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अपना दल: सोनेलाल पटेल की दो बेटियां अनुप्रिया और पल्लवी, यूपी की राजनीति में दो धुरविरोधी बहनों की सियासत

वाराणसी, 11 मार्च। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का परिणाम आ चुका है और भाजपा की एनडीए गठबंधन ने इस बार भी प्रचंड जीत हासिल की है। एनडीए गठबंधन में भाजपा की सहयोगी पार्टी अपना दल (सोनलाल) ने 12 सीटों पर जीत हासिल की है। अपना दल (सोनेलाल) की नेता हैं अनुप्रिया पटेल जो सांसद और मोदी सरकार में मंत्री भी हैं। अनुप्रिया पटेल कुर्मियों को संगठित करने वाले बसपा के संस्थापकों में से एक कद्दावर नेता सोनेलाल पटेल की बेटी हैं। सोनेलाल पटेल की एक और बेटी ने 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के सिंबल साइकिल पर चुनाव लड़कर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री और कद्दावर भाजपा नेता केशव प्रसाद मौर्य को हरा दिया। केशव मौर्य पर सात हजार से ज्यादा वोटों से जीत हासिल कर पल्लवी पटेल सुर्खियों में आ गई हैं। इस तरह से यूपी की राजनीति में अब सोनेलाल पटेल की दो बेटियों की धमक हैं जो पिता की राजनीतिक विरासत में हिस्सेदारी के लिए संघर्ष करते हुए एक-दूसरे की धुरविरोधी हो चुकी हैं। 2022 विधानसभा चुनाव में एक बहन भाजपा के साथ तो दूसरी बहन ने सपा का साथ दिया। हलांकि अनुप्रिया पटेल पिता की विरासत को लेकर यूपी से लेकर केंद्र तक अपनी धाक जमा चुकी हैं लेकिन देर से ही सही, बड़ी बहन पल्लवी पटेल ने भी कद्दावर केशव मौर्य को हराकर राजनीतिक पारी की शुरुआत कर दी है। आइए जानते हैं कि सोनेलाल पटेल ने कुर्मियों की सत्ता में भागीदारी के जिस सपने को लेकर संघर्ष किया था, वह कुर्मी वोटों पर उनकी दो बेटियों के दावों तक कैसे पहुंचा?

सोनेलाल पटेल ने कांशीराम से नाराज होकर बनाया था अपना दल

सोनेलाल पटेल ने कांशीराम से नाराज होकर बनाया था अपना दल

कांशीराम ने दलित, पिछड़ी और अतिपिछड़ी जातियों के संगठित करने के लिए बहुजन समाज पार्टी बनाई थी जिसमें कुर्मी नेता सोनेलाल पटेल ने भी साथ दिया था। सोनेलाल पटेल फिजिक्स में डॉक्टरेट थे। सोनेलाल पटेल ने इंदिरा गांधी शासनकाल के दौरान जयप्रकाश नारायण आंदोलन में भाग लिया था। सामाजिक न्याय की लड़ाई के लिए सोनेलाल पटेल ने पहले चौधरी चरण सिंह का साथ दिया और फिर बहुजन आंदोलन में कांशीराम से जुड़ गए। कांशीराम और सोनेलाल पटेल का साथ 1995 तक चला जब पार्टी में उन्होंने अपनी उपेक्षा होते देखी। यही वह साल था जब कांशीराम ने मुलायम का साथ छोड़कर भाजपा के साथ मिलकर मायावती को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया था। कांशीराम मायावती को सबसे ज्यादा तवज्जो देते थे। सोनेलाल पटेल ने प्रदेश के कुर्मी वोटबैंक को संगठित करने के लिए अपना दल बना लिया। पार्टी को मजबूत करने और कुर्मियों के बीच पैठ बनाने के लिए सोनेलाल पटेल ने कई सालों तक संघर्ष किया लेकिन वे खुद कभी चुनाव नहीं जीत सके। 2009 में सोनेलाल पटेल की एक दुर्घटना में मौत हो गई जिसके बाद अपना दल की कमान उनकी पत्नी कृष्णा पटेल ने संभाली। कृष्णा पटेल के साथ तीसरे नंबर की बेटी अनुप्रिया पटेल ने पिता की राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक संघर्ष शुरू किया। फिर भाजपा की मदद से अनुप्रिया पटेल ने प्रदेश की राजनीति में बड़ी सफलता पाई लेकिन इस सफलता ने मां और बेटी के बीच ऐसी दरार पैदा की जिसके बाद अपना दल दो दलों में बंट गया। अनुप्रिया पटेल का दल अपना दल सोनेलाल कहलाता है जबकि मां कृष्णा पटेल का दल अपना दल कमेरावादी के नाम से जाना जाता है। अब पल्लवी पटेल अपना दल कमेरावादी को मजबूत करने के लिए मां कृष्णा पटेल के साथ संघर्ष कर रही हैं और उनको 2022 के विधानसभा चुनाव में तब बड़ी सफलता मिली जब उन्होंने केशव मौर्य को हरा दिया।

