हिंसा के शिकार कश्मीर में बर्बाद हो रहा नौनिहालों का जीवन

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श्रीनगर। 45 दिन से ज्यादा बीत चुके हैं लेकिन जम्मू और कश्मीर के कुछ हिस्सो में न तो हिंसा रुकने का नाम ले रही है और न ही कर्फ्यू के खत्म होने की कोई खबर आ रही है।

 Srinagar

ऐसे में उन नौनिहालों का जीवन बर्बाद होने की ओर है जो सामान्य दिनों में स्कूल जाने के लिए सुबह तैयार होते थे।

6 साल की देयम हर रोज अपना स्कूल बैग तैयार कर स्कूल जाते थे लेकिन अब कोई अब उसे स्कूल नहीं जाना है। बीते 45 दिनों से श्रीनगर के स्कूल और कॉलेज बंद हैं। इसकी वजह से बच्चे अब चिड़चिड़े और गुस्सैल हो चले हैं।

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मजबूर हैं माता पिता

संकट से जूझ रहे आधे जम्मू और कश्मीर के बच्चों के माता पिता मजबूर हैं और उनके पास अपने बच्चों की चिंता का कोई हल नहीं है।

देयम के पिता सैयद कहते है कि वो अपने वो अपने दोस्तों और शिक्षकों को याद करता है। मैं उसकी क्षतिपूर्ति नहीं कर पाउंगा जो देयम खो रहा है।'

सैयद बताते हैं कि कर्फ्यू के चलते देयम पास के पार्क में खेलने भी नहीं जा पाता जो सबसे ज्यादा दुखद है।

फ्यूचर खराब हो गयाा

श्रीनगर में ही स्टोल और स्कार्फ की दुकान चलाने वाले गुलाम मोहिउद्दीन ने बताया मेरे दो बच्चे हैं। पहला फर्स्ट ईयर में है और दूसरा क्लास 8 में।

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गुमैंने उन्हें कैरम बोर्ड और बैडमिंटन रैकेट खरीद कर दिए हैं लेकिन एक 52 साल का पिता कब तक अपने बच्चों को बेचैन देख सकेगा।'

डिप्रेशन में है बेटा

गुलाम को सबसे ज्यादा चिंता इस बात की है कि 'कहीं हिंसा उनके जवान बच्चों को अपने प्रभाव में न ले ले। उन्होंने बताया कि उनका व्यवहार बहुत ही बदल गया है। बड़ा बेटा डिप्रेशन में है और वो कहता है कि 'फ्यूचर खराब हो गया।' बाहर जो हो रहा है वो उससे प्रभावित हो रहे हैं और इसी के चलते मैं सबसे ज्यादा डरा हुआ हूं।'

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गुलाम इस बात पर भी जोर देते हैं कि जो बच्चे दिल्ली, चंडीगढ़, अलीगढ़, बैंगलोर और जहां कहीं भी पढ़ने गए हैं उन पर भी हमले की खबर आती है। हमारे बच्चों के लिए कहीं सुरक्षा नहीं है।'

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब कश्मीर में बच्चों का स्कूल इतने दिनो तक सस्पेंड रहा हो। बच्चों के अभिभावक इस बात से भी वाकिफ हैं कि यह आखिरी नहीं है। इससे पहले 2010 में क्लासेज 100 दिन के लिए सस्पेंड हुई थी।

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English summary
Their is no school form last 45 days in jammu and kashmir due to kashmir unrest after death of burhan wani.
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