समंदर निगल रहा मछुआरों की जिंदगियां

कैमरून, इक्वाटोरियल गिनी, नाइजीरिया, टोगो और बेनिन समेत घाना की सीमा को छूती गिनी की खाड़ी मछली उद्योग के अलावा समुद्री व्यापार का बड़ा मार्ग है. गिनी की खाड़ी के किनारे बसे देशों में समुद्र का पानी इंसानी बसेरों को निगलने लगा है. इसके एक शिकार घाना के पीटर अकोर्ली भी हैं. उनके पास जो कुछ भी था, सब समुद्र ने निगल लिया है.
अब जब पीटर अकोर्ली लहरों की ओर देखते हैं तो उन्हें वह जगह दिखती है, जिसे वह कभी घर कहा करते थे. उन्हें विस्थापित हुए एक साल होने को आया, लेकिन दुख अब तक कम नहीं हुआ है. पीटर कहते हैं, "मैंने आठ कमरे, एक रसोई, एक शौचालय और एक बाथरूम वाला घर खो दिया है. आज मेरे घर की जगह गहरा समुद्र है."

घाना में संकट विकराल
लगातार आने वाले समुद्री ज्वार ने घाना के फुवेमे जैसे समुदायों पर कहर बरपाया है. घर, स्कूल और सामुदायिक केंद्र, सब बह गए हैं और सैकड़ों लोग विस्थापित हो गए हैं. घाना की तट रेखा 500 किलोमीटर से ज्यादा लंबी है. देश की करीब एक चौथाई आबादी समुद्र के किनारे रहती है. यूनेस्को के एक अध्ययन के मुताबिक, घाना के पूर्वी तट की करीब 40 प्रतिशत जमीन 2005 से 2017 के बीच कटाव और बाढ़ की भेंट चढ़ चुकी है.
विनाश बहुत तेजी से हो रहा है. इससे पर्यावरण और तट विशेषज्ञ चिंतित हैं. घाना विश्वविद्यालय में प्रोफेसर क्वासी अपीनिंग अडो कहते हैं कि "समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है और जब जल स्तर बढ़ता है तो उससे जुड़ी अन्य समस्याएं भी पैदा होती हैं. जैसे तटीय कटाव और बाढ़. साथ ही हम खारे पानी की समस्या पर भी बात कर सकते हैं, जो इस क्षेत्र में खेती को प्रभावित कर सकती है."
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दोष इंसानों का भी
घाना के तटीय क्षेत्र वोल्टा में फुवेमे, कीटा और ऐसे ही 15 समुदाय कभी फलते-फूलते मछुआरों के गांव हुआ करते थे. उस पर समुद्री कटाव की मार पड़ी है. अब स्थानीय बाजारों में बिक्री के लिए नाम मात्र की मछलियां बची हैं. अन्य खाद्य सामग्री भी कम हुई है. खेती की जमीन पर समुद्र का पानी कब्जा कर रहा है. तटीय कटाव की वजह सिर्फ जलवायु परिवर्तन नहीं है.
वजह मानवीय गतिविधियां भी हैं, जैसे भूजल का अत्यधिक दोहन भी बढ़ा है. रेत का खनन भी एक समस्या है जिसमें स्थानीय लोग भवन निर्माण के लिए समुद्र तट से अवैध तरीके से रेत निकालते हैं. कुछ समुदायों ने इस पर प्रतिबंध लगाए हैं लेकिन अब भी यह जारी है. मैंग्रोव जंगल, तट और जलीय जीवन को बचाने में अहम भूमिका निभाते हैं. लेकिन ईंधन के लिए इन्हें काटा जा रहा है.

स्थानीय लोगों को ऐसी गतिविधियों से चिंता है और वे इन पर रोक लगाना चाहते हैं. तटीय गांव आन्यानुइ में समुदाय के नेता गेरशोन सेन्या अवूसाह कहते हैं, "हमें कुछ करना होगा क्योंकि घटनाएं हमारे पास घट रही हैं. हमारे बिना तो कुछ नहीं हो सकता. क्योंकि कहीं बाहर से कोई कुछ करने भी आएगा भी तो उसे लागू तो हमें ही करना होगा. मसलन, रेत खनन को ही लीजिए. अगर यहां के लोग नहीं रुके तो समस्याएं हमें ही होंगी."
वैज्ञानिकों की राय
घाना विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग में पिछले दो साल से तटीय इलाकों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन हो रहा है. विशेषज्ञ मछली, पानी और पौधों के नमूने लेते हैं. वे कहते हैं कि तटीय कटाव से ना सिर्फ तट को नुकसान पहुंच रहा है बल्कि आसपास रहने वाले लोगों की सेहत और जंगली जीवों को भी खतरा पैदा हो गया है.
घाना विश्वविद्यालय के आईईएसएस प्रोजेक्ट के मुख्य शोधकर्ता डॉ. जीजो यिरेन्या-ताविया कहते हैं, "अगर मैं कीटा (स्थानीय नगर परिषद) की बात करूं तो वहां रेत निकाला जा रहा है. वे जो कर रहे हैं उससे समुद्र का पानी ज्यादा मात्रा में जमीन की ओर आता है और बाढ़ लाता है. लोगों की सेहत के लिहाज से देखा जाए तो जब पानी आता है तो घरों में साफ-सफाई की व्यवस्था को खत्म कर देता है और पेयजल स्रोतों को संक्रमित करता है."

भविष्य कैसा दिख रहा?
समुद्र के बढ़ते जल स्तर से लोगों को बचाने के लिए सरकार ने किनारों पर पत्थर की दीवारें बनाई हैं. लेकिन सरकार का कहना है कि पूरे तट को सुरक्षित करने के लिए जरूरी धन नहीं है. जल स्तर के और बढ़ने की आशंकाओं के बीच पीटर अकोर्ली उनके आसपास रहने वाले लोग हमेशा डर में जीते हैं. वह तो दोबारा घर बनाने की उम्मीद भी खो चुके हैं. वह कहते हैं, "हमें अब भी डर लगता है क्योंकि समुद्र हमसे बस हाथ भर की दूरी पर है. हमें नहीं पता, क्या करें. हम ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि इस मुसीबत से हमें निकाले."

पीटर अकोर्ली समेत इस गांव के तीन सौ से ज्यादा परिवार अस्थायी घरों में रह रहे हैं. वे मछुआरे हैं इसलिए और ज्यादा दूर नहीं जाना चाहते. वे तट नहीं छोड़ सकते क्योंकि वहीं उनकी रोजी-रोटी है. लेकिन जब बाढ़ लौटेगी, तो उनके पास जो थोड़ा बहुत बचा है, वो भी बहा ले जा सकती है.
रिपोर्ट: आइजैक कलेजी
Source: DW
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