जाटों का प्रभाव बहुत ज्यादा रहा है। वह सामाजिक रूप से भी सक्षम हैं और चुनावी तौर पर भी बहुत प्रभावशाली हैं।
भाजपा को पश्चिमी यूपी से काफी उम्मीद
कृषि कानूनों के खिलाफ जो आंदोलन चला था, उसमें पश्चिमी यूपी का इलाका बहुत ही सक्रिय रूप से शामिल था। लेकिन, जब 2022 का चुनाव परिणाम आया तो आशंका के विपरीत बीजेपी के जाट वोट बैंक में विपक्ष ज्यादा सेंध नहीं लगा सका था।
ऐसे में जाटों के बीच केंद्रीय मंत्री की ओर से उन्हें ओबीसी आरक्षण का लाभ देने के प्रति सहानुभूति दिखाने के साथ-साथ जिस तरह से पूर्व पीएम चौधरी चरण सिंह, सर छोटी राम और राजा महेंद्र सिंह को भारत रत्न दिलाने की मांग उठाई गई है और नए संसद भवन में महाराजा सूरजमल का स्मारक लगाने का मुद्दा उठाया गया है, उससे स्पष्ट है कि भाजपा अपने इस वोट बैंक को नए सिरे से सहेजने का प्रयास कर रही है।












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