प्यार में मिट गई सरहदें, बिना वीजा भारत में घुसा पाकिस्तानी क्रिकेटर, अधूरी मोहब्बत और पत्नी की हो गई मौत
क्रिकेट के मैदान पर अपनी रफ्तार और स्विंग से दुनिया के बड़े-बड़े बल्लेबाजों के पसीने छुड़ाने वाले वसीम अकरम (Wasim Akram) ने जिंदगी में कई जंग जीतीं, लेकिन एक जंग ऐसी थी जिसे वो भारत की धरती पर हार गए। यह कहानी किसी मैच की नहीं, बल्कि उनकी पत्नी हुमा अकरम की जिंदगी और मौत के बीच की उस जद्दोजहद की है, जिसे सुनकर आज भी आंखों में आंसू आ जाते हैं।
तारीख थी 20 अक्टूबर 2009, वसीम अकरम की पत्नी हुमा की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई। उन्हें एयर एम्बुलेंस के जरिए लाहौर से सिंगापुर ले जाया जा रहा था। हुमा के शरीर के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। रास्ते में विमान को चेन्नई में ईंधन भरने के लिए रुकना था। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

चेन्नई एयरपोर्ट पर बेबस 'सुल्तान ऑफ स्विंग'
जैसे ही एयर एम्बुलेंस चेन्नई पहुंची, हुमा की हालत और बिगड़ गई। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाने की जरूरत थी, लेकिन एक बहुत बड़ी बाधा सामने थी- वीजा! वसीम और उनकी पत्नी के पास भारत का वीजा नहीं था।
अकरम ने सालों बाद एक इंटरव्यू में उस खौफनाक मंजर को याद करते हुए कहा था, "मैं चेन्नई एयरपोर्ट पर खड़ा रो रहा था। मेरी पत्नी बेहोश थी और हमारे पास पासपोर्ट पर कोई स्टैम्प नहीं था। मुझे लगा सब खत्म हो गया।"
भारतीय अधिकारियों की दरियादिली
उस समय जो हुआ, वह भारत-पाकिस्तान के रिश्तों के इतिहास में इंसानियत की सबसे बड़ी मिसाल है। वसीम की बेबसी देखकर चेन्नई एयरपोर्ट के सुरक्षाकर्मियों और इमिग्रेशन अधिकारियों ने नियमों की बेड़ियां तोड़ दीं।
अधिकारियों ने वसीम से बस इतना कहा, "पाजी, आप वीजा की चिंता मत कीजिए। आप अपनी पत्नी को अस्पताल लेकर जाइए, बाकी सब हम संभाल लेंगे।" बिना किसी कागजी कार्रवाई के उन्हें तुरंत शहर के अपोलो अस्पताल पहुंचाया गया।
महज 42 साल की उम्र और वो आखिरी विदाई
चेन्नई के डॉक्टरों ने हुमा को बचाने की जी-तोड़ कोशिश की। अगले 5 दिनों तक हुमा वेंटिलेटर पर रहीं। पूरा पाकिस्तान और भारत के करोड़ों क्रिकेट फैंस उनकी सलामती की दुआ कर रहे थे। लेकिन 25 अक्टूबर 2009 को मात्र 42 साल की उम्र में हुमा का निधन हो गया। जिस पत्नी ने वसीम को साइकॉलोजिस्ट बनकर उनके करियर के सबसे बुरे दौर से निकाला था, उसने चेन्नई की मिट्टी पर अपनी आखिरी सांस ली।
आज भी चेन्नई को शुक्रिया कहते हैं वसीम
भले ही वसीम अकरम अपनी पत्नी को बचा नहीं सके, लेकिन चेन्नई के लोगों और डॉक्टरों ने जो प्यार उन्हें दिया, वह उसे कभी नहीं भूले। वसीम आज भी कहते हैं, "मैं चेन्नई का कर्जदार हूँ। उस रात उन्होंने जो किया, उसने साबित कर दिया कि इंसानियत से बड़ा कोई मजहब या मुल्क नहीं होता।"












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