'अगले ओलंपिक में पूरी करेगा कमी,' पोते के ब्रॉन्ज जीतते ही भावुक हुए अमन के दादा! देश से कर दिया एक और वादा
Aman Sehrawat Won Bronze: अमन सेहरावत ने व्यक्तिगत ओलंपिक पदक जीतने वाले सबसे कम उम्र के भारतीय बनकर इतिहास रच दिया है। मात्र 21 साल की उम्र में भारत के लाल ने कुश्ती में ब्रॉन्ज मेडल जीत लिया, जो इस खेल में भारत के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
सेहरावत का इस मुकाम तक का सफ़र किसी प्रेरणा से कम नहीं रहा है। उन्होंने कम उम्र में ही कुश्ती शुरू कर दी थी और अपनी प्रतिभा और दृढ़ संकल्प का परिचय देते हुए जल्दी ही इस खेल में आगे बढ़ गए। खेल के प्रति उनके समर्पण ने इस उल्लेखनीय उपलब्धि के रूप में उन्हें पुरस्कृत किया है।

अमन सहरावत के मेडल जीतने के बाद परिजनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अमन के दादा-दादी ने अन्य परिजनों के साथ जमकर उत्साह मनाया। मालूम हो कि अमन सहरावत की मां कमलेश की हार्ट अटैक से और पिता की पत्नी के सदमे से मौत हो गई थी। उसके बाद सभी परिजनों ने ही अमन की परवरिश की है। दादा को अमन में अपने बेटे की छवि नजर आती है।
दादा ने कर दिया देश से गोल्ड का वादा
अमन के दादा मांगेराम ने कहा कि पोता गोल्ड मेडल से चुका, लेकिन ब्रॉन्ज मेडल ले आया। हम बहुत खुश हैं। गोल्ड मेडल की कमी को पोता अगले ओलंपिक में पूरा करेगा। हमें बहुत अच्छा लग रहा है।
अमन के भाई की खुशी का नहीं रहा ठिकाना
अमन के भाई ने कहा कि पेरिस ओलंपिक टिकट क्वालीफाई होते ही उसने परिवार वालों से वादा किया था कि वह मेडल जीतकर ही वापस लौटेगा। हालांकि अमन ने गोल्ड मेडल का वादा किया था, लेकिन जिन भी कारणों से वह गोल्ड मेडल से चुका, अब उसकी भरपाई ब्रॉन्ज मेडल से हो गई है। मेडल आना ही हमारे लिए खुशी की बात है।
मौसी ने अमन की परवरिश में नहीं आने दी कमी
दरअसल, अमन को उनके माता-पिता के निधन के बाद मौसी सुमन देवी ने ही पाला और मां की तरह ही बेटे का ध्यान रखा। अमन के मैच जीतने के बाद मौसी की आंखों में भी खुशी के आंसू साफ झलक रहे थे। इस मौके पर वे अमन के स्वर्गीय माता-पिता की फोटो दिखातीं नजर आईं।
डेरियन क्रूज को 13-5 से हराकर जीता ब्रॉन्ज
पेरिस ओलंपिक में शुक्रवार को बिरोहड़ गांव के लाडले अमन सहरावत ने प्यूर्टो रिको के रेसलर डेरियन क्रूज को 13-5 से हराकर मेडल और दिल जीत लिया है। हरियाणा में जन्मे सेहरावत को कुश्ती से उनके पिता ने परिचित कराया, जो खुद भी पहलवान थे। उन्होंने स्थानीय अखाड़ों (कुश्ती स्कूलों) में प्रशिक्षण लेना शुरू किया और जल्द ही अपनी स्वाभाविक क्षमता और कड़ी मेहनत से कोचों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया। उनके शुरुआती प्रशिक्षण ने उनकी भविष्य की सफलता के लिए एक मजबूत नींव रखी।
कुश्ती के प्रति सहरावत की प्रतिबद्धता ने उन्हें बेहतर प्रशिक्षण सुविधाओं के लिए दिल्ली आने पर मजबूर कर दिया। अनुभवी प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में उन्होंने अपने कौशल को निखारा और विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लिया, जिससे एक बेहतरीन पहलवान के रूप में उनकी प्रतिष्ठा लगातार बढ़ती गई।
ओलंपिक तक पहुंचने से पहले की उपलब्धियां
ओलंपिक में अपनी जीत से पहले ही सहरावत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना ली थी। उन्होंने जूनियर विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता और एशियाई प्रतियोगिताओं में कई मेडल जीते। इन जीतों ने न केवल उनका आत्मविश्वास बढ़ाया बल्कि उन्हें भारत के टॉप कुश्ती खिलाड़ियों में से एक के रूप में स्थापित किया।
इन प्रतियोगिताओं में उनके प्रदर्शन ने राष्ट्रीय चयनकर्ताओं का ध्यान आकर्षित किया, जिससे उन्हें टोक्यो ओलंपिक के लिए भारतीय कुश्ती टीम में जगह मिली। टीम के सबसे युवा सदस्यों में से एक होने के बावजूद, सहरावत का दृढ़ संकल्प और कौशल उन्हें अपने साथियों से अलग करता है।
टोक्यो ओलंपिक में, सहरावत को दुनिया भर के अनुभवी पहलवानों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा। हालांकि, वह अपने पूरे मुकाबलों में केंद्रित रहे और असाधारण तकनीक का प्रदर्शन किया। उनका सफ़र एक रोमांचक कांस्य पदक मैच में समाप्त हुआ, जहां उन्होंने जीत हासिल की और भारतीय खेल इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया।
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जीत के बाद सहरावत ने कहा कि, 'ओलंपिक पदक जीतना एक सपने के सच होने जैसा है। मैंने इस पल के लिए कड़ी मेहनत की है, और मैं अपने परिवार, कोच और फैंस से मिले सपोर्ट के लिए आभारी हूं।' सहरावत ने आगे कहा कि, 'यह तो बस शुरुआत है। मैं खुद को आगे बढ़ाना चाहता हूं और कुश्ती में और भी ऊंचाइयां हासिल करना चाहता हूं।'












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