अनुप्रिया पटेल प्रदेश से केंद्र की सियासत तक पहुंची

अनुप्रिया पटेल प्रदेश से केंद्र की सियासत तक पहुंची

2012 के विधानसभा चुनाव में वाराणसी के कुर्मी पटेल बहुल रोहनिया विधानसभा सीट से अनुप्रिया पटेल विधायक बनी थीं। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ गठबंधन कर अपना दल नेता अनुप्रिया पटेल मिर्जापुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद बन गई जिसके बाद उनको रोहनिया की विधायक सीट खाली करनी पड़ी। इसके बाद अपना दल के भीतर मां कृष्णा पटेल और बेटी अनुप्रिया पटेल के बीच राजनीतिक जंग शुरू हुई जिसका अंजाम ये हुआ कि पार्टी दो दलों में बंट गया। जब बेटी अनुप्रिया सांसद बनीं तो खाली हुई रोहनिया विधानसभा सीट से मां कृष्णा पटेल चुनाव लड़ना चाहती थी जबकि अनुप्रिया अपने पति आशीष पटेल को टिकट देने के पक्ष में थी। इसी को लेकर पार्टी में विवाद हुआ और आखिरकार मां कृष्णा पटेल ही उम्मीदवार बनीं। अनुप्रिया पटेल ने मां के लिए चुनाव प्रचार नहीं किया और ऐसा भी बताया जाता है कि मां के खिलाफ उन्होंने काम किया। कृष्णा पटेल वह उपचुनाव हार गईं। अनुप्रिया पटेल और आशीष पटेल को पार्टी से निकाल दिया गया। अनुप्रिया पटेल और मां कृष्णा पटेल के बीच अपना दल की विरासत को लेकर कानूनी लड़ाई छिड़ गई। फिलहाल अपना दल (सोनेलाल) अनुप्रिया पटेल की पार्टी है जबकि मां कृष्णा पटेल की पार्टी का नाम अपना दल कमेरावादी है।

पल्लवी पटेल ने केशव को हराकर दिखाई ताकत

पल्लवी पटेल ने केशव को हराकर दिखाई ताकत

यूपी की आबादी में करीब 11 प्रतिशत कुर्मी मतदाता हैं। प्रदेश में 16 जिलों में कुर्मी मतदाताओं की अच्छी खासी संख्या है जो चुनाव परिणाम को प्रभावित करते हैं। इनकी राजनीतिक ताकत को भांपकर ही सोनेलाल पटेल ने जो कोशिश शुरू की थी उसका नतीजा है कि आज उनकी दो बेटियां यूपी की सियासत में हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने अपना दल के साथ गठबंधन कर कुर्मी वोटबैंक को अपने पक्ष में करने का समीकरण बनाया था जो सफल हुआ। अनुप्रिया पटेल सांसद बन गईं। 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में अपना दल सोनेलाल ने 9 सीटें जीत लीं और अब 2022 के चुनाव में उसकी सीटें बढ़कर 12 हो चुकी हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी अनुप्रिया पटेल जीतीं और पार्टी ने रॉबर्ट्सगंज सीट भी जीत लिया। भाजपा का दामन थामकर एक तरफ अनुप्रिया पटेल सत्ता की सीढ़ियां चढ़ती चली गई लेकिन इस संघर्ष में उनकी मां कृष्णा पटेल पिछड़ गईं। अपना दल कमेरावादी नेता कृष्णा पटेल और बेटी पल्लवी पटेल ने 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा का हाथ थामा। हलांकि पार्टी को एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई। कृष्णा पटेल भी चुनाव हार गईं लेकिन बेटी पल्लवी पटेल ने सपा के टिकट पर केशव प्रसाद मौर्य को हराकर अपनी ताकत दिखा दी है। सिराथू में बेटा बनाम बहू की लड़ाई में पल्लवी ने बाजी मारी। कौशांबी में पल्लवी पटेल की ससुराल है। सोनेलाल पटेल की राजनीतिक विरासत की दावेदारी को इस जीत के जरिए पल्लवी पटेल अब आगे बढ़ा सकती हैं और बहन अनुप्रिया पटेल के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं।

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