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Babri demolition anniversary: जब पिता-चाचा को दौड़ाकर मार दी गई थी गोली

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    अयोध्या। बाबरी मस्जिद को जिस तरह से 1992 में कारसेवकों ने गिरा दिया था, उसके बाद पूरे देश में हिंसक घटनाएं हुई, जिसमे कई लोगों की जान गई, साथ ही पूरे देश में सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया। इस घटना के 25 साल बाद भी लोगों के बीच इसकी वजह से एक दूसरे में विश्वास की कमी हुई है। इस घटना ने ना सिर्फ दो समुदायों को एक दूसरे से दूर किया बल्कि संविधान की मूल भावना को भी बहुत नुकसान पहुंचाया, जिसमे कहा गया है कि सभी समुदाय के लोगों को सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी। इस घटना को याद करते हुए इमाम हाजी अब्दुल गफ्फार के पोते मोहम्मद शाहिद ने अपना दर्द बयान किया।

    babri demolition

    दौड़ाकर मारी गई गोली

    मोहम्मद शाहिद के दादा ने 22 दिसंबर 1949 को पहली बार बाबरी मस्जिद में नमाज पढ़ाई थी। शाहिद बताते हैं कि उस वक्त एक हैवान भीड़ ने हमला कर दिया था और उनके पिता और चाचा को दौड़ाकर मौत के घाट उतार दिया था। शाहिद बताते हैं कि जब यह घटना हुई थी तो वह साईकिल से नौकरी की तलाश में घूम रहे थे। घटना को याद करते हुए शाहिद बताते हैं कि उस वक्त मेरी उम्र महज 22 वर्ष थी, हमारे घर को भीड़ ने अपना निशाना बनाया था, क्योंकि हमारा घर मुख्य रोड पर था।

    आक्रोशित भीड़ दौड़ा रही थी

    लोग चिल्लाते हुए आगे बढ़ रहे थे, उनमे काफी गुस्सा था, किसी ने भीड़ में बताया कि हमारा घर मुस्लिम का घर है, तभी मेरे पिता और चाचा वहां से भागने की कोशिश कर ने लगे, लेकिन भीड़ ने उनका पीछा किया और उन्हें मौत के घाट उतार दिया, साथ ही हमारी आरा मशीनो को आग लगा दिया, जिससे हमारे घर का गुजर बसर होता था, आरा मशीन में तमाम सागौन व शीशम की लकड़ियों को आग लगा दी, कुछ भी नहीं बचा, सबकुछ राख हो गया।

    कोर्ट के बाहर मामला सुलझाने की बात कहने वाले बिक गए

    घटना को याद करते हुए शाहिद कहते हैं कि परिवार को मुआवजे के तौर पर दो लाख रुपए मिले थे, हमारे घर में चार बहनें और छह भाई हैं। मैं घर में सबसे बड़ा हूं, मुझसे लोगों की उम्मीदें थीं कि मैं उनका भरण पोषण करूं, लेकिन हमारी आरा मशीनें जला दी गई, घटना के 25 साल बाद भी मैं लोगों से रोजगार मांगता हूं, मुझे यहां कुछ ही दिन काम मिल पाता है। वह कहते हैं कि जितना दुख मुझे मिला है उसकी वजह से अब मैं और मजबूत हो गया हूं और बाबरी मस्जिद पर दावा नहीं छोड़ुंगा, जो भी मुसलमान कोर्ट के बाहर मामले को सुलझाने की बात कर रहे हैं वह बिक चुके हैं, लेकिन मेरे लिए सम्मान सबकुछ है, मैं उसके बिना नहीं रह सकता हूं।

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    English summary
    Babri demolition anniversary: A Muslim man whos father and uncle was shot dead. He is forced t live a miserable life.

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