शास्त्री-कोहली की जोड़ी ने क्या अन्याय नहीं किया ? आधा सच ही क्यों लिखा विनोद राय ने ?
नई दिल्ली, 05 अप्रैल। आइएएस अधिकारी विनोद राय ने अपनी किताब ( नॉट जस्ट ए नाइटवाचमैन : माय इनिंग्स इन बीसीसीआइ ) में जो खुलासे किये उससे कोहली-कुंबले का विवाद एक बार फिर चर्चा में है। सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को संचालित करने के लिए प्रशासकों की एक समिति बनायी थी। पूर्व नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) विनोद राय को इस समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। उनके कार्यकाल में ही कोहली-कुंबले विवाद सामने आया था। कई खेल जानकारों का मानना है कि विनोद राय ने इस विवाद को सुलझाने में उस योग्यता का परिचय नहीं दिया था जिसकी उनसे उम्मीद की जा रही थी।

सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआइ की कार्यशैली को पारदर्शी बनाने और उत्तरदायी बनाने के लिए ही प्रशासकों की समिति बनायी थी। लेकिन इसके बाद भी राजनीति खत्म नहीं हुई थी। विनोद राय ने कोहली के हवाले से लिखा है, टीम के युवा सदस्य कुंबले से डरे रहते थे। कुंबले अनुशासन के मामले में बहुत सख्त थे और टीम के सदस्य इससे खुश नहीं थे। विनोद राय के कहने का मतलब क्या है ? अगर कोई प्रशिक्षक बेहतर नतीजों के लिए अनुशासन का कड़ाई से पालन करता है तो क्या वह गलत है ? दरअसल विनोद राय ने आधा सच ही बयान किया जिससे कुंबले जैसे महान खिलाड़ी की छवि धूमिल हुई है। वास्तव में कोहली को अपने से ज्यादा सफल खिलाड़ी कुंबले से 'इगो' की समस्या थी।

अनिल कुंबले और रवि शास्त्री
619 टेस्ट विकेट लेने वाले अनिल कुंबले दुनिया के चौथे सबसे सफल गेंदबाज हैं। 2017 में उन्हें टीम इंडिया का हेड कोच बनाया गया था। इसके पहले रवि शास्त्री टीम इंडिया के डायरेक्टर थे। जब रवि शास्त्री डायरेक्टर थे तब उनकी कप्तान कोहली से गाढ़ी छनने लगी थी। कहा जाता है कि रवि शास्त्री वही करते थे जो कप्तान विराट कोहली चाहते थे। दोस्ती बढ़ी तो अनुशासन के बंधन ढीले पड़ते गये। चूंकि टीम नतीजे दे रही थी इसलिए किसी ने इस दोस्ती पर सवाल नहीं उठाया। लेकिन ऐसे में जब कुंबले ने शास्त्री की जगह ली तो सारी स्थिति बदल गयी। जानकारों का कहना है कि कोहली, शास्त्री के जाने और कुंबले के आने से खुश नहीं थे। रही सही कसर अनुशासन ने पूरी कर दी।

नियम के पक्के कुंबले
2016 में भारतीय टीम को वेस्टइंडीज के दौरे पर जाना था। तैयारी के लिए शिविर लगा था। कोच कुंबले प्रैक्टिस में कोई रियायत नहीं देना चाहते थे। उन्होंने अभ्यास सत्र के लिए कड़े नियम बना रखे थे। टीम मीटिंग या अभ्यास के लिए अगर कोई खिलाड़ी देर से पहुंचता तो उसे 50 डॉलर का जुर्माना देना होता था। हर चौथे दिन टीम मीटिंग जरूरी थी। वे नियम के मामले में बड़े और छोटे खिलाड़ी से एक जैसा सुलूक करते थे। कोहली जो अब तक आजाद तबीयत के मालिक थे वे अनुशासन के बंधन में असहज महसूस होने लगे। हालांकि फिटनेस को लेकर वे खुद मुस्तैद रहते थे लेकिन कुबंले के नियम उन्हें कड़े लगते थे। कुंबले की टोका-टोकी उन्हें पसंद नहीं थी। दोनों के बीच तनातनी बढ़ती गयी। मार्च 2017 में कुंबले की बात से कोहली का इगो और हर्ट हुआ था।

