ये हैं 105 बरस के सत्याग्रही प्रभुदादा, गांधीजी ने पीया इनकी गायों का दूध, बिना चश्मा पढ़ लेते हैं अखबार
सूरत। जिन लोगों के जीवनकाल में हमें अंग्रेजों से आजादी मिली, ऐसे अनेक लोग देश में आज भी जिंदा हैं। इन लोगों ने क्रांतिकारियों एवं राष्ट्रपिता का साथ देते हुए आंदोलनों में योगदान दिया था। गुजरात में सूरत से कुछ किलोमीटर स्थित भीमराड गांव के रहने वाले प्रभुभाई आहिर ऐसे ही एक शख्स हैं..जिन्होंने गांधीजी की कई दफा मदद की। गांधीजी ने उनकी गायों का दूध पीया और अपने पड़ाव पूरे किए। अब प्रभुभाई आहिर 105 बरस के हो चुके हैं और भतीजे के पोते के साथ रहते हैं। वे ज्यादा चल फिर नहीं पाते, लेकिन आज भी बिना चश्मा पहने अखबार पढ़ लेते हैं। गांव के लोग उन्हें प्यार से प्रभुदादा कहकर बुलाते हैं। प्रभुभाई आजादी मिलने से कई सालों पहले की अपनी यादों के बारे में बहुत सी बातें बताते रहते हैं।

सत्याग्रहियों की छावनी बनी थी, वहां अंग्रेजों से टक्कर ली
प्रभुभाई ने बताया कि, "गांधीजी ने 1930 में जो दांडी यात्रा और नमक सत्याग्रह किया था, उस समय हमारी उम्र 13-14 वर्ष थी। हमारा परिवार तब भीमराड़ गांव में ही रहता था। महात्मा गांधी द्वारा साबरमती से दांडी यात्रा शुरू किए जाने पर भीमराड के लोगों ने भी सत्याग्रह के लिए कमर कस ली थी और नमक कानून का उल्लंघन शुरू कर दिया था। तब लोग अपने हाथों में नमक की पोटलियां उठाकर अंग्रेज सिपाहियों व अधिकारियों को दिखाते और विरोध जताते थे। अंग्रेजों का विरोध जताने के दौरान उन दिनों भीमराड़ सत्याग्रहियों की छावनी बन गया था।'

इनके गांव से होकर निकली थी यात्रा
प्रभुभाई के मुताबिक, गांधीजी 9 अप्रैल 1930 को दांड़ी से भीमराड़ लौटे थे। तब उन्होंने भीमराड़ में बहुत से गांव-कस्बों से जुटे लोगों की विशाल जनसभा को संबोधित किया था। अंग्रेज गांधीजी की संतानों को कैद कर ले गए थे। हालांकि, गांधीजी ने आंदोलन जारी रखा।' प्रभुभाई कहते हैं कि, "मैंने भीमराड में पड़ाव के दौरान गांधीजी को दूध पिलाया। उस समय हमारा परिवार भीमराड में रहता था, लेकिन खेती की पुश्तैनी जमीन खजोद गांव में भी थी। तो हम रोजाना खजोद जाते थे और वहां खेत व तबेले से कावड़ में दूध लेकर भीमराड़ आते थे। गांधीजी मिले, तो हमने उन्हें दूध पिलाया। उन्होंने हमारे सिर पर हाथ रखा और प्रशंसा की।"

7 बीघा में 14 बीघा बराबर कपास पैदा की थी
बकौल प्रभुभाई, "हमने कभी अपने कर्तव्य से मुंह नहीं मोड़ा। अपनी 15-20 गायों और 7 बीघा जमीन में जी-जान से जुटे रहते थे। अंग्रेजी हकूमत के उत्पाद इस्तेमाल नहीं करते थे, बल्कि अपनी बनाई जैविक खाद का उपयोग करते थे। गांधीजी कहते थे कि, कपास की खेती किया करें। हमने अपने 7 बीघा में 14 बीघा बराबर कपास पैदा कर दिखा दी थी। ये देखकर अन्य किसानों ने दांतों तले उंगली दबा ली।"

अपनी कोई संतान नहीं, भाई के हैं प्रपौत्र
प्रभुभाई की शादी उनसे एक साल बड़ी लड़की से हुई थी। जिसका नाम कंकुबेन था। कंकुबेन का वर्ष 2014 में निधन हो गया। चूंकि, प्रभुभाई अकेले पड़ गए, ऐसे में उन्होंने खजोद स्थित अपने घर में अकेले ही रहना शुरू कर दिया। अब तक, उनके भाई बहनों ही नहीं बल्कि उनकी संतानों का भी देहांत हो चुका है। उनकी अपनी कोई संतान नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षो से उनके दिवंगत भतीजे किकाभाई के पुत्र व उनके प्रपौत्र किशोरभाई अपनी पत्नी व बच्चों के साथ उन्हें संभालते हैं।
अपनी कहानियां सुनाते रहते हैं
किशोरभाई का कहना है कि, प्रभूदादा के दांत तो 60 वर्ष की उम्र में ही गिर गए थे, लेकिन आज भी उनके मसूड़े इतने मजबूत हैं कि खाना आराम से खा लेते हैं। उन्होंने कहा कि, पिछले 10 वर्षों में दादा की कमर झुक गई है और चल फिर नहीं पाते। हालांकि, वे अपनी कहानियां सुनाते रहते हैं।












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