क्या मायावती को कमजोर आंकने की भूल कर रहे सभी राजनीतिक दल, जानिए 'बहनजी' की क्या रही है स्ट्रेंथ
लखनऊ, 11 जनवरी : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इस बार सभी राजनीतिक दल अपनी ताकत झोंके हुए हैं सिवाए मायावती के। बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने जिस अंदाज से चुनाव प्रसार शुरू किया उसको लेकर विपक्ष ने कई बार सवाल खड़े किए। कांग्रेस, सपा और बसपा सबने बसपा की सक्रियता को लेकर सवाल खड़ा किया। लेकिन मायावती की राजनीति का करीब से जानने वालों का मानना है कि यदि विपक्ष मायावती को कम आंक रहा है तो यह उनकी सबसे बड़ी भूल है क्योंकि दरअसल में वह उस 3% वोट को ढूंढने में लगी हैं, जिनसे UP की CM कुर्सी उनके हाथ में आ जाए। वह ऐसा आज से नहीं 1993 से करती आ रही हैं।

पहली बार बसपा को मिले 10% से ज्यादा वोट
1984 में बसपा का गठन हुआ। पार्टी दलित-पिछड़ों को एकजुट करने लगी। 9 साल बीत गए। बहुत बदलाव नहीं हुआ। पार्टी ने अपने वोटर तय किए। दलितों को एकजुट किया और 1993 में समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर अपनी शक्ति दिखा दी। उस चुनाव में बसपा 164 सीटों पर लड़ी और 67 सीटें जीत गई। पार्टी को 11.12% वोट मिले। मुलायम CM बने। 1 साल 181 दिन बीते थे तभी दोनों दलों के बीच मनमुटाव हुआ और बसपा ने समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी।

एक दशक बाद 20% के पास पहुंचा बसपा का वोट बैंक
1996 में दोबारा चुनाव हुए। मायावती के वोटर उनके साथ रहे। फिर से 67 सीटें मिली। वोट प्रतिशत 11% से बढ़कर 19.64% पहुंच गया। मायावती ने BJP को समर्थन देकर सरकार बना दी। पहले के 184 दिन CM रहीं। उसी सरकार में कल्याण सिंह, रामप्रकाश गुप्त और राजनाथ सिंह CM रहे। मायावती ने गठबंधन से नाता तोड़ लिया और अकेले चुनाव लड़ने का मन बना लिया। 2002 में मायावती ने 401 सीटों पर प्रत्याशी उतारे। 98 सीटों पर विधायक जीते। वोट प्रतिशत बढ़ते हुए 23.06% पहुंच गया। BJP और RLD ने बसपा को समर्थन देकर मायावती को CM बना दिया। एक साल बाद ही BJP-BSP में विवाद हो गया और गठबंधन टूट गया।

30% वोट के साथ 2007 में मिल गई सत्ता
2007 में मायावती का जादू चल गया। पार्टी को 30.43% वोट मिले। 206 सीटों के साथ पार्टी ने बहुमत के साथ सरकार बनाई। कानून व्यवस्था दुरुस्त की। कोर वोटर खुश हुआ, पर जो साथ आए थे वे नाराज होकर वापस चले गए। नतीजा ये रहा कि 2012 के चुनाव में पार्टी 25.95% वोटों के साथ 80 सीट पर आ गई। 2017 में स्थिति और खराब हुई। पार्टी को सिर्फ 19 सीटें मिलीं। वोट प्रतिशत 22.24% पर पहुंच गया। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटी ने आंकड़ा जारी किया है। मायावती जब 2007 में चुनाव जीती थीं उस वक्त 85% जाटव, 71% वाल्मीकि और 57% पासी जाति के लोगों ने वोट किया था। 2012 में जाटव 62%, पासी 51% साथ रहे, लेकिन वाल्मीकि वर्ग की तरफ से 42% वोट ही मिले। ये पहली बार था जब मायावती के कोर वोटर का उनसे ध्यान भंग हो गया।

सोशल इंजीनियरिंग में संघ ने मायावती को पीछे छोड़ा
बद्री नारायण प्रयागराज के गोविंद वल्लभ पंत सोशल साइंस इंस्टिट्यूट में प्रोफेसर हैं। उन्होंने 'रिपब्लिक ऑफ हिन्दुत्व' नाम से किताब लिखी। किताब में 'बदलती हुई दलित अस्मिता' का विश्लेषण करते हुए वह कहते हैं कि संघ अपनी सोशल इंजीनियरिंग में मायावती को पीछे छोड़ रहा है। बद्री नारायण बताते हैं कि संघ और BJP मिलकर नॉन जाटव दलितों को अपने इनक्लूसिव हिन्दुत्व एजेंडे से जोड़ रहे हैं। इसकी पुष्टि 2012, 2014, 2017 और 2019 के चुनाव में हुई।

अखिलेश ने निकाली विजय यात्रा
दरअसल अखिलेश यादव ने 17 नवंबर को गाजीपुर से अपनी 'विजय रथ यात्रा' शुरू की थी। तब से, वह विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों का दौरा करने और सार्वजनिक रैलियों को आयोजित करने में व्यस्त हैं। सपा प्रमुख भाजपा को निशाने पर ले रहे हैं और सत्ताधारी पार्टी द्वारा अपना दावा किए जा रहे सभी विकास कार्यों का श्रेय ले रहे हैं। उदाहरण के लिए, उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार 2012 और 2017 के बीच एक्सप्रेसवे और सड़कों पर हवाई जहाज उतारने पर उनकी सरकार के कार्यों की नकल कर रही है।

कांग्रेस भी यूपी में दिखा रही दम
21वीं सदी में अब तक हुए सभी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में चौथे नंबर पर रही कांग्रेस ने भी पैनिक बटन दबा दिया है. प्रदेश की प्रभारी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा भी पिछले कुछ समय से प्रदेश की राजनीति में लगातार सक्रिय रही हैं।वह लखीमपुर खीरी जैसी विभिन्न हिंसक घटनाओं के पीड़ितों से मिलने गईं, जहां तीन अक्टूबर को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष मिश्रा की कथित तौर पर एक एसयूवी के नीचे चार किसानों और एक पत्रकार को कुचल दिया गया था और एक दलित परिवार जिसके कई सदस्य थे।












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