कोहली ने की थी कोच की शिकायत
जून 2017 में चैम्पियंस ट्रॉफी प्रतियोगिता थी। इंग्लैंड में आयोजन था। इस प्रतियोगिता के ठीक पहले कोहली ने धमाका कर दिया। उन्होंने क्रिकेट बोर्ड के सीइओ से कुंबले की शिकायत कर दी। बात यहीं से बिगड़नी शुरू हो गयी। क्या कोहली ने कोच की शिकायत कर अनुशासन भंग नहीं किया था ? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। उस समय क्रिकेट सलाहकार समिति में सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण जैसे तीन दिग्गज थे। इन तीनों ने इस विवाद को सुलझाने के लिए कोहली और कुबंले से अलग अलग बात की। लेकिन कोहली, कुंबले के खिलाफ डटे रहे। उन्होंने आरोप लगाया कि कुबंले अपनी सीमा का अतिक्रमण कर उनके काम में दखल देते हैं। विनोद राय अपनी किताब में लिखते हैं, लंदन में कोहली और कुबंले से बात करने के बाद क्रिकेट सलाहकार समिति ने कुबंले को फिर हेड कोच बनाने का फैसला लिया था। फिर कुबंले ने इस्तीफा क्यों दिया ? अगर शिकायत से आहत कुबंले दोबारा हेड कोच नहीं बनना चाहते थे तो फिर किसी दूसरे अनुभवी खिलाड़ी को क्यों नहीं इस पद पर लाया गया ? रवि शास्त्री कैसे हेड कोच के पद पर आ गये ? हेड कोच के रूप में रवि शास्त्री का सालाना वेतन करीब 7 करोड़ रुपये तय हुआ था। इतनी मोटी तनख्वाह पर किसी व्यक्ति को लाने में क्या कोहली की भी कोई भूमिका थी ? यह भी एक बड़ा सवाल है। कुछ लोगों का आरोप है कि शास्त्री अपना कार्यकाल सुरक्षित रखने के लिए कोहली की तरफदारी करते थे।

क्या कोहली-शास्त्री की जोड़ी ने न्याय किया था ?
2019 में विश्वकप प्रतियोगिता के लिए जो टीम चुनी गयी उसमें कोहली और शास्त्री की जोड़ी ने अंबाती रायडू के साथ क्या किया था ? क्या रायडू के साथ अन्याय नहीं हुआ था ? घरेलू प्रतियोगिता में अच्छे प्रदर्शन के बाद माना जा रहा था कि रायडू को विश्वकप के लिए जरूर चुना जाएगा। उन्हें नम्बर चार के लिए उपयोगी बल्लेबाज माना जा रहा था। लेकिन विश्वकप के लिए उनका चयन नहीं हुआ। उनकी जगह विजय शंकर को चुना गया। यहां तक कि जब शिखर धवन और विजय शंकर घायल हो गये तब भी अंबाती रायडू को मौका नहीं दिया। इससे आहत हो कर रायडू ने क्रिकेट सं संन्यास लेने की घोषणा कर दी थी। बल्लेबाजी में नम्बर चार की समस्या के कारण ही भारत सेमीफाइनल से आगे नहीं बढ़ पाया था। ये अजीब बात थी कि विश्वकप टीम में धोनी, पंत और दिनेश कार्तिक के रूप में तीन विकेटकीपर चुने गये थे। लेकिन रायडू को नहीं चुना गया था। जब शास्त्री हेड कोच के पद से हटे थे तब उन्होंने कहा था कि रायडू या अय्यर को विश्वकप में मौका जरूर देना चाहिए था। टीम के चयन में चयनकर्ताओं के अलावा कप्तान का भी हाथ होता है। तब शास्त्री ने ये बात कोहली को क्यों नहीं बतायी थी ? जब रायडू ने क्रिकेट से संन्यास लिया था तब सोशल मीडिया पर लोगों ने कोहली को ड्रामेबात तक कहा था। शास्त्री ने अश्विन जैसे दिग्गज गेंदबाज के आत्मबल को भी तोड़ने की कोशिश की थी। आज अश्विन की कामयाबी, शास्त्री को गलत साबित कर रही है।

इगो प्रोब्लेम
मार्च 2017 में भारत और आस्ट्रेलिया के बीच धर्मशाला में टेस्ट मैच था। अनिल कुंबले कोच थे। कप्तान कोहली चोट के चलते इस मैच में नहीं खेल रहे थे। उनकी जगह अंजिक्य रहाणे कप्तानी कर रहे थे। प्लेइंग इलेवन के चयन के समय कोहली ने कहा कि उनके स्थान पर किसी बल्लेबाज को ही खेलना चाहिए। लेकिन कुंबले पिच का अंदाजा लगा कर किसी गेंदबाज को मौका देने चाहते थे। कुंबले ने रहाणे के साथ रायविचार कर कुलदीप यादव को इस मैच में मौका दिया। कोहली को यही लगा कि उनकी बात नहीं मानी गयी। मैच हुआ तो कुलदीप ने पहली पारी में शानदार गेंदबाजी की और चार विकेट लिये। कुंबले का फैसला सही साबित हुआ। ड्रेसिंग रूम में जब कुबंले की तारीफ होने लगी तो उन्होंने सहज भाव से कह दिया कि आखिर अनुभव भी कुछ मायने रखता है। कुंबले की ये बात कोहली को अखर गयी। कोहली जैसे दिग्गज बल्लेबाज को अपनी बात की हेठी अच्छी नहीं लगी। विनोद राय की किताब ने मंद पड़ चुकी इस चिंगारी को फिर हवा दे दी है।
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